| 'न्यायिक उत्तरदायित्व के लिए क़ानून बने' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस वर्मा ने न्यायिक उत्तरदायित्व पर क़ानून बनाने की मांग की है. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित प्रस्तावों के आधार पर ऐसा क़ानून बनाया जाए ताकि न्यायिक प्रणाली पर लोगों का भरोसा बना रहे और न्यायिक भ्रष्टाचार की प्रभावी जाँच हो सके. बीबीसी हिंदी के साप्ताहिक कार्यक्रम 'आपकी बात बीबीसी के साथ' में श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए जेएस वर्मा ने कहा, "अब समय आ गया है कि न्यायिक उत्तरदायित्व भी तय किए जाएँ. लेकिन यह सिर्फ़ न्यायपालिका द्वारा ही किया जा सकता है. किसी तरह का बाहरी हस्तक्षेप उसके लिए ख़तरनाक होगा." उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सात मई 1997 को इस संबंध में सर्वसम्मति से तीन प्रस्ताव पारित किया था जिसे प्रधानमंत्री के पास उसी साल एक दिसंबर को भेज दिया गया था ताकि इसे क़ानूनी रूप दिया जा सके लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका. जस्टिस जेएस वर्मा ने कहा, "महाभियोग से बात नहीं बनती. यह रामास्वामी केस से स्पष्ट हो गया है. इसलिए न्यायिक उत्तरदायित्व तय करने के लिए मुख्य न्यायाधीश की अगुआई में एक समिति का गठन होना चाहिए. इस समिति में अन्य वरिष्ठ जज भी शामिल हों. ये समिति जजों पर लगने वाले आरोपों का अध्ययन करें और अगर मामला जाँच के लिए बनता हो तो सही कार्रवाई का आदेश दे." पारदर्शिता उन्होंने कहा कि इससे न्यायिक प्रणाली में पारदर्शिता आएगी और दूसरी ओर जजों के ख़िलाफ़ आने वाले आधारहीन आरोप भी रुक जाएँगे. जस्टिस जेएस वर्मा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. जस्टिस वर्मा ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था से लोगों का भरोसा उठने के पीछे दो प्रमुख कारण हैं- पहला मामलों के निपटारे में देरी और दूसरा कुछ मामलों के कारण जजों की छवि. उन्होंने कहा, "जजों के लिए महत्वपूर्ण है कि वे दूरी बरतें. लोगों से मिलने में कोई बुराई नहीं है लेकिन मिलने का उद्देश्य और संबंधित व्यक्ति के बारे में कोई संदेह नहीं होना चाहिए." धनी और शक्तिशाली लोगों को कई गंभीर मामलों से भी बच निकलने के कारण के बारे में जस्टिस वर्मा ने कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसे लोग अपने पद या पैसे के कारण बच निकलते हैं. पहले तो वे गिरफ़्तार ही नहीं होते और अगर गिरफ़्तार होते हैं तो उनके ख़िलाफ़ ठीक से मामले दर्ज नहीं होते या फिर जाँच ठीक से नहीं होती और आख़िर में मामलों की सुनवाई में देरी के कारण भी ऐसा होता है." उन्होंने माना कि इस स्थिति के लिए सभी लोग ज़िम्मेदार हैं. जस्टिस वर्मा ने कहा कि व्यवस्था से ज़्यादा वे लोग ज़िम्मेदार हैं जो इसे चलाते हैं. महत्वपूर्ण उन्होंने कहा कि इसलिए देश की जनता के लिए यह काफ़ी महत्वपूर्ण है कि वे अपराधियों को चुन कर सत्ता में न भेजे. क्योंकि अपराधी तो चाहता ही है कि व्यवस्था ठीक से काम न करे.
सांप्रदायिक दंगे या ऐसे ही नरसंहारों के मामले में अभियुक्त क्यों छूट जाते हैं- इस सवाल के जवाब में जस्टिस वर्मा ने कहा कि यह एक धारणा बन गई है कि जितना बड़ा अपराध आप करते हैं आपके छूटने की उम्मीद ज़्यादा रहती है. उन्होंने कहा, "इसके लिए मैं न्यायिक प्रणाली को दोष नहीं देता. इसके लिए वे लोग ज़िम्मेदार हैं जो लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण इकाई को चला रहे हैं. पहले तो दंगाई पकड़े ही नहीं जाते, ऊपर से उनके ख़िलाफ़ जाँच भी ठीक से नहीं होती और तो और सुनवाई में देरी से अपराधी यही समझते हैं कि बड़ा अपराध करने में कोई ख़तरा नहीं." जस्टिस वर्मा ने कहा कि गुजरात मामले में सुप्रीम कोर्ट के कड़े क़दमों का अनुसरण हाई कोर्ट को भी करना चाहिए ताकि लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण स्तम्भ पर लोगों का भरोसा बना रहे. न्यायालयों में बड़ी संख्या में लंबित मामलों के बारे में उन्होंने कहा कि इसके निपटारे के लिए हाई कोर्ट और सेशन कोर्ट के रिटायर्ड जजों की नियुक्ति होनी चाहिए. |
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