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हक़ीकत का सामना नहीं कर पा रही है भाजपा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय जनता पार्टी के परिप्रेक्ष्य में वर्ष 2004 को देखने की शुरुआत भारत के राजनीतिक इतिहास से करनी चाहिए. नब्बे के दशक में भारतीय वोटरों ने एक नई क़िस्म की व्यवस्था इजाद कर ली. इस व्यवस्था में प्रमुख राष्ट्रीय दलों के आसपास छोटे राजनीतिक दलों का समूह बन गया जिसे राजनीतिक गठबंधन भी कह सकते हैं. 1996 में कांग्रेस के बिना पहला समूह बना और उस समूह की सरकार बनी. यह व्यवस्था 2004 तक चलती रही. छह साल तक भाजपा के समूह ने अपनी सरकार चलाई. इस समूह की अपनी उपलब्धियाँ थीं और अपनी एक राजनीतिक संस्कृति थी. नया तजुर्बा था इसलिए कुछ ग़लतियाँ भी हुईं. 2004 में एक दूसरा समूह आ गया. यह समूह कांग्रेस के इर्द-गिर्द बना था. इस समूह ने सरकार भी बना ली और भाजपा के समूह को विपक्ष में जाना पड़ा. समय पूर्व चुनाव पिछले वर्ष यानी 2003 के अंत में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव हुए और भाजपा को इसमें जीत मिली. इस जीत को भाजपा ने अपनी लोकप्रियता के सुबूत के रुप में देखा और मान लिया कि देश ने भाजपा को स्वीकार कर लिया है.
इस जीत जो आत्मविश्वास पार्टी में पैदा हुआ उसी के आधार पर उन्होंने लोकसभा के चुनाव समय से पहले करवाने का निर्णय कर लिया. इस फ़ैसले में दो ग़लतियाँ थीं. एक तो यह कि पार्टी के अंदर उस वक़्त कोई कलह नहीं थी, समूह या गठबंधन में कोई मतभेद नहीं था, सिर्फ़ तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में सफलता के आधार पर चुनाव करवाने का फ़ैसला लिया गया. दूसरी ग़लती वह थी जो भाजपा के सत्ता में आ जाने के बाद पैदा हुई राजनीतिक संस्कृति से पैदा हुई थी. इस राजनीतिक संस्कृति के चलते भाजपा एक बारहसिंगा जैसी पार्टी बन गई थी जो पानी में अपनी छवि देखकर फ़िदा हो गई थी. समय से पहले चुनाव करवाने की वजह राजनीतिक नहीं थी मनोवैज्ञानिक थी. यह मनोविज्ञान भाजपा के राजनीतिक संस्कृति का एक बड़ा हिस्सा है. भाजपा तीन राज्यों में जीत से इतने आत्मविभोर थे कि उसने राजनीतिक वास्तविकता की ओर ध्यान ही नहीं दिया. उसने अपने भविष्य को देश के भविष्य से मिला लिया. उसने कहना शुरु कर दिया कि देश का भविष्य हमारे भविष्य से जुड़ा हुआ है. यह जो भ्रम है वह भाजपा की राजनीतिक संस्कृति का बड़ा हिस्सा है. चुनाव का ढंग जिस तरह से चुनाव हुए उसमें भी बड़ी खामियाँ थीं. भाजपा ने मतदाताओं पर चुनाव के ज़रिए एक मानसिक युद्ध लाद दिया और इसमें अपना भ्रम, दोमुंहापन और धोखा सब मिला दिया. फिर वे मुस्लिम मतदातों को रिझाना भी चाहते थे और उन्हें विभाजित भी रखना चाहते थे. भाजपा का प्रचार गोयबल्स के झूठ की तरह था जिसमें देश की उपलब्धियों को बढ़ाचढ़ा कर पेश किया गया और 'शाइनिंग इंडिया' का नारा दे दिया गया. उन्होंने ग़रीबों की समस्याओं को अनदेखा किया और देश के मध्यम वर्ग को ही देश की जनता मान लिया. फिर उन्होंने अपने सपने को भारत की वास्तविकताओं से मिला कर कहना शुरु किया कि देश चमचमा रहा है. तो यह प्रचार भी अपने आपमें एक बड़ा कारण