|
तबाही का वो मंज़र भूलता नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कई बार मैंने सुना था और शायद ये वाक्य इस्तेमाल भी किया था कि की ज़िंदगी ताश के पत्तों के बने घर की तरह बिखर गई लेकिन 31 दिसंबर को नागपट्टनम पहुंचा तो वो दृश्य बिल्कुल वैसा ही था. बड़ी बड़ी नावें समुद्र से दो किलोमीटर दूर सड़कों पर उतरी पड़ी थीं. कई नावें मकानों को तोड़ घरों के अंदर घुसी हुई थीं. रंग बिरंगे प्लास्टिक के घड़े, बर्तन, टीवी सेट के टूटे टुकड़े बिखरे पड़े थे.रेत ही रेत बिखरी पड़ी थी. सूनामी लहरें वापस जाते समय रेत की मोटी परत छोड़ गई थीं जिसमें काफी कुछ दब गया था. पूरे माहौल में दुर्गंध फैली हुई थी. ये शहर का बाहरी इलाक़ा था. क़रीब नौ बजे जब हम शहर के अंदर दाख़िल हुए तो एक ही समय में कई तरह दवाईयां छिड़की जा रही थीं. सड़कों के किनारे कपड़ों के ढेर पड़े थे जिनमें से बुजुर्ग महिलाएं और बच्चे अपनी नाप के कपड़े तलाश रहे थे. कुछ फोटोग्राफर उनकी तस्वीरें ले रहे थे. तभी वहां से एक ट्रक गुजरा और कुछ चटाईयां गिराता हुआ निकल गया. कुछ के हाथ चटाई लगी कुछ की आंखों से उम्मीदें टकटकी लगाकर देखती रहीं. शहर के सभी हॉल राहत शिविर में बदल गए थे. सारे स्कूल, मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर सबकुछ राहत शिविरों में बदल चुका था. जहां भी जाएं महिलाओं और बच्चों के रोने की आवाज़े आपका पीछा कर रही थीं. इन राहत शिविरों में रहने की जगह सूनामी पीड़ितों की तादाद को देखते हुए काफी कम थी. जिस किसी से हमने बात करने की कोशिश की वो बिलख बिलख कर रो पड़ा. सभी की कहानी एक जैसी थी. घर, बच्चे, रिश्तेदार, मां बाप, सूनामी सबकुछ बहा ले गया था. इन सभी पीड़ितों में एक चेहरा भुलाए नहीं भूलता. 70 साल की सुजाता. मेरे सामने दोनों हाथ फैला कर रो पड़ी थी वो " मेरा जवान बेटा मछली पकड़ने गया था. लोग कहते हैं मर गया. वो मर नहीं सकता. उसके पास बड़ी नाव थी. " सूनामी ने सबकुछ छीन लिया था बुढ़िया का. जवान बेटा, दोमंजिला घर, बहू और नाती पोते. शिविरों के बच्चों का हाल और भी बुरा था. दिन भर तो किसी तरह खेल कर गुजार देते पर शाम होते ही बच्चे अपने मां बाप को खोजते जो सूनामी ने उनसे छीन लिए थे. दुनिया में हमारे सामने जो भी अच्छा बुरा होता है उसका समाचार देना हमारी ज़िम्मेदारी है लेकिन नागपट्टनम और आसपास के हाल ने कुछ देर के लिए मेरी सोचने समझने की ताकत छीन ली थी. मुझे शब्द नहीं मिल रहे थे कि मैं कैसे बताउं कि यहां कौन मरा कौन बचा और जो बच गया उसका हाल क्या है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||