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गुरुवार, 22 जुलाई, 2004 को 16:18 GMT तक के समाचार
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नक्सली दूसरे राज्यों में भी बातचीत को तैयार

नक्सलवादी कार्यकर्ता
आँध्र प्रदेश की नई सरकार ने नक्सलियों से बातचीत की पहल की है
झाड़ियों से घिरे तंग और गंदे रास्तों से गुजरते हुए जब आप नलम्मा के जंगलों में प्रवेश करते हैं तो आप के सामने एक गहरा सन्नाटा पसरा होता है.

नलम्मा का ये जंगल आँध्र प्रदेश के पाँच जिलों तक फैला हुआ है.

इन जंगलों में वन्य जीव बड़ी तादाद में हैं और ये तेंदुओं के अभ्यारण्य के रूप में प्रसिद्ध है.

लेकिन इस जंगल की ख़ासियत बस इतनी भर नहीं है, ये जंगल पीपुल्स वॉर ग्रुप (पीडब्लूजी) के नक्सलियों का आशियाना भी हैं और इन्हीं नक्सलियों के एक नेता से मुझे इन गहरे-घने जंगलों में मुलाकात करनी थी.

घने जंगलों में

मैं और दो अन्य स्थानीय पत्रकार कुरनूल जिले में महानंदी के पास अपने वाहन छोड़कर पैदल ही आगे की यात्रा के लिए बढ़े.

नक्सली नेताओं के साथ पत्रकार
घने जंगलों के बीच नक्सली नेताओं ने पत्रकारों से बात की

हम जैसे ही जंगल में घुसे, दो हथियारबंद नौजवान हमें सुरक्षा देने के लिए हमारे साथ हो लिए.

इस गहरे अँधेरे जंगल में हम अपनी-अपनी टॉर्च के सहारे आगे बढ़ रहे थे.

हालाँकि इस समय ये टॉर्च हमारे लिए बहुत मददगार थीं पर कुछ माह पहले तक यही टॉर्च की रोशनी हमारे लिए एक ख़तरनाक कदम साबित हो सकती थीं क्योंकि इन्हें लेकर घूमना साहस भरा काम था और उन पुलिसकर्मियों के लिए गोली दागने के लिए संकेत हो सकता था जो उस दौरान नक्सलियों की खोज में इन्हीं जंगलों में घूम रहे थे.

चंद्रबाबू नायडू की सरकार के पतन और कांग्रेस के सत्ता में आते ही दोनों ही ओर से एक अघोषित संघर्षविराम तल रहा है और हिंसक वारदातों में नाटकीय ढंग से कमी आई है.

अब पुलिस जंगलों से दूर रह रही है.

कुछ किलोमीटर चलने के बाद हमने देखा कि ज़मीन पर किसी बड़े जंगली जीव के पैरों के निशान हैं. ये एक भालू के पँजों के निशान थे, ऐसा दोनों सुरक्षाकर्मियों में से एक, दयानंद ने बताया. मैंने घबराकर अँधेरे में अपनी टॉर्च की रोशनी फेंकी कि कहीं वो भालू यहीं कहीं तो नहीं है. लेकिन तभी दयानंद ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा, "जितना हम इन जानवरों से डरते हैं, उतने ही ये भी हमसे डरते हैं."

हम साँस रोके पथरीले रास्ते पर बग़ैर बहुत कुछ बोले करीब चार घंटों तक आगे बढ़ते रहे. आधी रात के वक्त हम एक सुरक्षित स्थान पर पहुँचे.

अप्पाराव से मुलाक़ात

चारों ओर पहाड़ों से घिरी इस छोटी सी खुली जगह पर एक लम्बी कद-काठी के काले आदमी, प्रकाश ने हमारा स्वागत किया.

अप्पाराव
अप्पाराव को पुलिस एक बार गिरफ़्तार कर चुकी है

प्रकाश ने गहरे काई-हरे रंग की फौजी वर्दी पहन रखी थी और उसके कँधे पर एक स्टेनगन झूल रही थी.

प्रकाश पीपुल्स वॉर ग्रुप के पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं और सुरक्षा कारणों के चलते उन्होंने अपना पूरा नाम नहीं बताया.

कुछ ही देर बाद वहाँ शाकामूरी अप्पाराव भी आ गए जिन्होंने एके-47 राइफ़ल ले रखी थी.

