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बुधवार, 10 नवंबर, 2004 को 11:14 GMT तक के समाचार
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उमा भारती का निष्कासन और सवाल

उमा भारती
उमा भारती की तिरंगा यात्रा से विवाद की शुरुआत हुई
भारतीय जनता पार्टी की ऊर्जावान, चर्चित और विवादास्पद नेताओं में से एक उमा भारती को भाजपा से निलंबित किया जाना सतह पर उतना ही सहज दिखता है जितनी कि ख़ुद उमा भारती की कार्यप्रणाली लगती रही है.

बचपन से प्रवचन कर रहीं और ख़ुद को साध्वी कहने वाली उमा भारती मन को स्थिर करने की बातें तो करती रही हैं लेकिन उनका ख़ुद का मन कभी किसी भी मामले में स्थिर नहीं रहा है.

मन की अस्थिरता की वजह से वह अपने नेताओं से झगड़ लेती हैं, बार-बार संन्यास की घोषणा करती हैं और एकाएक पार्टी की अनुशासित सिपाही बन जाने की क़समें खाने लगती हैं.

आमतौर पर उमा भारती के बारे में जो कुछ कहा सुना जाता है उसके लिए उनके अपने व्यक्तित्व की जटिलताएँ ज़िम्मेदार रही हैं लेकिन इस बार मामला कुछ उनके व्यक्तित्व से भी ज़्यादा जटिल है.

पार्टी के भीतर की राजनीति

इस बार उमा भारती के साथ जो कुछ हुआ है उसकी जड़ें भी कहीं लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार में छिपी हुई हैं.

पत्रकार और विश्लेषक कहते आए हैं कि भाजपा लोकसभा चुनाव को स्वीकार नहीं कर रही है और हार के सदमे से निकलने की कोशिश भी नहीं कर रही है.

यह सदम तब और गहरा हो गया जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी भाजपा गठबंधन को हार का सामना करना पड़ा.

वेंकैया नायडू
वेंकैया नायडू को पार्टी की अंतरकलह के कारण इस्तीफ़ा देना पड़ा था

जब सरकार नहीं रही और मंत्रिमंडल की खींचतान ख़त्म हो गई तो पार्टी के दूसरी पंक्ति के नेताओं के बीच पार्टी के भीतर काम और अधिकारों की लड़ाई शुरु हो गई.

हालाँकि माना जाता है कि सुषमा स्वराज को 1999 के विधानसभा चुनावों में दिल्ली की मुख्यमंत्री बनाए जाने को भी इसी रुप में देखा गया था.

लेकिन इस बार झगड़े कुछ ज़्यादा ज़ाहिर थे. दूसरी पंक्ति के नेता मीडिया से एक दूसरे के बारे में इतनी खुली बात कभी नहीं करते थे जितनी इस बार कर रहे थे.

फिर जब उमा भारती को हुबली के एक अदालती मामले को लेकर मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा और उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर तिरंगा यात्रा निकालने का फैसला किया तभी तनाव चरम पर पहुँच चुका था.

पार्टी के लोग बताते हैं कि उसी दौरान उमा भारती की पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष वेंकैया नायडू से झड़प हुई और उसी दौरान प्रमोद महाजन से उनकी लड़ाई सतह पर उभरी.

मामला यहाँ तक पहुँचा कि वेंकैया नायडू को व्यक्तिगत कारणों का बहाना बनाकर पद से हटना पड़ा और युवा नेतृत्व को सामने लाने की बात कहने वाली भाजपा को 77 वर्षीय आडवाणी को एक बार फिर अध्यक्ष पद पर बिठाना पड़ा.

जब लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी टीम बनाई तो एक बार फिर उमा भारती को लेकर समस्या सामने आई.

आडवाणी की पहली टीम में उमा भारती का नाम नहीं था और आडवाणी ने कहा कि उमा भारती छुट्टी पर हैं इसलिए उन्हें टीम में नहीं रखा गया है, लेकिन एक हफ़्ते बाद ही उमा भारती आडवाणी से मिलने उनके घर पहुँची और फिर टीम में उनका नाम आ गया.

ख़बरें थीं कि आडवाणी ने नाराज़गी में उमा भारती को तीन घंटे अपने निवास पर बिठाए रखा था.

