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सज़ायाफ्ता नेता नहीं लड़ सकेंगे चुनाव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दो साल या उससे ज़्यादा सज़ा पाने वाले विधायक और सांसद, वर्तमान सदनों का कार्यकाल पूरा होने के बाद जन प्रतिनिधित्व कानून के अयोग्यता संबंधी प्रावधानों के दायरे में आ जाएँगे और अगले चुनाव लड़ने के योग्य नहीं होंगे. यह बात सर्वोच्च न्यायलय ने जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा आठ के खंड तीन और चार की व्याख्या करते हुए कही. संविधानविद राजीव धवन इसे महज जन प्रतिनिधित्व कानून की पुनर्व्याख्या भर मानते हैं. वो बताते हैं, "ये जितने भी प्रावधान हैं, उनका मतलब है कि अगर आप कोई अपराध करते हैं जिसमें आपको दो साल या उससे ज़्यादा की सज़ा हो चुकी है, तो आप अगले चुनाव के लिए अयोग्य माने जाएँगे." हालांकि वर्तमान विधायक और सांसद अपनी मौजूदा कार्यावधि पूरी होने तक इस प्रावधान की सीमा से बाहर ही हैं. इस बारे में सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या को और स्पष्ट करते हुए धवन ने बताया, "अगर आप वर्तमान समय में किसी सदन के सदस्य हैं तो आपको वर्तमान सदन का कार्यकाल पूरा होने तक बने रहने दिया जाएगा लेकिन अगले चुनाव के लिए इस प्रावधान की सीमा में आने पर आप चुनाव लड़ने के योग्य नहीं होंगे फिर चाहे आपने इस बारे में किसी न्यायालय में अपील ही कर रखी हो." विशेषज्ञ बताते हैं कि इस व्याख्या के बाद अब दागी विधायक और सांसद अपील की आड़ लेकर चुनाव नहीं लड़ पाएँगे. व्याख्या की वजह ग़ौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने हरियाणा में भारतीय राष्ट्रीय लोकदल के उम्मीदवार नफ़े सिंह के चुनाव को अवैध ठहराया, वे 2000 के विधानसभा चुनाव में विजयी हुए थे. नफे सिंह 10 मई, 1996 को हरियाणा विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए थे और 17 मई, 1999 को अदालत ने हत्या के अपराध में उन्हें उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी. उच्च न्यायालय ने नफे सिंह की सज़ा पर रोक लगा दी थी लेकिन इसके कुछ महीनों बाद ही यानी दिसंबर, 1999 में राज्यपाल ने मध्यावधि चुनावों के लिए विधानसभा भंग कर दी थी. जब नए चुनावों के लिए नफे सिंह ने नामांकन दाखिल किया तो कांग्रेस के प्रत्याशी ने इसका विरोध किया पर चुनाव अधिकारी ने उनके इस तर्क को नहीं माना. अब इसी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून को स्पष्ट किया है. दुरुपयोग की दलील इस फ़ैसले के बाद कुछ पक्षों की ओर से ऐसी दलील भी दी जा रही है कि निचली अदालतों के फ़ैसलों को राजनेता प्रभावित कर अपने प्रतिद्वंदियों के राजनीतिक भविष्य को बिगाड़ सकते हैं. हालांकि राजीव धवन इस दलील को सही नहीं मानते हैं. वो बताते हैं, "यह जो दो साल की सज़ा है, इसे अब सेशन कोर्ट में कोई अनुभवी न्यायाधीश ही करेंगे. अगर इसमें कोई नुक्स रहता है तो अपील से उसे साफ़ किया जा सकेगा." हालांकि ये व्यवस्था मामले को केवल साफ़ करने के लिए कारगर होगी पर चूँकि हरियाणा, बिहार और झारखंड में चुनाव सिर पर हैं, तो इसका असर शीघ्र देखने को मिलेगा. |
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