|
पुनर्वास में काफ़ी समय लगेगा:अय्यर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर का कहना है कि सूनामी पीड़ितों के पुनर्वास में तमाम कोशिशों के बाद भी काफ़ी समय लगेगा. 'आपकी बात बीबीसी के साथ' कार्यक्रम में श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि वे मानते हैं कि किसी भी तरह की आपदा से निपटने के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि अपने गाँव और कस्बे को स्थानीय लोगों की तरह कोई नहीं नहीं समझता. उन्होंने कहा कि समुद्र ने दो मिनट में जो कुछ मिटा दिया उसे बनाने में सैकड़ों साल और कई पीढ़ियाँ लगी थीं. केंद्रीय मंत्री अय्यर ने स्वीकार किया कि राहत पहुँचाने में और पुनर्वास में समय लग रहा है लेकिन इसे देर को अपरिहार्य बताते हुए उन्होंने कहा कि यह एक ऐसी आपदा है जो भारत की आपदा नहीं है. उनका कहना था कि सूनामी प्रशांत महासागर की त्रासदी है और भारत में यह पिछली बार 1881 में आई थी इसलिए भारत इस आपदा के लिए तो तैयार ही नहीं था. एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि वे विकेंद्रीयकरण के पक्षधर हैं और मानते हैं कि आपदा प्रबंधन का काम पंचायतों और स्थानीय निकाय बेहतर ढंग से कर सकते हैं. आपदा प्रबंधन के सवाल पर मणिशंकर अय्यर ने कहा कि भारत एक ग़रीब देश है इसलिए अमरीका और फ़्रांस से इसकी तुलना नहीं करना चाहिए लेकिन सूनामी के मामले में भारत ने जो क़दम उठाए हैं उसकी तारीफ़ पूरी दुनिया कर रही है. उन्होंने मालदीव, श्रीलंका और इंडोनेशिया में भारतीय सहायता का उल्लेख भी किया. उनका दावा था कि सूनामी के मामले में राहत पहुँचाने में भारत सरकार ने कोई देरी नहीं की है. उनका कहना था कि जब वे पीड़ित इलाकों में पहुँचे तो वहाँ कोई स्वयंसेवी संस्था नहीं पहुँची थी. केंद्रीय मंत्री अय्यर ने एक श्रोता के सवाल के जवाब में कहा कि पर्यावरण को बचाने का सवाल भी महत्वपूर्ण है और अब जब पुनर्वास के लिए गांव वाले कह रहे हैं कि उन्हें अब समुद्र तट से पीछे बसाया जाए तो यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो गया है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||