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अमरीकी चुनाव और महिलाएँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
माना जा रहा है कि 2008 के अमरीकी चुनाव में जितना महत्व महिलाओं के वोट को दिया गया है उतना अबतक शायद ही किसी चुनाव में देखा गया हो. जिस देश में 1920 तक महिलाओं को वोट डालने का अधिकार नहीं रहा हो, जहाँ आजतक कोई महिला राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति नहीं बन पाई हो, वहां आज रिपब्लिकन्स और डेमोक्रेट्स दोनों ही महिलाओं को रिझाने के लिए बिछे जा रहे हैं. बहुत लोगों की यहाँ यही सोच थी कि महिला जब राजनीति में उतरती है तो उसे पुरूष बना पड़ता है, पैंट सूट पहनना पड़ता है, उसी अंदाज़ में अपने को ढालना पड़ता है. और शायद इसलिए जब हाइ हील्स और घुटनों तक की डिज़ाइनर स्कर्ट पहने 44 साल की ख़ूबसरत और अनजानी सेरा पेलिन को जॉन मैकेन ने अपने उपराष्ट्रपति पद के लिए चुना तो अमरीका कुछ वक्त के लिए ही सही लेकिन चौंका ज़रूर. बहुत लोगों ने उनकी क़ाबिलियत और तजुर्बे पर सवाल उठाए और अभी भी उठा रहे हैं लेकिन बराक ओबामा की चमक के सामने पस्त हो रही रिपब्लिकन पार्टी में उनके आने से अचानक से नई जान आ गई इसमें कोई शक नहीं. सेरा और हिलेरी
रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैकेन अपनी पसंद की तारीफ़ करते नहीं थकते और उनके चाहनेवाले नारे लगाने में. उनके नाम की टीशर्ट पहनकर हवा में अपनी लिपस्टिक लहराते हुए उनकी रैलियों में आनेवाली महिला वोटर उन्हें एक रोल मॉडल की तरह देख रही हैं, कोई अपनी बेटी को उनके जैसा बनाना चाहती है तो कोई उनमें अमरीकी परिवार का भविष्य देखती है. और शायद यही वजह है कि बहुत से विश्लेषकों का कहना है कि रिपब्लिकन पार्टी की रूढ़िवादी सोच जॉन मैकेन से ज़्यादा सेरा पेलिन के करीब नज़र आती है और बहुत से लोगों ने तो इसे पेलिनाइज़ेशन ऑफ़ रिपब्लिकन पार्टी का नाम दिया है. वहीं डेमोक्रेटिक पार्टी में भी बराक ओबामा हिलेरी क्लिंटन को चाहनेवाली महिला वोटरों पर पूरा ध्यान दे रहे हैं और जब भी एक साथ किसी चुनावी रैली में उतरते हैं तो भीड़ के साथ साथ खुद भी हिलेरी-हिलेरी के नारे लगाते हैं. महिलाओं को अपनी तरफ़ खींचने के लिए उन्होंने अलग से इश्तहार बनवाए हैं और मैकेन के बारे में तो कहा जा रहा है कि सेरा पेलिन को लाने का मक़सद ही था महिला वोटरों ख़ासकर हिलेरी क्लिंटन को चाहनेवाली महिलाओं को अपनी ओर खींचना. महिला वोट
लेकिन महिला वोट एक ब्लॉक की तरह हो ऐसा बिल्कुल नहीं है. एक रिपब्लिकन वोटर केटी गरेल बताती हैं कि एक महिला होने के नाते उनके लिए इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा है बेगुनाह की जान बचाना यानि वो हर हाल में गर्भपात के ख़िलाफ़ हैं. इस के साथ ही बंदूक रखने का अधिकार, कम टैक्स जैसे मुद्दे हैं जिनकी वजह से सेरा पेलिन की सोच उनसे मेल खाती है. और इसलिए उनके जैसी जो वोटर हैं वो एक महिला होने के बावजूद हिलेरी क्लिंटन को कभी वोट नहीं देतीं. उनमें से कुछ की नज़रों में वो कुछ ज़्यादा ही दबंग हैं. डेमोक्रेटिक पार्टी की महिला वोटरों का रूख़ भी कोई अलग नहीं है. वो भी केवल महिला होने की वजह से सेरा पेलिन को वोट दे दें ऐसा बिल्कुल नहीं है. बहुत हैं जो उन्हें इस ओहदे के काबिल ही नहीं मानतीं. और ये एक बड़ी वजह रही है कि ऐसी बहुत सारी महिलाएँ जो न तो डेमोक्रेट थीं न रिपब्लिकन, जो महिला होने के नाते हिलेरी क्लिंटन का साथ दे रही थीं, वो बराक ओबामा की तरफ जा रही हैं. सर्वेक्षण हाल ही में हुए एक सर्वे का कहना है कि 81 प्रतिशत महिलाएँ जो हिलैरी के साथ थीं अब ओबामा के साथ आ चुकी हैं. महिलाएँ आमतौर पर पुरूषों से ज़्यादा तादाद में वोट डालती हैं और हाल के चुनाव पूर्व सर्वेक्षण की मानें तो 54 प्रतिशत महिलाएँ ओबामा के पक्ष में हैं, 39 प्रतिशत मैकेन के पक्ष में. वैसे इन सबसे बिल्कुल ही अलग महिलाओं का एक वो तबक़ा भी है जिन्हें आज भी देश की बागडोर संभालने के लिए एक पुरूष पर ज़्यादा यकीन है. 76 साल की एक महिला रोज़मेरी क्विगली कहती हैं,"जब मेरे पिता काम के बाद शाम में घर लौटते थे तो उन्हें लगता था कि अब सबकुछ ठीक है और इसलिए उन्हें लगता है कि देश की बागडोर एक मर्द के हाथ में हो तो सबकुछ ठीक रहेगा." चुनाव में जीत हार जिसकी भी हो, हिलेरी क्लिंटन राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार नहीं बन पाईं, अभी के सर्वेक्षण कह रहे हैं सेरा पेलिन भी शायद उपराष्ट्रपति नहीं बन पाएं, लेकिन फिर भी ये साल महिलाओं के लिए ख़ास रहा है. अमरीकी इतिहास की पहली उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार, जेरैल्डिन फ़ेरारो के शब्दों में, इसका असर एक लहर की तरह होगा, ये रूकेगा नहीं ये फैलता जाएगा. |
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