BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
बुधवार, 22 दिसंबर, 2004 को 04:52 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
दाग़ी मंत्रियों को लेकर बहस
शिबू सोरेन
एक पुराने मामले के कारण शिबू सोरेन को कई महीनों तक मंत्री पद से अलग रहना पड़ा
झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबू सोरेन अब दोबारा केंद्रीय कोयला मंत्री के रूप में काम शुरू कर चुके हैं पर साँप-सीढ़ी के खेल की एक तीन महीने तक चली पारी के बाद.

शिबू सोरेन का मामला यूपीए और एनडीए के बीच दाग़ी मंत्रियों को लेकर चल रही राजनीति का हिस्सा भर था.

राजनीति के अपराधीकरण को लेकर चर्चा तो फिर एक बार गर्म हुई लेकिन कोई भी राजनीतिक दल हामी भरने को हर साल की तरह इस साल भी तैयार नहीं हुआ कि वो अपराधी छवि वाले नेताओं को अपने साथ नहीं रखेगा.

कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार के सत्ता संभालने के तुरंत बाद विपक्ष ने सरकार को घेरने के लिए जो पहला मुद्दा उठाया, वो अपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए सांसदों का मंत्री बनाया जाना था.

विपक्ष ने शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार करके इसे एक बड़ा मुद्दा बना दिया.

इस मामले में तब और तेजी आ गई, जब झारखंड की एक अदालत ने तत्कालीन केंद्रीय कोयलामंत्री शिबू सोरेन के ख़िलाफ़ एक ग़ैर-जमानती वारंट जारी कर दिया. इस ग़ैर- जमानती वारंट और इसके बाद तक़रीबन 10 दिनों के लिए उनके ग़ायब होने के बाद पूरा मामला ख़ासा नाटकीय हो गया.

इससे उठे राजनीतिक बवाल के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को शिबू सोरेन से इस्तीफ़ा माँगना पड़ा. इस्तीफ़े की पेशकश के बाद शिबू ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और न्यायालय में समर्पण के बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

मामला था क्या

ग़ौरतलब है कि शिबू सोरेन को 1975 में तत्कालीन बिहार के चीरूडीह में एक रैली में हुई हिंसा के दौरान तकरीबन 11 लोगों के मारे जाने के एक मामले में दोषी ठहराया गया था.

तसलीमुद्दीन
तसलीमुद्दीन को लेकर भी बहुत विवाद हुए

घटना तब हुई जब शिबू की अगुवाई में हो रही एक रैली में लोग इस बात पर भड़क गए कि स्थानीय लोगों की जमीन पर कुछ बाहरी लोग कब्जा करके रह रहे हैं.

इसके बाद भड़की हिंसा में मारे गए 11 लोगों में 10 मुसलमान भी थे जो ऐसी ज़मीनों पर बस गए थे जिसे आदिवासी अपनी बता रहे थे. शिबू पर आरोप लगा कि उन्होंने लोगों को उत्तेजित किया जिसके चलते यह हिंसा भड़की.

इसके बाद एक निचली अदालत मे शिबू सोरेन के ख़िलाफ़ एक ग़ैर-जमानती वारँट भी जारी किया था.

आरोपों का सिलसिला

बात और बहस केवल शिबू तक ही सीमित नहीं थी. इसके बाद पक्ष-विपक्ष एक दूसरे के नेताओं के ख़िलाफ़ दर्ज मामलों के गड़े मुर्दे उखाड़ने में लग गए.

उमा भारती
उमा भारती को मुख्यमंत्री पद छोड़कर बाबूलाल गौर को कमान सौंपनी पड़ी

लालू को रेलमंत्री बनाने से लेकर उड़ीसा के विधानसभा अध्यक्ष के नाम ग़ैर-जमानती वारँट जारी होने तक और मध्य प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती के इस्तीफे से लेकर केंद्रीय भारीउद्योग एवं सार्वजनिक उपक्रममंत्री तसलीमुद्दीन के ख़िलाफ़ मामलों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा.

राजनीतिक खींचतान के इस पूरे घटनाक्रम से जहाँ एक ओर देश और राज्यों में राजनीतिक समीकरण प्रभावित हुए, वहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए लोगों के जन प्रतिनिधि और मंत्री बनने के सवाल पर भी एक गरमागरम बहस फिर शुरू गई.

हर साल की तरह साल के अंत तक ये बहस जारी थी और राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ये कई बरस तक बिना नतीजे के चलने वाली बहस है.

इससे जुड़ी ख़बरें
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>