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बुधवार, 12 जनवरी, 2005 को 13:40 GMT तक के समाचार
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बर्बादी के बीच खींचतान की राजनीति

तूफ़ान से नष्ट हुई नावें
सिर्फ़ तबाही ही नज़र आती है
किलिनोची में घुसते ही हमारे तमिल ड्राइवर अमृतलिंगम ने कहा- 'पहले होटल बुक कर लेते हैं.'

मैं चौंका, होटल किलिनोची में... लेकिन हमें सबसे पहले मुलाइथिवु जाना था, जिसके बिल्कुल बर्बाद हो जाने की हमें खबर थी.

26 की रात कोलंबो में उतरते ही हमारे सिंहला ड्राइवर नान्धा ने मुझसे कहा हर बुरी घटना का कोई अच्छा पहलू होता है. 'मुलाइथिवु पूरी तरह खत्म हो गया है. मैं बहुत खुश हूँ कि प्रभाकरण मर गया होगा.'

एलटीटीई की सहमति मिलने के बाद तमाम चेक पोस्ट पार करते हुए 28 दिसंबर जब हम मुलाइथिवु पहुँचे तब शाम के चार बज चुके थे और जोरों की बारिश हो रही थी.

उसके बीच हमने देखा एलटीटीई के जवान एक बुल्डोज़र की सहायते से मलबे से लाशें निकालने में व्यस्त थे. उन्होंने हमें एक मास्क भी दिया ताकि हम किसी भी तरह के संक्रमण और बदबू से बचे रहें.

चारों ओर लाश की बदबू थी और पूरा आसमान धुएँ से भरा हुआ था. हमारे सामने एलटीटीई के जवानों ने दस मिनट में तीन लाशें निकालीं और उनको वहीं पर जला दिया.

बर्बादी

लाशें इतनी बुरी हालत में थीं कि उन्हें पहचानना या उनका क्रियाकर्म करना बिल्कुल नामुमकिन था. चारों ओर से उठते धुएँ से हमे ये समझ में आया कि चारों ओर एलटीटीई के जवान लाशें जला रहे हैं.

 हमें मालूम है इन दस्तानों को सिर्फ एक ही बार इस्तेमाल करना चाहिए पर हम क्या करें हमारे पास दस्ताने भी नहीं हैं
राहतकर्मी

वहाँ काम कर रहे एलटीटीई के स्वास्थ्यकर्मी में काफ़ी ग़ुस्सा था, "अगर सरकार ने हमें हेलीकॉप्टर दिया होता, जो हमने उनसे माँगा था, तो हम बहुत जानें बचा सकते थे."

हमने देखा, जैसी कि ख़बर थीं, मुलाइथिवु शहर बिल्कुल ही बर्बाद हो चुका है. वहाँ समुद्र तट से कई किलोमीटर दूर तक हमने सिर्फ मकानों की नींवें ही देखीं.

सारे घरों का कोई नामो निशान नहीं था. चारों ओर टूटी फूटी नाव के टुकड़े और दूर-दूर तक लाशें. मुलाइथिवु मूलतः एक मछुआरों की बस्ती है.

जब शाम ढल आई एलटीटीई के जवान काम ख़त्म करने के बाद अपने दस्तानों को सलीके से धो रहे थे जिन्हें उन्हें अगली सुबह फिर इस्तेमाल करना था.

उन्होंने हमें बताया, "हमें मालूम है इन दस्तानों को सिर्फ एक ही बार इस्तेमाल करना चाहिए पर हम क्या करें हमारे पास दस्ताने भी नहीं हैं. हम अपने अस्पताल के दस्तानों का उपयोग कर रहे हैं. सरकार ने हमें अब तक कोई मदद नहीं दी हैं."

एलटीटीई की भूमिका

उसी रात एलटीटीई के मुख्यालय किलिनोची में जब हम उनके राजनीतिक प्रमुख तमिलचेलवन के साथ बैठे तो उनमें अनेक जवानों की तरह गुस्सा नहीं था वरन् उन्होंने कहा, "सूनामी ने तमिल और सिंहली लोगों को एक दूसरे का विश्वास जीतने का एक मौक़ा दिया है. मुझे आशा है यह दुखद घटना दोनों समुदायों के बीच दोस्ती की आधारशिला बनेगी."

एलटीटीई में कुछ खास लोगों को ही पता है कि उनके प्रमुख प्रभाकरण कहाँ रहते हैं.

वे एलटीटीई अधिकृत इलाके में भी साल में एक या दो बार ही लोगों के सामने आते हैं. लेकिन आम धारणा है कि प्रभाकरण का ठिकाना मुलाइथिवु में है और हम बगैर कोई सवाल पूछे उनके स्वास्थ्य के बारे में जानना चाह रहे थे.

एलटीटीई के राजनीतिक कार्यालय में माहौल इतना सामान्य था कि हमें यह समझ आया कि कोलंबो के ड्राइवर नांधा की कहानी में ख़ास दम नहीं लगता.

