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बुधवार, 22 दिसंबर, 2004 को 08:47 GMT तक के समाचार
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पड़ोसियों के बीच जमती-पिघलती बर्फ़

मनमोहन सिंह और परवेज़ मुशर्रफ़
दोनों देशों की राजनीतिक परिस्थियों में बहुत बदलाव हुआ है
भारत की विदेश नीति के संदर्भ में शायद पाकिस्तान के साथ उसके संबंधों से अधिक महत्वपूर्ण मुद्दा कोई और नहीं हो सकता.

आज़ादी और देश के विभाजन से आज तक इन दो सहोदर देशों के रिश्तों के उतार चढ़ाव ने न सिर्फ दक्षिण एशिया बल्कि एक हद तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया है.

बीत रहे वर्ष 2004 की पड़ताल इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में ही की जानी चाहिए.

कोई 1955-56 से भारत और पाकिस्तान ने एक दूसरे को बैरी के रूप में ही पहचाना है.

दोस्ती की बातें चाहे जितनी भी की गई हो , हक़ीकत यह है कि संबंधों में सुधार आज तक सामान्य की श्रेणी में नहीं पहुंचे हैं.

परस्पर विश्वास बढ़ाने वाले कदमों की ही कवायद आगे-पीछे होती रहती है. शिखर वार्ताओं और ऐतिहासिक समझौतों की सूची लंबी है पर अगर तटस्थ भाव से मूल्यांकन करें तो 'नौ दिन चले अढ़ाई कोस' वाला मुहावरा ही याद आता है.

वर्ष 2004 के आरंभ तक यह बात साफ हो चुकी थी कि पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की प्रधानमंत्री अटल बिहारी की पहल नाकाम हो चुकी है.

जिस प्रक्रिया को लाहौर यात्रा से शुरू किया गया था और बड़ी दिलेरी से कारगिल के 'विश्वासघात' के बाद भी जारी रखने का भरसक प्रयत्न किया गया था उसे आगरा शिखर सम्मेलन की असफलता के बाद विश्वसनीय बनाए रखना असंभ हो चुका था.

यह बात भी उजागर और जगज़ाहिर थी कि अटल बिहारी वाजपेयी की साझा सरकार के सभी सदस्य इस प्रयास के समर्थक नहीं थे.

आडवाणी जैसे कट्टरपंथी, ख़ुद को लौह समझने वाले नेता यह सुझाने में कभी नहीं चूकते थे कि शांति और सुलह का राजनय कभी भी सार्थक नहीं हो सकता.

पाकिस्तान के साथ नरम नहीं गरम नीति ही भारतीय हितों को सुरक्षित रख सकती है. भारतीय सेना नायक इस बात से खिन्न थे कि इस संवाद के बाद भी जम्मू-कश्मीर राज्य में सरहद पार से हिंसक, अलगाववादी घुसपैठ कतई कम नहीं हो रही थी.

नई सरकार और संकेत

इसके साथ ही आम चुनावों की घोषणा के साथ सरकार में बदलाव की संभावना के बारे में भी अटकलें आरंभ हो गईं.

भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय गठबंधन सरकार की हार हुई और 'हिंदुत्व' वाली विचारधारा का विरोध करने वाली 'धर्म निरपेक्ष' कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई साझा सरकार का गठन हुआ.

शौकत अज़ीज़ के साथ नटवर सिंह
नटवर सिंह को पुराने ज़माने की सोच वाला माना जाता है

इस फेरबदल से दो बातें प्रभावित हुईं. पाकिस्तान के साथ जारी संवाद, जिसकी मूल प्रेरणा अटल बिहारी वाजपेयी की महत्त्वाकांक्षा थी, शिथिल पड़ा और चोटी की भारतीय राजनयिक टीम बदल गई.

मनमोहन सिंह की सरकार में नवनियुक्त विदेश मंत्री नटवर सिंह अपनी पहली विदेश यात्रा में नेपाल गए सिर्फ़ यह जताने कि पाकिस्तान के अलावा दूसरी सामरिक चुनौतियाँ और प्राथमिकताएँ भारत के सामने हैं.

