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रविवार, 16 जनवरी, 2005 को 08:15 GMT तक के समाचार
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एलटीटीई और सैनिक एक साथ

श्रीलंका में बच्चे
मरने वालों में 40 प्रतिशत बच्चे भी हैं
श्रीलंका के पूर्वी हिस्से में तमिल बहुत इलाकों में आजकल एक अजीबो-ग़रीब नज़ारा देखने को मिल रहा है.

यहाँ चल रहे सुनामी सहायता केंद्रों में श्रीलंका पुलिस और एलटीटीई के विद्रोही कंधे से कंधा मिलाकर काम काम कर रहे हैं. और मज़े की बात ये है कि दोनों अपनी-अपनी वर्दी में हैं.

तमिल श्रीलंका के उत्तरी और पूर्वी इलाक़े में सक्रिय हैं.

लगभग पूरे उत्तरी इलाक़े में एलटीटीई का कब्ज़ा है पर पूर्वी श्रीलंका मिश्रित अधिपत्य वाला है.

यहाँ के कुछ क्षेत्रों में एलटीटीई का क़ब्ज़ा है तो कुछ में श्रीलंका सरकार का.

'तमिल रिहैबिलीटेशन ऑर्गनाइजेशन' (टीआरओ) एलटीटीई का एक धड़ा है जो तमिल इलाक़े में चल रहे सहायता कार्य का नेतृत्व कर रहा है.

टीआरओ के कोलम्बो प्रमुख चंद्रू कहते हैं, "हम श्रीलंका के उत्तर और पूर्व में 200 से ज़्यादा सहायता केंद्र चला रहे हैं. जिनमें इस वक़्त दो लाख से ज़्यादा लोग हैं और हमारा रोज़ का ख़र्च पिछले दो हफ्तों में 150 हज़ार अमरीकी डॉलर रहा है."

इस राशि के बारे में पूछने पर वे कहते हैं, "ये सारी मदद हमें विदेश में रह रहे अपने समर्थकों से मिली है."

चंद्रू कहते हैं कि उनके सहायता केंद्रों में 4 प्रतिशत ऐसे लोग हैं जिनके घर बर्बाद हो गए हैं पर 60 प्रतिशत लोग डर की वजह से सहायता केंद्रों में रह रहे हैं.

उनका कहना है कि अब तक किसी भी कैंप में कोई भी महामारी नहीं फैली है, जिसे वे अपनी एक और सफलता हैं.

वे कहते हैं कि उनकी प्राथमिकता लोगों को जीने के आवश्यक साधन दिलवाना और हिम्मत बंधाना है ताकि लोग अपने घरों को वापस लौट सकें.

उसके बाद अगले 6 महीनों में उनके बारे में सोचना होगा जिनके घर बर्बाद हो गए हैं.

सरकार से टकराव

वे कहते हैं, "इस समय हमें बड़े बुल्डोज़रों की बड़ी ज़रूरत है क्योंकि लाशें तो हमने जला दी हैं पर अब उन घरों को तोड़ने की ज़रूरत है जो टूटे-फूटे हुए हैं ताकि वहाँ नए घर बनाए जा सके. इसके लिए हमें और मदद की ज़रूरत होगी.

वे सरकार की शिकायत करते हुए कहते हैं, "ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब इटली की सरकार ने हमें सीधे मदद देने की पेशकश की तो श्रीलंका की सरकार ने उसे रोक दिया."

हाल में श्रीलंका सरकार ने यह आदेश दिया था कि तमाम सहायता कार्य का नेतृत्व श्रीलंका की सेना ही करेगी.

एलटीटीई के प्रवक्ता दया मास्टर कहते हैं, "ये हमें क़तई मंज़ूर नहीं है. पूर्व के काफ़ी राहत केंद्रों के बारे में हमने सुना है कि लोग वहाँ से श्रीलंका सेना के डर से सहायता केंद्र छोड़ कर भाग रहे हैं. यद्यपि पूर्वोत्तर इलाक़े में हमने इस तरह की कोई घटना नहीं देखी."

तालमेल भी

पूर्वी श्रीलंका के अम्पारा ज़िले में समुद्र के किनारे जा रही सड़क के कुछ हिस्से पर श्रीलंका की सेना का और थोड़े पर एलटीटीई का क़ब्ज़ा है.

उस पर जब हमने आगे बढ़ने की कोशिश की तो कोई चेक प्वाइंट नहीं दिखा, बल्कि हमें एनटीटीई और श्रीलंका के सैनिक आपस में बातचीत करते नज़र आए.

हालाँकि उन्होंने हमें उनकी तस्वीरें लेने से रोक दिया पर वीरान पड़े कोमरी शहर में यह अजीब नज़ारा था.

 20 साल के युद्ध में हमने 40 हज़ार जवानों को खोया. दोनों ओर से और अगर अब भी लापता 10 हज़ार लोगों को जोड़ दें तो प्रकृति ने उतनी ही जाने दो घंटे में ले लीं. प्राकृतिक विपदा ये नहीं देखती कि आप किस राष्ट्रीयता या धर्म या जाति के हैं. उसके सामने हम सब एक हैं
चंद्रिका कुमारतुंग, राष्ट्रपति

जहाँ सारे घर नेस्तनाबूद पड़े थे. लोग सहायता केंद्रों में रह रहे थे और आपस में 20 सालों से लड़ रहे सैनिक अपने टूटे-फूटे कैंपों में. वे सब एक-दूसरे के सहारे एक दूसरे की मदद कर रहे थे.

ये शायद प्राकृतिक आपदा की मनुष्य निर्मित आपदाओं पर जीत थी.

श्रीलंका की राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग ने भी एक पत्रकार वार्ता में कहा, "20 साल के युद्ध में हमने 40 हज़ार जवानों को खोया. दोनों ओर से और अगर अब भी लापता 10 हज़ार लोगों को जोड़ दें तो प्रकृति ने उतनी ही जाने दो घंटे में ले ली. प्राकृतिक विपदा ये नहीं देखती कि आप किस राष्ट्रीयता या धर्म या जाति के हैं. उसके सामने हम सब एक हैं."

पता नहीं श्रीलंका इससे कुछ राजनीतिक सबक सीखेगा या नहीं.

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