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अमरीकी समर्थन पर फलते-फूलते मुशर्रफ़ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के हाल के अमरीका, यूरोप और लैटिन अमरीकी देशों के दौरे और पाँच वर्ष पहले की गई एक पश्चिमी देश की पहली यात्रा के बीच का फ़र्क सिर्फ़ समय का ही नहीं, बल्कि बदली परिस्थियों का भी रहा है. 1999 में तख़्ता पलट के बाद सत्ता में आए परवेज़ मुशर्रफ़ को उस समय पश्चिमी देशों की सरकारों ने सैनिक तानाशाह के रुप में देखा और जनरल मुशर्रफ़ की वैचारिक व राजनैतिक आस्थाओं पर भी बड़े प्रश्नचिन्ह थे. लेकिन अब उन्हें एक ऐसे संवैधानिक राष्ट्रपति के रुप में देखा जा रहा है जो पश्चिमी देशों के कई नेताओं का एक वफ़ादार साथी और क़रीबी भी है. यह परिवर्तन आसान नहीं रहा है और ख़ासतौर पर पाकिस्तान-अमरीका संबंधों के संदर्भ में तो कतई नहीं. पाकिस्तान में अमरीकी संस्थानों और पश्चिमी देशों के नागरिकों पर हमलों, परमाणु प्रसार पर चिंताओं और दोनों देशों के गुप्तचर अधिकारियों के बीच अविश्वास की गहरी जड़ों- ऐसे कई झटकों का सामना करते हुए जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ का ग्राफ चढ़ा है. अनियंत्रित चरमपंथ जानकारों का मानना है कि मुशर्रफ़ सरकार द्वारा पाकिस्तान से बाहर काम कर रहे चरमपंथी गुटों और अल-क़ायदा के बड़े नेताओं के बीच आपसी रिश्तों को न पनपने देने के कारण ही मुशर्रफ़ का पश्चिमी देशों से रिश्ता सुधरा है. चरमपंथ के ख़िलाफ़ जाँच में लगे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया, "एक समय ऐसा भी आया था कि जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती थी. हम पाकिस्तानी चरमपंथी गुटों के व्यापक प्रसार को देख कर स्तब्ध थे." इन अधिकरियों के अनुसार वॉल स्ट्रीट जर्नल के रिपोर्टर डेनियल पर्ल के अपहरण और हत्या तक पाकिस्तान में उच्च पदों पर बैठे लोगों को उन संबंधों की ज़्यादा जानकारी नहीं थी कि जो डेनियल पर्ल की हत्या के बाद हुई जाँच के बाद ही इन संबंधों के बारे में पता चल पाया. एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया, "अगर ये संबंध मज़बूत हो गए होते तो आंतकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई पाकिस्तान की सड़कों और गलियों में फैल गई होती जिसे क़ाबू में करना सरकार के लिए असंभव हो जाता." स्थानीय मुद्दा अमरीका से मिली आधुनिक गुप्तचर प्रणालियों की मदद से पाकिस्तानी अधिकारियों ने अलगाववादी चरमपंथियों को पकड़ना या मारना शुरू किया. अमरीका इसको पाकिस्तान का स्थानीय मुद्दा मानता रहा है और इसमें सीधे तौर से शामिल होने से परहेज़ करता रहा है. पिछले साल के दौरान लगभग हर चरमपंथी गुट के महत्वपूर्ण सदस्यों को या तो मार डाला गया है या फिर उन्हें पकड़ लिया गया है. इसी दौरान चरमपंथियों के हमलों में 200 से भी अधिक आम नागरिक मारे गए हैं.
राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ख़ुद भी भाग्यशाली रहे हैं कि पिछले वर्ष एक पखवाड़े के भीतर उनकी हत्या के दो प्रयास सफल नहीं हो पाए. इन सब की तुलना में सीमावर्ती वज़ीरिस्तान इलाक़े में अफ़ग़ानिस्तान से आने वाले चरमपंथियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में पाकिस्तान को ज़्यादा सफलता नहीं मिल पाई. पेशावर के सेना कमांडर लेफ़्टिनेंट जरनल सफ़दर हुसैन के अनुसार इस साल अक्तूबर तक चलाए गए 35 सैनिक अभियानों में पाकिस्तान की सेना और अर्धसैनिक बलों ने वज़ीरिस्तान में 250 चरमपंथियों को मार गिराया है. लगभग 600 चरमपंथियों को पकड़ा भी गया है. लेकिन माना जा रहा है कि लगभग 100 कट्टर चरमपंथी अभी भी वज़ीरिस्तान मे छिपे हुए हैं. इस दौरान पाकिस्तानी सेना के 175 सैनिक भी मारे गए हैं. पाँच साल पहले करगिल में भारतीय सेना के साथ हुए संघर्ष के बाद यह अब तक मारे गए सैनिकों की सबसे बड़ी संख्या हैं. ख़ाली मुट्ठी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की हाल की अमरीका यात्रा के दौरान अमरीका समर्थित आंतकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में जनरल मुशर्रफ़ की भूमिका ही एक ऐसा मुद्दा था जिस पर राष्ट्रपति बुश ने उनकी पीठ थपथपाई.
जबकि जनरल मुशर्रफ़ और किसी अन्य मुद्दे चाहे वो अमरीका को कपड़ा निर्यात पर कोटा हो, 10 साल पहले एफ-16 लड़ाकू विमानों की ख़रीद के लिए पेशगी दिए गए 10 अरब डॉलर की वापसी या फिर कश्मीर मसले पर तीसरे पक्ष द्वारा मध्यस्थता का मामला हो, कुछ भी हास़िल नहीं कर पाए. लेकिन राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ को इससे शायद कोई शिकायत भी नहीं होगी. पाकिस्तान में कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि ताक़तवर दोस्त से सिर्फ़ एक ही मुद्दे पर मिली शाबाशी जनरल मुशर्रफ़ की अमरीका यात्रा को सफल बताने के लिए काफ़ी है. जार्ज बुश की प्रशंसा से भरी टिप्पणियों की वज़ह से कराची शेयर बाज़ार तीन दिनों में 100 अंकों से भी ज़्यादा ऊपर चढ़ गया. इन सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि जनरल मुशर्रफ़ के विरोधियों को ये सीधा संदेश गया कि पाकिस्तान की राजनीति के तीन मुख्य स्तंभों अल्लाह, अमरीका और आर्मी में से एक ने मुशर्रफ़ की हिमायत की है. टीकाकारों का मानना है कि अमरीका की यह हिमायत जनरल मुशर्रफ़ के राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष दोनों पदों को संभालने के ख़िलाफ उठ रहे विपक्ष के विरोध को दबाने के लिए काफ़ी है. ऐसा लगता है कि परवेज़ मुशर्रफ़ के विरोधियों के पास अब इस बात को समझ लेने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है कि उनका प्रतिद्वंद्वी अमरीका से एक ऐसा ताक़तवर सैनिक नेता बन कर लौटा है जो स्पष्ट तौर पर सत्ता पर बने रहेगा, चाहे पाकिस्तान में लोकतंत्र के भविष्य के बारे में इसके कुछ भी मायने निकाले जाते रहें. |
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