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शनिवार, 08 जनवरी, 2005 को 02:44 GMT तक के समाचार
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निकोबार में सेना ने दिखाया अदम्य साहस

निकोबार
निकोबार में वायु सेना ने अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई
कार निकोबार के बेस ग्रुप कमांडर कैप्टन रवि धर अपने साथियों की जगह यहाँ उस समय पहुँचे थे जब सूनामी के क़हर से सारा इलाक़ा तहस-नहस हो चुका था.

उनके कई सहयोगियों ने अपना सब कुछ गँवा दिया था. कई सैनिकों के परिवारों के सदस्यों की मौत हो चुकी थी लेकिन इसके बावजूद वे जी-जान से राहत और बचाव कार्य में लगे रहे.

अब नए कमांडर कार निकोबार में राहत कार्यों के लिए आने वाली हर उड़ान पर नज़र रखते हैं. भारत में सूनामी के कारण सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ है अंडमान निकोबार.

इस समय यहाँ राहत कार्य ज़ोर-शोर से चल रहा है. सात जहाज़ दिन में कई बार यहाँ सामान लेकर आ रहे हैं.

भारतीय वायु सेना के रूस निर्मित मालवाहक विमान भी दिन में कम से कम 50 बार उड़ान भर रहे हैं.

सूनामी के कारण रनवे का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था फिर भी विमान उड़ान भर रहे हैं.

व्यवस्था

कैप्टन धर ने बताया कि चूँकि सूनामी के कारण एयर ट्रैफ़िक इमारत भी क्षतिग्रस्त हो गई है इसलिए अस्थायी रूप से एक पोर्टेबल ट्रैफ़िक कंट्रोल बनाया गया है जिससे काम चलाया जा रहा है.

 हमारे लिए यह जीवन बचाने की जंग है न कि ज़िंदगी लेने की
ब्रिगेडियर जेम्स देवदॉस

ज़्यादातर हवाई कर्मचारी रनवे के किनारे टेंट में रह रहे हैं क्योंकि उनका सरकारी निवास तबाह हो गया है.

निकोबार द्वीप में राहत कार्य का प्रभार ब्रिगेडियर जेम्स देवदॉस के हाथ में है. उन्होंने बताया, "हमारे लिए यह जीवन बचाने की जंग है न कि ज़िंदगी लेने की."

ब्रिगेडियर देवदॉस के मुताबिक़ अभी तक 2000 टन से भी ज़्यादा राहत सामग्री निकोबार पहुँच चुकी है. इनमें बोतलबंद पानी, दवाइयाँ, खाने का सामान, जेनेरेटर और ईंधन भी शामिल हैं.

कार निकोबार के 14 में से आठ गाँव पूरी तरह नष्ट हो गए हैं. सैनिक और स्थानीय स्वयंसेवक अभी भी लोगों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं.

तबाही

विंग कमांडर ओंकार सिंह ने बताया कि उन्हें एक गाँव में तलाशी अभियान के दौरान 22 शव मिले. ब्रिगेडियर देवदॉस के मुताबिक़ कार निकोबार में उन लोगों ने 400 लोगों का अंतिम संस्कार किया है और ये अभी भी जारी है.

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लोग अपना आशियाना फिर से बसाने की कोशिश में हैं

अन्य सैनिक अधिकारियों का मानना है कि यहाँ मरने वालों की संख्या सैकड़ों में नहीं बल्कि हज़ारों में है.

निकोबार की जनजातियाँ तटवर्ती इलाक़ों से भागकर ऊपरी इलाक़ों में चली गई हैं. मछुआरे मैथ्यू बताते हैं कि उन लोगों को अब तटवर्ती इलाक़ों से दूर ही बसना होगा.

राहत शिविरों में चल रहे काम से बदलाव महसूस हो रहा है. मलक्का गाँव के फिलिप बताते हैं, "हमें पर्याप्त खाना और पानी मिल रहा है. लेकिन हम नहीं जानते कि यह कितने दिनों तक चलेगा."

मलक्का गाँव में जनजातियों के प्रमुख हरबर्ट सैन का कहना है कि गाँव के लोगों का सब कुछ लुट गया है और सरकार को नए सिरे से लोगों को बसाना होगा.

सभी गाँव वाले सरकार की ओर से पुनर्वास नीति की घोषणा का इंतज़ार कर रहे हैं. भारत के गृह राज्य मंत्री का कहना है कि जनवरी के मध्य तक इसकी घोषणा हो जाएगी.

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