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'यह सरकार का साथ देने का संकेत है' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वरिष्ठ पत्रकार और आउटलुक पत्रिका के प्रधान संपादक विनोद मेहता का कहना है कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने सोमनाथ चटर्जी को लोकसभा अध्यक्ष बनाने का फैसला करके यह संदेश दे दिया है कि वह पूरी तरह सरकार के साथ है और आसानी से सरकार को गिरने नहीं देगी. वे मानते हैं कि लोकसभा अध्यक्ष का पद स्वीकार करना सरकार में शामिल होने जैसा नहीं है. विनोद मेहता ने बीबीसी हिंदी से कहा कि वामपंथी दलों के सामने एक सवाल था कि सोमनाथ चटर्जी लोकसभा के वरिष्ठ सांसद हैं और वे वामदलों की बातों को संतुलित ढंग से रखते आए हैं और यदि उनको लोकसभा अध्यक्ष बना दिया जाता है तो उनकी जगह कौन लेगा. ''लोकसभा अध्यक्ष का पद बहुत अधिकारों और ज़िम्मेदारियों वाला पद है और बहुत महत्वपूर्ण भी है.''
विनोद मेहता का कहना है, ''मार्क्सवादी पार्टी अब सरकार के भीतर भी नहीं है लेकिन उन्होंने सरकार को समर्थन दिखाने का दूसरा सबसे अच्छा विकल्प चुना है.'' उनके अनुसार सबसे अच्छा विकल्प तो था कि वे सरकार में शामिल हो जाते. उन्होंने कहा, ''1996 में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री नहीं बनाने के निर्णय को ऐतिहासिक भूल की तरह याद किया जाता है. यक़ीनन इस बार भी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सामने दुविधा थी.'' उनका कहना है कि वामपंथी दलों ने सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह को साफ़ संदेश दे दिया है कि वे पूरी तरह से सरकार के साथ हैं. विनोद मेहता का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी कह रही थी कि इस सरकार को कम्युनिस्ट ही गिराएँगे लेकिन इस निर्णय के बाद ऐसा कहना कठिन हो जाएगा. |
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