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चुनाव में अर्थव्यवस्था बना बड़ा मुद्दा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में अब गिने चुने दिन रह गए हैं और जैसा कि अंदाज़ा था अर्थव्यवस्था अब वहां सबसे महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बन गया है. कुछ हफ़्ते पहले तक रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैक्केन और डेमोक्रेटिक उम्मीदवार बराक ओबामा बराबरी पर चल रहे थे, लेकिन जैसे जैसे अर्थव्यवस्था की नब्ज़ धीमी होती दिख रही है, बराक ओबामा के सितारे ऊपर जाते दिख रहे हैं. कारण वैसे तो बिल्कुल साफ़ है. जॉन मैक्केन रिपब्लिकन उम्मीदवार हैं और पिछले आठ सालों से रिपब्लिकन ही सत्ता में रहे हैं. बराक ओबामा ने अपने बयानों में और विज्ञापनों में कोई कसर नहीं छोड़ी है ये दिखाने में कि मैक्केन और बुश में कोई अंतर नहीं है. राष्ट्रपति बुश की रेटिंग इन दिनों धूल चाट रही है. लेकिन बाज़ार तो उठते गिरते रहे हैं. इस बार ऐसा क्या है कि उसकी वजह से चुनावी हवा का रूख़ बदल गया है? कोई भी टेलीविज़न चैनल खोल लें, कोई अख़बार उठा लें इसका जवाब साफ़ नज़र आता है. वाल स्ट्रीट की मार आम आदमी पर पड़ रही है. किसी के पास काम कम हो गया है तो वो बचत नहीं कर पा रहा है और उसे डर सता रहा है कि यही हाल रहा तो वो कभी अपना घर नहीं खरीद पाएगा... कुछ हैं जिनके पास अपना घर तो है लेकिन डर इस बात का है कि वो छिन जाएगा और बाल बच्चों के साथ वो सड़क पर आ जाएँगे. लोगों का सरकार पर यकीन नहीं है और उनमें घबराहट इस बात की भी है कि बैंकों में भी जो थोड़े बहुत पैसे उन्होंने जमा किए हैं वो न डूब जाएं. पाकिस्तान से अमरीका आकर बसे सागिर ताहिर न्यू हैंपशायर से रिपब्लिकन टिकट पर राज्य में विधायक के चुनाव में खड़े हैं. वो कहते हैं, "कई ऐसे लोग मिलते हैं जो रोने लगते हैं. ये वो लोग हैं जिन्होंने कड़ी मेहनत की है और ग़ैरतमंद ज़िंदगी बिताई है और अब बुढ़ापे में उन्हें सब कुछ लुटता हुआ दिख रहा है." बड़े बड़े सुपरस्टोर्स खाली नज़र आते हैं, ख़रीददार बस ज़रूरतभर की चीज़ खरीद रहे हैं क्योंकि डर है कि शायद और बुरे दिन आनेवाले हैं. उल्टी गिनती शुरू इस माहौल को देखते हुए जॉन मैक्केन पूरी कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें और उनकी नीतियों को बुश से अलग रख कर देखा जाए. बल्कि ओबामा के साथ हुई बहस में भी इस मसले पर वो उखड़ से गए. उन्होंने कहा, "मैं बुश नहीं हूं और अगर आपको बुश के ख़िलाफ़ लड़ना था तो चार साल पहले चुनाव में खड़ा होना था."
अपनी दलीलों में वो सभी के लिए करों में कटौती की बात कर रहे हैं जिससे कि बड़ी कंपनियां और नौक़रियां दे सकें और लोगों की जेब में पैसा आए. साथ ही उन्होंने ऐलान किया है कि जिस सात सौ अरब डॉलर के पैकेज को अभी मंज़ूर किया गया है उसमें से 300 अरब डॉलर से सीधा उनलोंगों के कर्ज़ ख़रीद लिए जाएं जो उन्हें चुका नहीं पा रहे और उनसे नए सिरे से बात की जाए कि हर महीने वो कितना पैसा दे पाएंगे. बराक ओबामा का कहना है कि वो लोगों को सीधे राहत देने के हक़ में हैं लेकिन मैक्केन के इस फ़ैसले से बैंकों को ही फ़ायदा पहुंचेगा, आमलोगों को नहीं. मैक्केन की मुश्किल ये भी है कि जनता अर्थव्यवस्था के मामले पर ओबामा पर ज़्यादा यकीन कर रही है. उन तक जो संदेश पहुंचा है वो ये कि रिपब्लिकन केवल बड़े बड़े बैंकों और पैसेवालों को बचाएंगे, आम आदमी को नहीं. ऐसे में मैक्केन बस प्रार्थना कर सकते हैं कि या तो विदेश नीति से जुड़ा कोई बड़ा मामला सामने आ जाए, देश की सुरक्षा का मुद्दा अचानक से सुर्ख़ी बन जाए. क्योंकि इन मामलों पर वो ओबामा पर भारी पड़ते हैं, या फिर ओबामा के बारे में कोई गड़ा मुर्दा सामने आ जाए कि लोग उनसे मुँह फेर लें. दिक्कत बस ये है कि चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. |
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