40 वर्षीय राव का चेहरा हमारे लिए नया नहीं था क्योंकि हम सभी उनकी 1993 की गिरफ्तारी के दौरान उन्हें जान गए थे.

राव पर हैदराबाद के उप पुलिसमहानिरीक्षक की हत्या का आरोप था. 2000 में ज़मानत पर रिहा किए जाने के बाद से वो भूमिगत हैं और पीपुल्स वॉर ग्रुप के राज्य स्तर के वरिष्ठ नेता हैं.

जब हम अपनी सोने की तैयारी कर रहे थे, तभी मौसम ख़राब हो गया और तेज़ बारिश शुरू हो गई.

हमारे मेज़बानों ने प्लास्टिक की चादरों को पेड़ से बाँध कर एक ओट बनाई और उसी के नीचे हमने अपनी रात गुज़ारी.

हमें सुबह की बैठक का इंतज़ार था ताकि हम पीपुल्स वॉर ग्रुप का सरकार के साथ बातचीत को लेकर क्या सोचना है, इसकी जानकारी ले सकें. प्रकाश बताते हैं, "हालाँकि सरकार और हमारी, दोनों ही ओर से संघर्ष विराम की घोषणा कर दी गई है पर इस बारे में सरकार की ओर से कोई अँतिम प्रारूप अब तक सामने नहीं आया है."

हम प्रकाश और राव के साथ वॉर ग्रुप की रणनीति के बारे में बातचीत के लिए बैठे थे और कुछ अंगरक्षक नाश्ता वगैरह तैयार करने में लग गए.

प्रकाश कहते हैं, "ये सब पुलिस वालों का दुष्प्रचार है और ये कुछ नहीं करने वाले, इससे इन्हें नायडू के शासन के दौरान करोड़ों की कमाई हुई है."

राव कहते हैं कि हाल ही में एक पुलिस एजेंट ने उनके दो साथियों को मार दिया जबकि दो अन्य लोगों को घायल कर दिया. ऐसे में ये कैसी बातचीत करना चाह रहे हैं.

हालांकि राज्य के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी इसे वॉर ग्रुप की आंतरिक कलह का नतीजा मानते हैं.

पर प्रकाश कहते हैं कि बिना जाँच के मुख्यमंत्री ऐसा कैसे कह सकते हैं. अगर सरकार इस तरह की गतिविधियों को नियंत्रित नहीं करती है तो इससे शांति प्रक्रिया का हल संदिग्ध ही है.

शांति का सवाल

लोगों के दिमाग में एक बड़ा सवाल है कि क्या इस बातचीत के बाद शांति बहाल हो सकेगी और वॉर ग्रुप हथियार छोड़ देगा.

 हम जानते हैं कि हम केवल हथियारों के बल पर अपनी लड़ाई नहीं जीत सकते हैं और यह जनसमर्थन से ही संभव है. हमने हथियार अपनी सुरक्षा के लिए रखे हैं. पुलिसवालों के एजेंट और खबरिए हमें अकसर भारी नुकसान पहुंचाने की कोशिश में रहते हैं. ऐसे में हम जोखिम नहीं उठा सकते
प्रकाश, नक्सली नेता

इस पर प्रकाश का तर्क है, "ऐसा सोचना ग़लत है क्योंकि हमारा संघर्ष साम्राज्यवादी और सामंती ताकतों के ख़िलाफ़ है और सशस्त्र संघर्ष के बिना इन्हें हटा पाना संभव नहीं है."

"हमें हथियार रखने का अधिकार है पर हम इसकी ज़िम्मेदारी लेते हैं कि जब तक युद्ध-विराम चल रहा है, हम शांति बनाए रखेंगे."

लेकिन ऐसे में इस बातचीत का क्या हल निकलने वाला है, इस बारे में प्रकाश बताते हैं, ''सबसे पहले तो हम यह चाहते हैं कि एक ऐसा माहौल बने जो लोकतांत्रिक हो और जिसमें लोगों को संगठित होकर अपने लिए संघर्ष करने का अवसर मिल सके. ऐसा माहौल पिछले दो दशकों से देखने को नहीं मिला है और इसकी वजह सरकार और पुलिस का दवाब है.''

''दूसरा यह कि हम हिंसक वारदातों को कम से कम करना चाहते हैं, ऐसा तभी तक होगा जब तक की पुलिस की ओर से संघर्ष विराम जारी रहेगा. अगर पुलिस दुबारा हथियार उठाती है तो हम भी पीछे नहीं रहेंगे.''

