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नक्सली आंदोलन में कई अहम मोड़ आए इस साल

नक्सलवादी
नक्सलियों के लिए राजनीतिक हलचलों का साल रहा 2004
‘‘जनता के सामने दुश्मन से हथियार छीनकर खुद को हथियारबंद बनाने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है ताकि जनयुद्ध को अंतिम विजय को मंजिल तक पहुँचाया जा सके. इस दिशा में कोरापुट एक महत्वपूर्ण लम्बा कदम है.’’

यह बयान दो ताक़तवर नक्सली संगठनों, पीपल्सवार और माओबादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया की केंद्रीय कमेटियों ने 10 फरवरी 2004 को संयुक्त रुप से जारी किया था.

कोरापुट राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 43 पर स्थित उड़ीसा का एक नक्सवाद प्रभावित ज़िला है.

छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश की सीमाओं से लगे कोरापुट ज़िले के मुख्यालय पर इस वर्ष 6 फरवरी को सीपीआई (एमएल) पीपुल्सवार की पीपुल्स गुरिल्ला आर्मी (पीजीए) के दस्तों ने एक साथ 10 ठिकानों पर हमले किए.

हमले के दौरान पूरा ज़िला एक तरह से नक्सली कब्जे में था. इस हमले में 5 सौ से ज़्यादा अलग-अलग हथियार और 25 हजार से ज़्यादा कारतूस पीपुल्सवार के हाथ लगे.

बीत रहे बरस की शुरूआत में हुए इस बड़े नक्सली हमले को पीपुल्सवार और एमसीसीआई ने ‘‘भारत में जारी माओवादी जनयुद्ध के इतिहास में महत्पूर्ण दिन ’’ कहा है.

महत्वपूर्ण वर्ष और नई पार्टी

1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से निकली चिंगारी ने, जिसे तब कानू सान्याल ने ‘‘सशस्त्र संघर्ष-ज़मीन के लिए नहीं, राजसत्ता के लिए ’’ कहा था, आज इतनी ताकत बटोर ली कि वह सीधे सत्ता प्रतिष्ठानों पर हमले कर रही है.

 वर्ष 2004 नक्सली संघर्ष की सैन्य और राजनीतिक ताकत और जनाधार के प्रदर्शन का, संसदीय जनतंत्र के ख़िलाफ चुनाव बहिष्कार के उनके राजनीतिक स्टैंड पर चर्चा का और दक्षिण एशिया के सशस्त्र वामपंथी संगठनों के बीच बढ़ते समन्वय पर नज़रें डालने का वर्ष रहा

यह कहना गलत नहीं होगा कि बीत रहा साल नक्सली राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा है.

वर्ष 2004 नक्सली संघर्ष की सैन्य और राजनीतिक ताकत और जनाधार के प्रदर्शन का, संसदीय जनतंत्र के ख़िलाफ चुनाव बहिष्कार के उनके राजनीतिक स्टैंड पर चर्चा का और दक्षिण एशिया के सशस्त्र वामपंथी संगठनों के बीच बढ़ते समन्वय पर नज़रें डालने का वर्ष रहा.

देश की नक्सली राजनीति में भी इसी वर्ष एक नया मोड़ तब आया जब पीपुल्सवार और एमसीसीआई का एकीकरण हुआ और एक नई पार्टी बनी- भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी).

और इसी वर्ष अमरीका ने आतंकवादी संगठनों की अपनी सूची में जिन 2 भारतीय संगठनों को रखा वे थे-पीपुल्सवार और एमसीसीआई.

रणनीति

पीपुल्सवार और एमसीसीआई के 21 सितंबर को हुए एकीकरण से पहले देश में पीपुल्सवार ने 7 गुरिल्ला ज़ोन घोषित कर रखे थे. ये ज़ोन दंडकारण्य, नॉर्थ तेलंगाना, साउथ तेलंगाना, नल्लामला, आंध्र-उड़ीसा बॉर्डर झारखंड में कोयिल-कैमूर इलाका तथा बालाघाट.

इनमें दंडकारण्य को अपना पहला ‘‘मुक्त क्षेत्र’’ बनाने का लक्ष्य भी पीपुल्सवार ने घोषित किया था. विलय के बाद बनी पार्टी की रणनीति भी यही बताई जाती है.

इसी वर्ष 10 फरवरी को पहली बार पीपुल्सवार ने इस इलाके में भूमकाल दिवस मनाया.

इस इलाके में नक्सली 1985 से हैं और यह पहली बार था जब इस इलाके में नक्सली आह्वान पर करीब 20 हज़ार आदिवासियों की भीड़ इकट्ठा हुई थी.

यह वो इलाक़ा है जिसे नक्सली अपना पहला आधार क्षेत्र घोषित करने की तैयारी में है, जिसे अपना पहला मुक्त क्षेत्र यानी लिबरेटेड ज़ोन घोषित करना उनका लक्ष्य है. लेकिन सुरक्षा बलों को हजारों लोगों के इस जमाबड़े की खबर भी नहीं लगी जबकि यहाँ पहुँचने के लिए गाँव के गाँव खाली हो गए थे.