बना. देश के राजनीतिक इतिहास में यह भाजपा का योगदान भी था जिसमें उन्होंने देश को दिखाया कि लड़ाई जीतने के लिए किस तरह से भ्रम फ़ैलाया जा सकता है. भाजपा का चार महीनों का प्रचार अलग था और वास्तविकता अलग थी. वो भाजपा की आत्ममुग्धता थी. इसलिए चुनाव में वे हार गए. उनको 121 सीटें मिलीं और 25 मंत्री दैवीय ज़िम्मेदारी दूसरी बात समझने की यह है कि भाजपा का यह जो भ्रम था वह चुनाव के बाद भी बना रहा. उसने स्वीकार नहीं किया कि कांग्रेस गठबंधन की जीत हुई है. वह शेक्सपियर के किंग लीयर की तरह सड़कों में घूमघूमकर कहती रही, हम राजा हैं, हम राजा हैं. भाजपा ने एक तर्क और देना शुरु किया कि हमें वोट तो मिले हैं न, सीटें नहीं मिलीं तो क्या हुआ. यह तथ्य भी उसने अनदेखा कर दिया कि प्रजातंत्र में तो यह है कि जिसने सीटें जीतीं वही जीता. भाजपा ने वास्तविकता को स्वीकार करने से इंकार कर दिया उसने हक़ीकत से समझौता नहीं किया. इसका उदाहरण आडवाणीजी ने पिछले दिनों दिया जब उन्होंने कहा कि सत्ता में आना भाजपा की दैवीय ज़िम्मेदारी है और राजकाज चलाने के लिए स्वयं देवों ने उसे चुना है. उन्होंने कहा कि हमारा मिशन सत्ता को हासिल करना और उसे अपने पास बनाए रखना है. और भाजपा के लिए यह मानसिकता नई नहीं है. इसके पीछे उसका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है. सत्ता में रहना उनकी ऐतिहासिक और दैवीय ज़िम्मेदारी इसलिए है क्योंकि वे सांस्कृतिक राष्ट्रवादी हैं. धर्म अगर यह समझ जाएँ तो समझ में आता है कि भाजपा ने न तो संसद में विपक्ष का धर्म निभाया और न सड़कों पर. भाजपा ने संसद के अंदर तीन महीने में जो कुछ किया उस पर एक नज़र डालें.
संसद में विपक्ष की भूमिका होती है कि सरकार के जो कार्यक्रम हैं, कमियाँ हैं उनको उजागर करना और उनको पूरा करने की कोशिश करना. सरकार की वो गलतियाँ जो जनहित में नहीं हैं उनको सामने लाना और नए विचार पेश करना, नए क्रार्यक्रम देना ताकि सरकार उसको ठीक कर सके. साथ ही जनता के ज़रूरतों के बारे में बात करना. इस दृष्टिकोण से देखें तो भाजपा ने संसद में विपक्ष का धर्म नहीं निभाया. उल्टे एनडीए के संयोजक जॉर्ज फ़र्नांडिस ने भी कह दिया कि संसद अप्रासंगिक हो गई है. उनका कहना था कि जनता ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है और इसलिए हम संसद में जो कहेंगे उससे ज़्यादा सड़कों पर कहेंगे. तो इस तरह से पहले तो भाजपा गठबंधन के नेताओं ने संसद में अपना रोल कम कर दिया और सड़कों पर रोल बढ़ा दिया. इस अवधारणा के तीन हिस्से हैं. एक तो सोच यह थी कि कांग्रेस को जनादेश मिला ही नहीं है और वह अंकगणित की वजह से सत्ता में आए हैं. वोट जितने आपके हैं उतने हमारे हैं सिर्फ़ सीटें आपकी ज़्यादा हैं. इसलिए भाजपा मानती है कि सत्तारुढ़ गठबंधन को राज करने का नैतिक अधिकार ही नहीं है. हमारा काम है कि आपको हटा देना, क्योंकि आप जीते ही नहीं हैं. दूसरा भाजपा का यह ख़याल है कि यह बहुत ढुलमुल सरकार है कभी भी गिर जाएगी, यह हमारे तरह का गठबंधन थोड़े ही है जो व्यवस्थित है. ये तो सत्ता की वजह से इकट्ठे हुए हैं. भाजपा ने यह माना ही नहीं कि यह सरकार है और सरकार चल सकती है.