अब क्यों

सतह पर तो लगता है कि उमा भारती की ग़लतियों की वजह से ही उन्हें पार्टी से निलंबित किया गया है और यह अपरिहार्य था.

शायद उमा भारती ने मान लिया था कि जब भाजपा पर हिंदुत्व की ओर लौटने का दबाव बढ़ रहा है तब भाजपा उन्हें खोने का या उनकी निष्क्रियता नहीं झेल सकती.

लेकिन वे ग़लत थीं. ऐसा कम से कम लालकृष्ण आडवाणी ने तो दिखा दिया है.

भाजपा नेताओं का पोस्टर
लोकसभा में हार के बाद से ही भाजपा के भीतर खींचतान की ख़बरें मिल रही हैं

विश्लेषको की दूसरी राय यह भी है कि यह सब संघ और भाजपा की नूरा कुश्ती का एक मंचन मात्र था जिससे भाजपा को एनडीए के साथ रहकर राजनीति करने में कोई दिक़्क़त न हो.

वे मानते हैं कि भाजपा पदाधिकारियों की बैठक में जो कुछ हुआ वह पूर्व नियोजित था और इससे भाजपा राजनीतिक भविष्य का रास्ता निकालने की कोशिश कर रही है.

उनका कहना है कि ऐसा शायद पहली बार हुआ कि अनुशासन के मामले में पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में पत्रकारों को आमंत्रित किया गया था, और यह अकारण नहीं था.

फिर भाजपा पर दोहरा दबाव है जिसमें संघ परिवार की ओर से है और दूसरा एनडीए के दूसरे सहयोगी दलों की ओर से.

संघ ने आदेश दिया है कि भाजपा को हिंदुत्व की ओर वापस लौटना चाहिए और जनता दल यूनाइटेड जैसे दल कह रहे हैं कि यदि भाजपा हिंदुत्व की ओर लौटती है तो वे एनडीए में नहीं रह पाएँगे.

ऐसे में भाजपा के लिए यह आसान था कि वह अपनी एक ऐसी सदस्य को हिंदुत्व के प्रचार प्रसार में लगा दे जिसकी पहचान हिंदुत्व के आंदोलन के कारण ही बनी है और जो बाबरी मस्जिद गिराने के लिए दो बड़े नेताओं के साथ नामित की गई थीं.

इस तरह वे भाजपा में भी नहीं रहेंगी और हिंदुत्व का प्रचार करके पार्टी के लिए जगह भी बना रही होंगी.

इस कार्रवाई से दूसरी पंक्ति के नेताओं और तमाम कार्यकर्ताओं के बीच लालकृष्ण आडवाणी के बारे में यह संदेश भी अनायास ही चला गया है कि वे एक लौह पुरुष ही हैं जो किसी भी क़ीमत पर अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करने वाले हैं.

उमा भारती जिस तरह भाजपा कार्यालय 11 अशोक रोड से निकलकर झंडेवालान में संघ के कार्यालय गईं और जिस तरह विश्व हिंदू परिषद ने उमा भारती का स्वागत किया है उससे एकबारगी लगता तो यही है कि सब कुछ योजना के अनुरुप चल रहा है.

लेकिन कई सवाल और हैं.

सवाल

छह साल की सत्ता के बाद पार्टी के रुप में भाजपा को क्या मिला? इस सवाल के जवाब में पार्टी जो भी कहे, जो दिखाई दे रहा है वह यह है कि भाजपा पहले अपने आपको एक अनुशासित पार्टी कहा करती थी लेकिन अब वह ऐसा दावा करने की स्थिति में नहीं है.

उमा भारती को जिस तरह से पार्टी से निलंबित किया गया है उसने कई सवाल खड़े किए हैं.

एक तो यह कि एक जनाधार वाली नेता को, जो पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं और हिदुत्व के आंदोलन में बहुत आगे रही हैं, उनको पार्टी से निलंबित करने से क्या संकेत जाएँगे?

पार्टी के पास फिलहाल उनका क्या विकल्प है?

और उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह को पार्टी से निकालने और फिर वापस लेने के बीच पार्टी ने क्या सबक़ सीखे हैं?

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