दक्षिण एशिया और पड़ोस में अन्यत्र भारत के उभयपक्षी संबंधों को पाकिस्तान के साथ चलता दबाव-तनाव अक्सर असंतुलित करता रहा है. संभवतः नटवर सिंह यह जतलाने की कोशिश कर रहे थे कि आगे से ऐसा नहीं होने देंगे.

बहरहाल, अतीत की (शीतयुद्धयुगीन) यादों में खोए रहने वाले भारतीय विदेश मंत्री का जो भी सोचना हो, उनके सहयोगी पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर ने ईरान से बरास्ता पाकिस्तान भारत पहुँचने वाली गैस पाइप लाइन का ज़िक्र कर इस बात को रेखांकित किया कि दो देशों के बीच परस्पर लाभप्रद आर्थिक संबंधों-हितों को विकसित करने के बाद ही स्थाई शांति की बात सार्थक ढंग से की जा सकती है.

 इस बात को अनदेखा करना कठिन है कि पिछली सरकार की भाँति ही इस सरकार में भी भारत-पाकिस्तान संबंधों के बारे में 'मतैक्य' या सर्वसहमति नहीं

इस बात को अनदेखा करना कठिन है कि पिछली सरकार की भाँति ही इस सरकार में भी भारत-पाकिस्तान संबंधों के बारे में 'मतैक्य' या सर्वसहमति नहीं.

नटवर सिंह और मणिशंकर अय्यर के नज़रिए का फर्क़ पीढ़ियों के 'विश्व दर्शन' में बुनियादी फर्क़ को भी ज़ाहिर भी करता है.

विचारधारा के आधार पर दोनों के तेवर भले ही नेहरूवादी-समाजवादी हों-इस पड़ोसी के बारे में दोनों की 'सोच' और 'सूझ' में काफ़ी फर्क़ है.

पाकिस्तान की राजनीति

परिवर्तन सिर्फ भारत की आंतरिक राजनीति में ही नहीं हुए. पाकिस्तान में जनरल मुशर्रफ़ की स्थिति निरंतर मजबूत हुई.

अटल बिहारी वाजपेयी के साथ आगरा में अपनी मुलाक़ात के वक्त, तख़्तापलट कर गद्दीनशीन हुए फौजी मुशर्फ अंतरराष्ट्रीय मान्यता और प्रतिष्ठा के मोहताज थे.

ऐसी नागरिक सरकार के रूप में पहचान बनाने को आतुर थे जिसे पाकिस्तान की जनता का प्रतिनिधि समझा जा सके.

एक पेचीदगी और थी -'परवेज मुशर्रफ़ पंजाबी नहीं मुहाजिर हैं' भारत के साथ बहुत नरमी से पेश आने के आक्षेप के कारण तब उनकी स्थिति जोखिम भरी समझी जा सकती थी. कट्टरपंथी मजहवी नेताओं का मुँह बंद रखने की मजबूरी का इजहार कर वह अपनी सीमाएँ बताते रह सकते थे.

जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में वह बारंबार यही कह अपनी असमर्थता जताते रहे हैं कि तालिबान अफ़ग़ानिस्तान के 'विघटन' के बाद पाकिस्तान में या पाक अधिकृत कश्मीर में 'शरणार्थी' मुजाहिदीनों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं.

अमरीकी साया और बदली परिस्थितियाँ

आज यह तमाम बातें बदल चुकी हैं. यह परिवर्तन पिछले वर्ष में ही हुआ है.

पाकिस्तान में, फ़िलहाल, जनरल मुशर्रफ को चुनौती देने वाला कोई नहीं नज़र नहीं आता. वह राष्ट्रपति भी हैं और सेनाध्यक्ष भी.

