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बदल गया है नक्सलबाड़ी का चेहरा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
किसी जमाने में सशस्त्र क्रांति का बिगुल बजा कर पूरा दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचने वाले नक्सलबाड़ी का चेहरा पूरी तरह बदल गया है. पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में नेपाल की सीमा से लगा यह कस्बा अपने नक्सली अतीत और आधुनिकता के दौर के बीच फंसा है. नक्सलवाद शब्द इसी नक्सलबाड़ी की देन है. लेकिन साठ के दशक के आखिर में किसानों को उनका हक दिलाने के लिए यहाँ जिस नक्सल आंदोलन की शुरूआत हुई थी, अब यहाँ उसके निशान तक नहीं मिलते. कभी क्रांति के गीतों से गूंजने वाली इसकी गलियों में अब रीमिक्स गाने बजते रहते हैं. स्थानीय युवकों ने तस्करी को अपना मुख्य पेशा बना लिया है. यहाँ आंदोलन के अवशेष के नाम पर नक्सल नेता चारू मजुमदार की इक्का-दुक्का मूर्ति नजर आती है. इस बदलाव से नक्सल नेता कानू सान्याल काफी हताश हैं. लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी है. अपनी 76 साल की उम्र और तमाम बीमारियों के बावजूद वे इलाके के लोगों में अलख जगाने में जुटे हैं. वर्ष 1967-68 में नक्सल आंदोलन को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं कि नक्सलवाद के जन्मस्थान पर ही उसका कोई नामलेवा नहीं बचा है.यह कस्बा अब आधुनिकता के चपेट में आ गया है. मुखर्जी कहते हैं कि जो आंदोलन पूरी दुनिया के लिए एक आदर्श बन सकता था, वह इतिहास के पन्नों में महज एक हिंसक आंदोलन के तौर पर दर्ज हो गया. भारत-नेपाल सीमा पर विदेशी सामानों की दुकान चलाने वाले प्रमथ सिंहराय कहते हैं कि अब यहाँ देशी-विदेशी फ़िल्में ही युवा पीढ़ी की चर्चा का प्रमुख विषय है. नक्सल आंदोलन एक ऐसा अतीत है जिसे कोई भूले-भटके भी याद नहीं करना चाहता. रोज़गार का कोई वैकल्पिक साधन नहीं होने के कारण युवा पीढ़ी तस्करी में जुट गई है. अब सीडी प्लेयर व सेलफोन उनके जीवन का हिस्सा बन गए हैं. भूला अतीत सिलीगुड़ी में आंदोलन के शीर्ष नेता चारू मजुमदार का मकान जर्जर हालत में है.यह बूढ़ा मकान नक्सलियों की अनगिनत गोपनीय बैठकों का मूक गवाह रहा है.
मजुमदार की 1972 में संदिग्ध परिस्थिति में पुलिस की हिरासत में मौत हो गई थी. आंदोलन के दिनों के बचे-खुचे नेता अब मजुमदार के जन्मदिन पर उनकी मूर्ति पर माला चढ़ाकर अपना कर्तव्य पूरा कर लेते हैं. अब नक्सलियों के अनगिनत गुट बन गए हैं. आंदोलन के शीर्ष नेताओं में से एक सान्याल कहते हैं कि यहाँ नक्सल आंदोलन अपने मूल मकसद से भटक कर आतंकवाद की राह पर चल पड़ा था. यही उस आंदोलन की विफलता की वजह बना. सान्याल अब भी शोषितों के हक में एक हारी हुई लड़ाई लड़ते हुए नक्सलबाड़ी से कोलकाता के बीच दौड़ते रहते हैं. सान्याल कहते हैं कि जब तक सांस बाकी रहेगी, भूमिहीनों के हक में लड़ता रहूँगा. मजुमदार, सान्याल और उनके जैसे नेताओं ने ही रातोंरात नक्सलबाड़ी को किसान आंदोलन का पर्याय बना दिया था. लेकिन अब वे नक्सलबाड़ी की मौजूदा स्थिति पर महज अफसोस ही कर सकते हैं. |
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