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श्रीलंका के दस लाख मछुआरे संकट में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीलंका के दस लाख से अधिक मछुआरे सूनामी के कारण अपनी रोज़ी-रोटी से हाथ धो बैठे हैं. श्रीलंका के मछुआरों की अस्सी प्रतिशत से अधिक नावें लहरों की मार से टूट चुकी हैं और उनके जाल बह गए हैं. सूनामी के कारण श्रीलंका में इंडोनेशिया के बाद जान-माल का सबसे अधिक नुक़सान हुआ है, वहाँ कम से कम तीस हज़ार लोग मारे जा चुके हैं, लगभग दस लाख लोग बेघर हो चुके हैं जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं. तमिल अलगावादियों का तो कहना है कि तीस हज़ार लोग तो सिर्फ़ उनके नियंत्रण वाले पूर्वोत्तर इलाक़े में मारे गए हैं जबकि पाँच लाख लोग बेघर हुए हैं. जिन मछुआरों की नाव और जाल सलामत है उनकी मुसीबतें भी कम नहीं हैं, देश में इन दिनों लोग मछली खाने को तैयार हैं जबकि एक समय मछली की भारी खपत होती थी. लोगों का मानना है कि मछलियाँ इंसानी लाशें खा रही हैं इसलिए उनका माँस खाना ठीक नहीं. इतना ही नहीं, बहुत से सारे मछुआरों के मन में समुद्र का डर बैठ गया है, वे समुद्र की ओर रूख़ करने से डर रहे हैं. मछुआरों की सहकारी समितियों के 12 में से 10 बंदरगाह पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं, ऊपर से वहाँ आई बाढ़ ने मुसबीतें और बढ़ा दी हैं. सहयोग श्रीलंका में वर्षों से जारी गृह युद्ध की दुश्मनी की भुलाकर सैनिक और तमिल अलगाववादी मिलजुलकर काम कर रहे हैं. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि दोनों पक्षों के मिलकर काम करने का नतीजा ये हुआ है कि लोगों ने खाना-पानी पहुँचने लगा है, वर्ना शुरू में लग रहा था कि ज़रूरतमंद इलाक़ों में राहत पहुँचाना एक समस्या होगी. तमिल टाइगर और सेना के बीच सहयोग तो है लेकिन आरोप-प्रत्यारोप जारी है, तमिल विद्रोहियों का कहना है कि सरकार पूरी प्रतिबद्धता से काम नहीं कर रही, ख़ास तौर पर उन इलाक़ों में जहाँ अलगाववादियों का नियंत्रण है. भारत के सात जहाज़ भी श्रीलंका में सहयोग के काम में लगे हुए हैं, भारत ने राहत सामग्री और तंबू भी वहाँ भेजे हैं. श्रीलंका में भी भारत और इंडोनेशिया की तरह फ़िलहाल समस्या यही है कि राहत सामग्री की कमी नहीं लेकिन उन्हें ज़रूरतमंदों तक पहुँचाने का काम चुस्त और व्यवस्थित तरीक़े से नहीं हो पा रहा है. |
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