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अंडमान निकोबार से जुड़ा सुरक्षा का सवाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सूनामी से मची तबाही के बाद विदेशी सहायता एजेंसियों ने अंडमान निकोबार में काम करने की इजाज़त नहीं देने के लिए भारत सरकार की कड़ी आलोचना की है. भारत की ग़ैरसरकारी सहायता संस्थाओं को भी राजधानी पोर्ट ब्लेयर से आगे जाने नहीं दिया गया. सरकार का कहना है कि वह अपने दम पर राहत कार्य करने में सक्षम है. सुरक्षा चिंताओं और आदिम जनजाति समुदाय के संरक्षण का भी तर्क दिया जाता है. आख़िर बात क्या है? अंडमान निकोबार के लिए ऐसी नीतियों की वजह क्या हो सकती है? अंडमान निकोबार द्वीप समूह भारत की मुख्य भूमि से 1200 किलोमीटर दूर सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में अवस्थित है. इस द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी हिस्सा इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप से मात्र 150 किलोमीटर दूर है. इसी तरह इसका सबसे उत्तरी हिस्सा बर्मा के नियंत्रण वाले कोको द्वीप से सिर्फ 50 किलोमीटर की दूरी पर है. वास्तव में अंडमान निकोबार दक्षिणी-पूर्वी एशिया में भारत के पाँव जमाने का ज़रिया है. दिल्ली स्थित रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान के कमोडोर सी उदय भास्कर कहते हैं, "अंडमान निकोबार द्वीप समूह की स्थिति बहुत ही महत्वपूर्ण है. यहाँ से खाड़ी और मलक्का जलडमरूमध्य के बीच के नौवहन पर नज़र रखी जा सकती है." यह स्थिति क्षेत्रीय नौसैनिक ताक़त बनने की भारत की महत्वाकांक्षा के अनुरूप है. अंडमान के प्राकृतिक बंदरगाह जहाज़ों और पनडुब्बियों के अनुकूल माने जाते हैं. पाकिस्तान के विरोध के बावजूद 1947 में देश के विभाजन के समय अंडमान निकोबार भारत का हिस्सा बना. लेकिन भारत सरकार का ध्यान मुख्य भूमि के विकास पर ही होने के कारण यह द्वीप समूह जनता की नज़रों से दूर ही रहा. अंडमान निकोबार की सामरिक स्थिति का महत्व पहली बार 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय दिखा, जब भारतीय नौसेना ने इसका इस्तेमाल तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के जहाज़ों और नौसैनिक ठिकानों को ध्वस्त करने में किया. उसके बाद के वर्षों में यहाँ नौसेना और वायुसेना के अड्डों को और मज़बूत बनाया गया.
लेकिन अंडमान निकोबार की सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अवस्थिति के बावजूद 1990 के दशक शुरू में इसके विकास पर रक्षा ख़र्च में कमी और आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने का बुरा असर पड़ा. पर उसके बाद भाजपा के नेतृत्व में आई एनडीए सरकार ने रक्षा क्षेत्र में निवेश को एक बार फिर बढ़ाया और 2001 में अंडमान में सशस्त्र सेनाओं और तटरक्षक बलों की संयुक्त कमान स्थापित की. इस कमान की स्थापना का उद्देश्य था क्षेत्र में नौवहन गतिविधियों पर नियंत्रण, समुद्र होकर आतंकवादी कार्रवाई करने वाले गिरोहों और समुद्री लुटेरों पर नियंत्रण. ऐसी भी ख़बरें सामने आई थीं कि भारत अपने परमाणु कमान का कुछ हिस्सा अंडमान निकोबार में भी तैनात करेगा. रक्षा मामलों के विशेष के सुब्रमण्यम इस संभावना से इनकार करते हुए कहते हैं, "कोई भी अपनी परमाणु साजोसमान को इतने सुदूरवर्ती इलाक़े में नहीं रखना चाहेगा." एक और रक्षा विश्लेषक सुबा चंद्रन अंडमान स्थिति रक्षा प्रतिष्ठानों को लेकर भारत की संवेदनशीलता को शीतयुद्धकालीन मानसिकता मानते हैं. अभी ये स्पष्ट नहीं है कि कार निकोबार वायुसेना अड्डा नष्ट होने के अलावा भारतीय सशस्त्र सेनाओं को अंडमान निकोबार में कितना नुकसान हुआ है. लेकिन इतना तो तय है कि सूनामी से मची तबाही के बाद भारत के सैन्य विशेषज्ञ अंडमान निकोबार में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की अपनी किसी योजना पर फिर से विचार करने को बाध्य होंगे. |
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