इंटरव्यू के बाद हम जब किलिनोची शहर पहुँचे तब हमने पाया कि सच में किलिनोची में आजकल दो होटल और दर्जनों रेस्टोरेंट हैं.

आज से कुछ साल पहले जब मैं प्रभाकरण से मिलने किलिनोची आया था तब किलिनोची 20 साल के युद्ध से प्रभावित एक शहर था. पर वहाँ शांति प्रक्रिया शुरू होने के बाद आज गैर-सरकारी संस्था के कर्मचारियों की भरमार है. और उन्हीं की बदौलत ये होटल भी चल रहे हैं.

एक हफ्ते बाद हम एक बार फिर किलिनोची पहुँचे जब श्रीलंका के रेडियो ने ये ख़बर प्रसारित कर दी कि अपुष्ट सूत्रों के अनुसार प्रभाकरण की मृत्यु हो चुकी है.

एलटीटीई के प्रवक्ता दया मास्टर ने उसे हँसकर ही उड़ा दिया और कहा, "ये समय इस तरह की अफ़वाह फैलाने का नहीं है."

बदला हुआ रुख़

हम एक बार फिर मुलाइथिवु पहुँचे. वहाँ अब काफी गैर-सरकारी संस्थाओं के बुल्डोज़र काम कर रहे हैं. वहाँ हमारी मुलाकात 20 साल की नित्या से हुई. जो सुनामी के बाद पहली बार अपने घर को देखने आई थी. जिसका कुछ भी वहाँ बचा नहीं था.

नित्या फूटफूट कर रो रही थी. उसने हमें बताया उसके परिवार के कुल 72 लोग इस घटना में मारे गए हैं.

नित्या के साथ हम उस सहायता केंद्र में गए जहां एलटीटीई ने स्थानीय कॉलेज में उनके रहने की व्यवस्था की हुई है.

इस महाविद्यालय में 22 सौ लोग रह रहे हैं. जिनमें आठ अनाथ बच्चें भी हैं. यह संभवतः एलटीटीई का मॉडल रिलिफ कैंप होगा क्योंकि मैंने दस्तख़त रजिस्टर में तमाम पत्रकारों के दस्तख़त देखे.

बिल्कुल चकाचक सहायता केंद्र में चार कम्प्यूटर लगे हुए हैं और वहाँ से हमें प्रिंट आउट दिया गया. कितने लोग मारे गए हैं, कितने बेघर, कितने कहाँ रह रहे हैं, वगैरह-वगैरह.

कैंप के प्रमुख वेलुपिल्लई ने हमें बताया, "श्रीलंका सरकार से हमें आज दो हफ्ते बाद भी सिर्फ एक ट्रक सामान ही मिला है. हम यहाँ जो भी कर रहे हैं, आम लोगों और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की मदद से. अगर श्रीलंका सरकार कहती है कि उन्होंने हमें और मदद भेजी है तो उनसे कृपया ट्रक के नम्बर पूछिए. एलटीटीई के इलाके में कोई भी ट्रक बगैर इंट्री के नहीं घुस सकता."

वे कहते हैं, "हम आपके माध्यम से दुनिया से कहना चाहते हैं कि हमें सीधे मदद भेजें श्रीलंका सरकार के माध्यम से नहीं. अब हम सरकार पर भरोसा नहीं कर सकते."

शाम हमारी मुलाकात एकबार फिर एलटीटीई के राजनीतिक प्रमुख तमिलचेलवन से हुई और इस बार उनका रूख बिल्कुल ही बदला हुआ था. ' सूनामी जैसी प्राकृतिक विपदा का भी श्रीलंका सरकार राजनीतिकरण कर रही है. इसका निश्चित ही शांति प्रक्रिया पर बुरा असर पड़ेगा.'

जाफ़ना

उस शाम हम जाफना लौट आए जो आजकल श्रीलंका की सेना के कब्ज़े में है.

 अगर श्रीलंका फिर से गृह युद्ध से बर्बादी के रास्ते में जाता है-जिसकी मुझे अब पूरी आशंका नज़र आती है. तो इसके लिए प्रकृति नहीं अब मनुष्य ज़िम्मेदार होंगे
वी कानिमिलनाथन

जाफना के सबसे बड़े अखबार उदयन के संपादक वी कानिमिलनाथन ने कहा. "इस तरह की प्रकृतिक विपत्ति के समय अगर एक आम तमिल श्रीलंका सरकार पर भरोसा नहीं कर सकता तब उससे यह आशा कैसी की जा सकती है कि वे उसी सरकार पर अपने भविष्य के लिए हो रही बातचीत पर भरोसा रहेगा."

उन्होंने कहा, "अगर श्रीलंका फिर से गृह युद्ध से बर्बादी के रास्ते पर जाता है-जिसकी मुझे अब पूरी आशंका नज़र आती है. तो इसके लिए प्रकृति नहीं अब मनुष्य ज़िम्मेदार होंगे."

कोलंबो में लौटकर हमने श्रीलंका के चीफ़ ऑफ डिफेंस स्टाफ दया संदागिरी से संपर्क किया. उन्होंने कहा 'एलटीटीई झूठ बोल रही है.'

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