''हम जानते हैं कि हम केवल हथियारों के बल पर अपनी लड़ाई नहीं जीत सकते हैं और यह जनसमर्थन से ही संभव है. हमने हथियार अपनी सुरक्षा के लिए रखे हैं. पुलिसवालों के एजेंट और खबरिए हमें अकसर भारी नुकसान पहुंचाने की कोशिश में रहते हैं. ऐसे में हम जोखिम नहीं उठा सकते.''

योजना

जब प्रकाश से पूछा गया कि क्या कभी ऐसी स्थिति आएगी जब पीपुल्स वार ग्रुप के लोग अपने हथियार छोड़ देंगे, उनका कहना है, ''नहीं ज़्यादा से ज़्यादा यही हो सकता है कि हम अपने हथियारों के साथ गांव में नहीं जाएंगे, लेकिन ऐसा तभी होगा, जबकि पुलिस हमें मुक्त होकर काम करने दे. लेकिन अगर पुलिस हथियार लेकर गांवों में आती है तो हम भी हथियार लेकर जाएंगे. ये वर्ग संघर्ष है, जो बिना हथियार के संभव नहीं है. ऐसा संभव नहीं है कि बातचीत के दौरान सरकार हमारी सारी मांगों को मान ले.''

नक्सलियों की योजना
 हम ऐसी दुकानों को जला देंगे जो किसानों को ख़राब बीज और दवाइयाँ बेचते हैं. हम गाँवों को खून चूसने वाले सूदखोरों से मुक्त कराएंगे और गाँव के स्तर पर ऐसी समितियां बनाई जाएंगी जिनके माध्यम से गाँवों के सभी कामकाज किए जाएँगे

जब उनसे पूछा गया कि पीपुल्स वार ग्रुप अपने जनसमूहों जैसे छात्रों, युवाओं और किसानों के संगठनों के माध्यम से क्या हासिल करना चाहता है, प्रकाश ने बताया कि सबसे पहले तो हम भूमिहीनों को जमीन बाटेंगे, साथ ही किसानों का पूरा कर्ज़ माफ़ किया जाएगा जिसके चलते किसानों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.

हम ऐसी दुकानों को जला देंगे जो किसानों को ख़राब बीज और दवाइयाँ बेचते हैं. हम गाँवों को खून चूसने वाले सूदखोरों से मुक्त कराएंगे और गाँव के स्तर पर ऐसी समितियां बनाई जाएंगी जिनके माध्यम से गाँवों के सभी कामकाज किए जाएँगे."

पर क्या ऐसा करना एक समानांतर व्यवस्था को लाने जैसा नहीं है? इस सवाल पर प्रकाश कहते हैं, "इसमें गलत क्या है. जो हम कर रहे हैं वो गैर-कानूनी नहीं है. हम ग्रामवासियों को अधिक ताकतवर और अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिए सक्षम बना रहे हैं."

दूसरे राज्यों में भी

नक्सली
नक्सली दूसरे राज्यों में भी अनुकूल माहौल बनने पर बातचीत को तैयार हैं
पीपुल्स वार ग्रुप चाहता है कि सबसे पहले सरकार पिछले नौ सालों के चंद्रबाबू नायडू के शासन के दौरान तक़रीबन दो हजार लोगों के मारे जाने की न्यायिक जाँच कराए. इनमें से कई तो वार ग्रुप के सदस्य थे, जिन्हें पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ों में मार डाला.

प्रकाश कहते हैं कि जब तक इस पूरे प्रकरण की न्यायिक जाँच कराकर दोषी पुलिस अधिकारियों को सजा नहीं दी जाएगी, तब तक सरकार के प्रति लोगों के मन में एक विश्वास कायम नहीं हो सकेगा.

प्रकाश आगे कहते हैं कि अगर अन्य राज्यों में भी जहाँ पर पीपुल्स वार ग्रुप की गतिविधियाँ सक्रिय हैं अगर सरकार संघर्ष-विराम की घोषणा करती है और बातचीत के लिए एक अनुकूल वातावरण बनाती है तो वहाँ पर भी सरकार से बातचीत संभव है.

ग़ौरतलब है कि आँध्रप्रदेश के अलावा पश्चिमबंगाल, बिहार, झारखँड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश व पंजाब के कुछ हिस्सों में भी पीपुल्स वार ग्रुप सक्रिय है.

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