तो संसद में जो कुछ उन्होंने किया वह इसलिए कि वह अस्थिर सरकार है. भाजपा नेताओं ने प्रधानमंत्री के दफ्तर में जाकर कहा कि बजट ऐसा होना चाहिए. जो काम उनको संसद में कहना चाहिए था वो प्रधानमंत्री कार्यालय में कहा क्योंकि वो मानते थे कि संसद प्रासंगिक तो है नहीं. तीसरे उन्होंने जितने विषय संसद में उठाए उनका कोई ताल्लुक जनहित से नहीं था. दाग़ी मंत्री के मामले को लेकर आप शपथ ग्रहण में नहीं गए वहाँ तक तो ठीक लेकिन इस मामले में संसद को न चलने देना कहाँ तक ठीक था. आख़िर दागी मंत्री तो पहले भी होते थे. और फिर संसद में विपक्ष के हाथों में जो अवसर थे जिसमें प्रश्नकाल था, शून्य काल था उसका पारंपरिक तौर से इस्तेमाल नहीं किया गया. 2004 में भाजपा ने संसद में जो कुछ भी किया है वह संसद को ताक़तवर करने के लिए नहीं किया. उसने संसद का इस्तेमाल लोकतंत्र को कम करने आंकने के लिए किया. मैं नहीं कहूंगा कि यह तरीक़ा हिटलर की तरह का है लेकिन इस तरीक़े की अनुगूंज आपको हिटलर में मिलेगी. भाजपा इतनी सक्षम नहीं है कि हिटलर की तरह हो जाए लेकिन अनुगूंज है. हिटलर ने भी लोकतंत्र का इस्तेमाल करके लोकतंत्र की अवमानना की थी. इन्होंने भी पिछले 6 महीने में संसद का इस्तेमाल संसद को नीचा दिखाने में किया. सड़क के मुद्दे संसद के बाहर भाजपा ने जो विषय उठाए हैं. पहला था तिरंगा यात्रा जिसमें उन्होंने कहा कि हम राष्ट्रवादी हैं. लेकिन जनता के अंदर राष्ट्रवाद की भावना पैदा करने के लिए भाजपा के नेताओं ने क्या किया. दिल्ली से नेता चला बंगलोर के एयरपोर्ट से उतरा अपने लोगों के साथ संवाददाता सम्मेलन किया, उसमें अपनी बात कही, पत्रवार्ता के बाद अपने कार्यकर्ता के साथ सत्याग्रह किया और हवाई जहाज में बैठ करके बंगलोर से दिल्ली आ गया. लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह और मेनका गाँधी जितने भी लोग थे वे इसी तरह गए और आए. वह कोई जनआंदोलन तो नहीं था. वह तो मीडिया केंद्रित और अपने कार्यकर्ता को सक्रिय करने का आंदोलन था. भाजपा का दूसरा मुद्दा था मूल्य. पार्टी ने मूल्यवृद्धि के ख़िलाफ़ बहुत बड़ा जुलूस निकाला. लेकिन जब संसद में मूल्यवृद्धि पर बहस हुई तो भाजपा के कुल नौ लोग सदन में मौजूद थे. 121 में से नौ. तो आंदोलन नुमाइश के लिए था जनता के लिए नहीं. भाजपा सड़क पर एक और मुद्दा लेकर उतरी, शंकराचार्य का मुद्दा लेकर. शंकराचार्य का मुद्दा दरअसल एक आध्यात्मिक नेता, एक संन्यासी के सार्वजनिक जीवन में, राजनीति में आने की दिक़्कत से पैदा हुआ था. इस मुद्दे को भी भाजपा जनता को समझा नहीं पाई, वह जनता के भीतर कोई चेतना पैदा नहीं कर पाई. वह भी भाजपा का एक आत्मकेंद्रित प्रदर्शन बनकर रह गया. विदेशी मूल के मुद्दे को देखें. जब अरुण जेटली क़ानून मंत्री थे तो क़ानून मंत्रालय ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को लिखकर भेजा कि कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी मूल का हो यदि भारत का नागरिक है तो उसे सार्वजनिक जीवन में आने से नहीं रोका जा सकता. लेकिन विपक्ष में आए तो इस सच्चाई को भूल गए. गोविंदाचार्य को आरएसएस ने उकसाया और सुषमा स्वराज को भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने नहीं रोका कि ये क्या कर रही हो. उमा भारती का मामला उमा भारती के मामले से पार्टी की ऐसी कमज़ोरियों को उजागर कर दिया जिसका सामना पार्टी नहीं कर पा रही है. मीडिया के सामने आडवाणी और उमा भारती की जो तू-तू मैं-मैं हुई वह भाजपा में पनपी नई राजनीतिक संस्कृति का नमूना था. पार्टी का नेता जनता को बताना चाहता था कि देखो मैं कितना अनुशासन ला सकता हूँ. वह एक ड्रामा था.