लोकसभा चुनाव

यह वर्ष लोकसभा चुनावों का था, और इन चुनावों का बहिष्कार नक्सली राजनीति का अहम हिस्सा है.

चौदहवीं लोकसभा के लिए चुनाव नक्सल प्रभावित इलाकों में हिंसा के साए में हुए.

छत्तीसगढ़ का उदाहरण लें. क़रीब-क़रीब आधा छत्तीसगढ़ नक्सल प्रभावित है. इस राज्य की सीमाएँ भी लगभग हर तरफ से नक्सल प्रभावित इलाकों से घिरी हैं.

चुनाव प्रचार से लेकर मतदान और फिर पुनर्मतदान तक सिर्फ बस्तर में ही सौ से ज़्यादा पुलिस-नक्सली मुठभेड़ें हुईं.

सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम थे. सीआरपीएफ से लेकर कमांडों दस्ते तक तैनात थे. हवाई पैट्रोलिंग की गई. कई जगहों पर पोलिंग पार्टियों को हैलीकॉप्टर से पहुँचाया गया.

पीपुल्सवार का दावा था कि उसने पूरे बस्तर में ही करीब सौ बारूदी सुरंग विस्फोट किए और 2 दर्जन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें लूंटी और सैंकड़ों गाँवों में चुनाव बहिष्कार के नारे का असर था.

चुनाव बहिष्कार के नारे के साथ-साथ पीपुल्सवार ने ‘‘जनताना सरकार ’’(जन सरकार) के निर्माण का भी नारा दिया था.

बातचीत और सच

नक्सलियों के सशस्त्र संघर्ष के साथ-साथ एक सवाल हमेशा उठता रहा है कि क्या सरकार और नक्सली वार्ता की मेज पर नहीं आ सकते? क्या स्थाई शांति की कोई सूरत है?

वर्ष 2004 नक्सली-सरकार चर्चा की राजनीति का भी गवाह बना.

लोकसभा चुनाव के साथ ही आंध्रप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू पर एक बड़े नक्सली हमले के बाद नक्सलवाद आंध्र के चुनाव में बड़ा मुद्दा था.

नक्सली चंद्राबाबू नायडू से सख़्त नाराज़ थे और माना जाता है कि इसका सीधा राजनीतिक लाभ कांग्रेस गठबंधन को मिला.

यह भी माना जाता है कि इसीलिए कांग्रेस गठबंधन ने नक्सिलयों से बिना शर्त वार्ता शुरु की.

वैसे बातचीत की कोशिशें तो चंद्रबाबू नायडू की सरकार के समय भी हुई थी, लेकिन बात बनी नहीं थी.

राजशेखर रेड्डी की सरकार बनने के बाद मध्यस्थों की कोशिशों से पहले युद्ध विराम के नियम तक हुए, युद्धविराम हुआ और आख़िरकार पीपुल्सवार तथा एक अन्य नक्सली ग्रुप ‘‘जनशक्ति’’ सरकार के साथ वार्ता की टेबल पर थे.

इस समय तक पीपुल्सवार आंध्रप्रदेश में आधा दर्जन से ज़्यादा बड़ी सभाएँ कर अपने आधार का प्रदर्शन कर चुकी थी.

 हक़ीकत भी यही है कि बंदूक जिनके लिए राजनीति है और सशस्त्र राजनीतिक संघर्ष के जरिए भारत में नव-जनवादी क्रांति जिनका सपना है वे हथियार छोड़ेंगे नहीं और उनकी उठाई मांगें पूरा करना सरकार के बस में नहीं है

वार्ता के दौरान पीपुल्सवार ने भूमंडलीकरण की नीतियों, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के विनिवेश और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ तथा भूमि सुधारों के पक्ष में प्रस्ताव रखे. तेलंगाना राज्य की मांग भी इन प्रस्तावों में शामिल थी.

सरकार ने आश्वासन दिए पर पीपुल्सवार का कहना था उसे निराशा हुई.

वार्ता की इस प्रक्रिया के दौरान आंध्र में कुछ समय तो शांति रही लेकिन खबरें बता रहीं हैं कि शांति संकट में है.

हक़ीकत भी यही है कि बंदूक जिनके लिए राजनीति है और सशस्त्र राजनीतिक संघर्ष के जरिए भारत में नव-जनवादी क्रांति जिनका सपना है वे हथियार छोड़ेंगे नहीं और उनकी उठाई मांगें पूरा करना सरकार के बस में नहीं है.

पड़ोसी राज्य

आंध्र में बातचीत की इस प्रक्रिया से वहाँ तात्कालिक तौर पर युद्धविराम ने दरअसल दोनों पक्षों को अगली लड़ाई की तैयारी के लिए वक्त दे दिया. लेकिन यह अस्थाई नज़र आने वाली शांति पड़ोसी राज्यों के लिए सुविधाजनक नहीं थी.

