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रेड क्रॉस का अंडमान प्रशासन पर आरोप | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के सूनामी पीड़ित इलाक़ों में राहत कार्यों को लेकर सरकारी अधिकारियों और विदेशी राहत एजेंसियों के बीच चल रहा विवाद और गहरा गया है. रेड क्रॉस ने अंडमान निकोबार के अधिकारियों पर राहत सामग्री को 'हाईजैक' करने का आरोप लगाया है. रेड क्रॉस के प्रवक्ता ने कहा कि अंडमान निकोबार में ज़ब्त की गई उनकी राहत सामग्री सरकारी कर्मचारियों के हाथों में पहुँच गई है. अंडमान निकोबार के अधिकारियों ने इस आरोप पर प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है लेकिन अपनी नीति दोहराई है कि विदेशी सहायता सामग्री के आने पर एतराज़ नहीं है लेकिन उसका वितरण सरकारी कर्मचारी ही करेंगे. अंडमान निकोबार में अधिकारियों ने मारे गए लोगों की संख्या 1800 बताई है जबकि 5600 लोग लापता हैं. अंडमान निकोबार सहित भारत में सूनामी की वजह से मारे गए लोगों की कुल संख्या लगभग 11 हज़ार तक जा पहुँची है. आरोप भारतीय रेड क्रॉस के एक वरिष्ठ अधिकारी बासुदेव दास ने बीबीसी को बताया कि द्वीप के प्रशासन ने किसी भी ग़ैर सरकारी संगठन को वहाँ राहत कार्यों में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं दी है चाहे वो भारतीय हों या विदेशी. राजधानी पोर्ट ब्लेयर से बाहर राहत कार्यों में भाग लेने की अनुमति सिर्फ़ संयुक्त राष्ट्र की बाल कल्याण संस्था यूनिसेफ़ को दी गई है. बासुदेव दास का कहना है कि सरकारी अधिकारियों ने उनसे यही कहा कि वे बिना किसी बाहरी सहायता के राहत अभियान चलाने में सक्षम हैं. दास का कहना है, "हमारी राहत सामग्री हमसे छीन ली गई है और सरकारी अधिकारी उन्हें बाँट रहे हैं, हम चाहते थे कि हम इस बात की निगरानी करें कि हमारी सामग्री सही लोगों तक पहुँच रही है लेकिन यहाँ ऐसा नहीं हो रहा है." इसी तरह, रोटरी इंटरनेशनल की भारतीय शाखा का कहना है कि उन्होंने 1500 घर बनाने का प्रस्ताव रखा था जिसे अंडमान निकोबार प्रशासन ने ठुकरा दिया. अंडमान निकोबार के उप राज्यपाल राम कापसे ने कहा कि वे निर्माण सामग्री उपलब्ध करा सकते हैं लेकिन निर्माण का काम सरकारी कर्मचारी ही करेंगे. पोर्ट ब्लेयर से बीबीसी संवाददाता सुबीर भौमिक का कहना है कि दूर-दराज़ के इलाक़ों से राहत सामग्री की कमी की ख़बरें आ रही हैं और कई स्थानों पर राहत सामग्री लूटे जाने के समाचार भी मिले हैं. जानकारों का कहना है कि अंडमान निकोबार में सामरिक दृष्टि से संवेदनशील कई स्थान हैं और फिर सरकार आदिम जनजातियों को भी विदेशियों की पहुँच से दूर रखना चाहती है इसलिए इतनी सख़्ती की जा रही है. कई अन्य राहत एजेंसियों औऱ ग़ैर सरकारी संगठनों ने सरकार के इस रवैए की कड़ी आलोचना की है. |
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