मैं मानता हूँ कि उमा भारती देश की पिछड़ी ताक़तों और जनता की राजनीति का प्रतिनिधित्व करती हैं. भाजपा में ऐसी ताक़तें आगे आना चाहती हैं. प्रमोद महाजन दूसरे तरह के नेता हैं. भाजपा जाति और आर्थिक संघर्ष को समझ नहीं पा रही है. भाजपा राजतंत्र और आदर्श का जो विरोधाभास है उसे समझ नहीं पा रही है. जब भाजपा सत्ता में थी तो हिंदुत्व को पीछे रखकर गवर्नेंस की बात कर रही थी. जब सत्ता से बाहर आई तो आरएसएस के दबाव में सिंद्धांतों की बात कर रही है और गवर्नेंस को पीछे रख दिया है. उनकी दिक़्क़त को मैं समझ सकता हूँ लेकिन एक विपक्षी दल को सिद्धांतों को प्रजातांत्रिक ढाँचे में ढालकर देखना चाहिए. देश की अर्थ व्यवस्था, राजनीतिक स्थिति को देखकर फ़ैसले करने चाहिए. इन ज़रुरतों के मुताबिक़ नीति बनाना एक बात है और राष्ट्रवाद को पैमाना बनाकर नीति बनाना एकदम दूसरी. राष्ट्रवाद तो आचार व्यवहार या मनोवृत्ति है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को देश की नीति नहीं बनाया जा सकता. देश को वैकल्पिक विदेश नीति चाहिए, विज्ञान नीति चाहिए उसे आदर्श से निकली हुई नीति नहीं चाहिए. भाजपा तो पोटा जैसे क़ानून को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दृष्टि से देख रही है. आप यह नहीं कह सकते कि आतंकवाद एक चीज़ है और सुरक्षा दूसरी. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का हरा चश्मा जो भाजपा ने लगा रखा था वह विपक्ष में जाने के बाद भी लगा हुआ है. विडंबना भाजपा 1985 से हिंदुत्व को लेकर बढ़ी थी और अयोध्या को हिंदुत्व से बहुत गहरे जोड़ दिया था. इसी के आधार पर भाजपा को वोट मिले और वह सत्ता तक पहुँची. पिछले 10-15 वर्षों में हिंदुस्तान के जनमानस में धार्मिक भावना बढ़ी है. देहात के लोगों और नए मध्यवर्ग में धार्मिक लोगों की संख्या बढ़ी है. लेकिन भाजपा की त्रासदी यह है कि इस नई फ़िज़ा में भी भाजपा हारी है. लोग धर्म के प्रति अपनी आस्था को राजनीति में नहीं ला रहे हैं. भाजपा फिर हिंदुत्व की बात करना चाहती है तो मुझे लगता है कि लालकृष्ण आडवाणी का फिर भाजपा का अध्यक्ष बनना एक एंटीक्लाइमेक्स है. |
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