जॉर्ज बुश और परवेज़ मुशर्रफ़
अमरीका लगातार पाकिस्तान को समर्थन देता रहा है

अपने मशहूर वैज्ञानिक ए.क्यू खान की परमाणविक तस्करी को भी वह बिना चेहरे पर शिकन लाए पचा चुके हैं.

9/11 के बाद अमरीकी रणनीति में पाकिस्तान का महत्त्व और भी बढ़ गया है. मुशर्रफ को बारहों महीने अमरीकी समर्थन बेहिचक मिलता रहा है. न सिर्फ समर्थन बल्कि हथियारों की ख़रीद का भरोसा भी.

इस सब से उनका आत्म विश्वास निश्चय ही बढ़ा है. आज हिंदुस्तान के साथ संबंध सुधारने की कोई उतावली उन्हें नहीं.

इसी के चलते भारत-पाकिस्तान संवाद का अवमूल्यन हुआ है. 'शिखर' के स्थान पर सचिव या बहुत हुआ तो विदेश मंत्री स्तर की वार्त्ताओं को ही काफी समझ लिया गया है.

इनके लिए भी ज़मीन तैयार करने का काम संयुक्त सचिव के दर्जे के अधिकारी ही करते नज़र आ रहे हैं.

जो पहल-सरहद पार इधर या उधर से की जाती है उनको अनावश्यक रूप से तूल दिया जाता है तो 'मीडिया' के उद्यम से.

कश्मीर का नक्शा
मुशर्रफ़ ने एक नया हल सुझा दिया है

कभी मुशर्रफ इस बात की घोषणा कर डालते हैं कि उन्होंने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए अनूठा (राज्य को तीन इकाइयों में बाँटने वाला) फार्मूला खोज़ निकाला है तो कभी भारत सरकार सीमा पर तैनात अपनी फौजों को पीछे हटाने का हुक्म सुना तनाव घटाने की पेशकश करती है.

इस सब के साथ-साथ जब कभी (संयोगवश) पाकिस्तानी प्रधानमंत्री सार्क सम्मेलन के काम से भारत पहुँचते हैं तो यह आस जगती है कि शायद मुशर्रफ ने कुछ प्रेम पत्री भेजी हो. पर हर बार यह आस निरास भई-बतर्ज सहगल.

मनमोहन सिंह स्पष्ट कर चुके हैं भौगोलिक सीमाएं छेड़ी नहीं जाएंगी-सो मुशर्रफ़ का कश्मीरी नुस्खा इस्तेमाल नहीं हो सकता.

उधर मुशर्रफ को भारतीय फौजों की तैनाती जस की तस या नाम मात्र की कटौती, महज दिखावा लगती है.

परमाणविक घुड़की सुनाते वह चूकते नहीं. भारत को भी इस बात का गहरा असहसास है 'जाको राखे अमरीकी साईंया मार सके ना कोय, बंधु ना बैरी बन सके कहु भी करे ना कोय!'

आसार

हाल फिलहाल इस स्थिति में बदलाव कोई सूत्र नज़र नहीं आती.

 भारत-पाकिस्तान संबंधों की बर्फ पिघलती-जमती रहेगी. बदस्तूर- ख़ून के धब्बे धुलेंगे जाने कितनी बरसातों के बाद

जनता के आपसी संबंध दीगर हैं, ग़ैर सरकारी प्रयास भरसक कोशिश करते हैं अपनी सरकारों को प्रभावित करने की.

पर भारत जैसे जनतंत्र में और पाकिस्तान जैसी तानाशाही में इन्हें बराबर असरदार नहीं समझा जा सकता.

संबंधों में कोई अप्रत्याशित बिगाड़ होने की संभावना आज कम है-अमरीका के दोनों देशों पर दबाव के कारण.

स्वाधीनता के क्षय का रोना रोते रहने के साथ-साथ यह संतोष का विषय भी समझा जा सकता है.

भारत-पाकिस्तान संबंधों की बर्फ पिघलती-जमती रहेगी. बदस्तूर- ख़ून के धब्बे धुलेंगे जाने कितनी बरसातों के बाद.

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