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आंध्र में बातचीत से पड़ोसी राज्य शंकित | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आंध्र प्रदेश सरकार के पीपल्स वॉर से बातचीत करने के फैसले को नक्सल प्रभावित पड़ोसी राज्य बहुत गंभीरता से देख रहे है. छत्तीसगढ़ राज्य के नौ ज़िले नक्सल प्रभावित हैं और वहाँ की सरकार आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों का पुनर्वास कार्यक्रम भी चला रही है. छत्तीसगढ़ सरकार का कहना है कि ये सभी नक्सल प्रभावी राज्यों की समस्या है केवल आंध्र की नहीं इसलिए केंद्र को एक नीति बना सभी प्रभावित राज्यों के नक्सल संगठनों से बात करनी चाहिए. छत्तीसगढ़ के गृह राज्य मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का मानना है कि केवल एक राज्य में हो रही बातचीत का दूसरे राज्यों पर बुरा असर पड़ेगा. ''वहाँ पर वो आत्मसमर्पण करेंगें और अपनी गतिविधियाँ दूसरे राज्यों में चलाएँगे. बाकी राज्यों में वारदातें करके वे आंध्र में शरण लेंगे इसलिए केंद्र को सभी राज्यों से बात कर एक नीति निर्धारित की जाए.'' छत्तीसगढ़ का कहना है कि संविधान के दायरे में वह नक्सली संगठनों से बात करने को तैयार है. वही आंध्र से लगे तामिलनाडु राज्य की मुख्यमंत्री जयललिता का कहना है कि ''कोई ज़िम्मेदार राज्य कैसे एकतरफा निर्णय ले सकता है.'' उनका कहना था कि पीपुल्स वार से हटाए गए प्रतिबंध से उनकी चिंताएँ बढ़ी हैं. आर्थिक रुप से पिछड़े राज्यों में ये समस्या बढ़ रही है क्योंकि लोगों को लगने लगा है कि सरकारी तंत्र पूरी तरह से नाकाम हो गया है. इन राज्यों में नक्सल संगठनों को जनसमर्थन भी प्राप्त है. झारखंड के पुलिस महानिदेशक एसएम कैरे का कहना है कि ''नक्सलवादियों को मुख्यधारा से जुड़ना चाहिए और अपने हिंसक अभियान को छोड़ देना चाहिए. '' आंध्र प्रदेश की ही तरह उड़ीसा सरकार भी नक्सल संगठनों से बात करने को तैयार है पर मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का कहना है कि उनकी सरकार बिना किसी शर्त के नक्सलवादियों से बातचीत के लिए तैयार है. केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार नक्सलवाद को एक सामाजिक आर्थिक समस्या के रुप में देखती है और इसके निवारण के लिए वचनबद्ध है. पर सरकार की आंध्र में पहल की परीक्षा की घड़ी तब आएगी जब अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों में कोई बड़ी नक्सल वारदात होती है. |
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