नक्सलवादी
आंध्र में तो बात होती रही लेकिन पड़ोसी राज्यों को शिकायत थी कि उनके यहाँ गतिविधियाँ बढ़ गईं

छत्तीसगढ़ सरकार का कहना था कि आंध्र के युद्धविराम के कारण छत्तीसगढ़ में नक्सली दबाव बढ़ गया.

इस राज्य की बीजेपी सरकार का यह भी कहना था कि नक्सलवाद राष्ट्रीय समस्या है और नक्सलियों से चर्चा करनी है या नहीं करनी है इस बारे में एक नीति बने और कोई भी ऐसी पहल केन्द्र सरकार ही करे.

केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने इसी वर्ष हैदराबाद में नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक बैठक ली थी. इस बैठक में शामिल छत्तीसगढ़ सरकार के प्रतिनिधि राज्य के गृहमंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने इस मुद्दे पर केंद्र के रूख के प्रति अपना असंतोष जाहिर किया था.

लेकिन इस बैठक के करीब 2 महीने बाद उन्होंने कहा-, ‘‘...ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे केंद्र सरकार समझने लगी है कि यह देश का मामला है. केंद्र सरकार अब इस दिशा में कुछ सक्रिए हुई है.’’

छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री की यह टिप्पणी जिस वक्त आई उस समय उत्तरप्रदेश के नौगढ़ में हुए नक्सली विस्फोट को एक पखवाड़ा बीत चुका था. इस विस्फोट में पीएसी के एक दर्जन से ज़्यादा जवान मारे गए थे.

अंतरराष्ट्रीय संबंध

लेकिन ये मामला केवल देश का नहीं है.

भारत के इस सशस्त्र वामपंथी आंदोलन ने पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय संपर्क भी विकसित किए हैं.

वर्ष 2001 में दक्षिण एशिया के 11 मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठनों ने मिलकर एक संगठन बनाया सी. कॉम्पोसा यानी कॉर्डिनेशन कमेटी ऑफ माओइस्ट पार्टीज ऑफ साउथ एशिया.

इसमें मुख्य भूमिका नेपाल की सीपीएन (माओवादी) की है बल्कि कहा ये जाता है कि किसी ज़माने में एक-दूसरे के कट्टर विरोधी क्रमशः पीपल्सवार और एमसीसीआई को नजदीक लाने में भी सीपीएन (माओवादी) की महत्पूर्ण भूमिका थी.

इस वर्ष 16 से 18 मार्च तक सी कॉम्पोसा का तीसरा सम्मेलन हुआ.

इस सम्मेलन में सी कॉम्पोसा के सदस्य संगठनों में से पीबीएसपी (सीसी), (बांग्लादेश), सीपीईबी (एमएल) (लाल तारा) (बांग्लादेश), एमसीसीआई (भारत), आरसीसीआई (एमएलएम) (भारत), भाकपा(माले) नक्लबाड़ी (भारत), आरसीसीआई (एमएलएम) (भारत), सीपीएन (एम) (नेपाल) ने हिस्सा लिया.

सी.कॉम्पोसा के सदस्यों में से बांग्लादेश की दो और श्रीलंका की भी एक पार्टी को इस सम्मेलन में हिस्सा लेना था लेकिन वे हिस्सा नहीं ले पाईं.

सम्मेलन बांग्लादेश की ही एक पार्टी पीबीएसबी (एमबीआरएम) (बांग्लादेश) तथा भूटान की एक नवगठित पार्टी भूटान कम्युनिस्ट पार्टी (एमएलएम) ने पर्यवेक्षक के तौर पर हिस्सा लिया.

इसमें पारित एक राजनीतिक प्रस्ताव में कहा गया, ‘‘साम्राज्यवाद, ख़ासकर अमरीकी साम्राज्यवाद और भारतीय विस्तारवाद दक्षिण एशियाई जनता के साझा दुश्मन हैं. ’’

भारत के 37 बरस के नक्सली इतिहास में इस वर्ष हुआ पीपुल्सवार और एमसीसीआई का एकीकरण एक महत्वपूर्ण मोड़ है.

नवगठित माओवादी पार्टी के बढ़े हुए हौसलों का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके समर्थकों ने हाल ही में दिल्ली में रैली करने की कोशिश की और गिरफ़्तारी भी दी.

इस माओवादी पार्टी का संपर्क और समन्वय नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और श्रीलंका के सशस्त्र क्रांतिकारी संगठनों से है-प्रेक्षक इसे नेपाल से लेकर आंध्र प्रदेश तक माओवादी बेस एरिया बनाने की इस संगठनों की भविष्य की रणनीति के रूप में देखते हैं. हालॉकि इन संगठनों की तरफ से अभी किसी भी स्तर पर ऐसा ऐलान नहीं हुआ है.

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