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रविवार, 19 अक्तूबर, 2008 को 11:54 GMT तक के समाचार
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पाक-अफ़ग़ान पर चुनाव का असर

बुश-मनमोहन
बुश प्रशासन के तहत भारत-अमरीका संबंधों को नया आयाम मिला है
अमरीका के लिए पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान अहम मुद्दे रहे हैं हालांकि वहाँ मचे आर्थिक कोहराम के कारण अमरीका का ध्यान फिलहाल कुछ बटा है.

अमरीका की प्रमुख पार्टियाँ चाहे वो डेमोक्रेटिक हो या फिर रिपब्लिकन पार्टी-दोनों आतंक के ख़िलाफ़ जंग में पाकिस्तान को काफ़ी अहमियत देती हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में अल क़ायदा के ख़िलाफ़ लड़ाई जीतने के लिए अमरीका को पाकिस्तान का सहयोग मिलना बहुत महत्वपूर्ण है. इसलिए वहाँ जो पार्टी भी सत्ता में आएगी उसे पाकिस्तान को साथ लेकर चलना ही होगा.

अगर रिपब्लिकन पार्टी सत्ता में आती है तो अमरीका की पाकिस्तान नीति में कोई बड़ा बदलाव होने के आसार नहीं है. जो नीतियाँ चल रही हैं, जॉन मैक्केन उन्हीं नीतियों को जारी रखेंगे.

लेकिन अगर डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता में आती है तो उसका इरादा यही होगा कि पाकिस्तान की मदद से अफ़ग़ानिस्तान में कड़ाई के साथ लड़ाई की जाए. पार्टी के नामज़द उपराष्ट्रपति जो बाइडन ने तो ये भी मशवरा दिया है कि पाकिस्तान को एक बड़ी रक़म दी जाए ताकि उसकी अर्थव्यवस्था संभल जाए और पाकिस्तान बेहतर तरीके से अमरीका की मदद कर सके.

(खालिद अहमद पाकिस्तान के द डेली टाइम्स अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

ज़ोर अफ़ग़ानिस्तान पर

ओबामा इराक़ के बजाय अफ़ग़ानिस्तान पर ध्यान देना चाहते हैं

अगर बराक ओबामा राष्ट्रपति बनते हैं तो बड़ा फ़र्क़ ये होगा कि वे अमरीकी सेना को इराक़ से निकालने की कोशिश करेंगे और ज़्यादा ध्यान अफ़ग़ानिस्तान पर होगा.

ओबामा ने हाल ही में बयान दिया था कि अगर पाकिस्तान में अल क़ायदा के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई की ज़रूरत पड़ी तो वो पाकिस्तान सरकार की अनुमति के बिना भी ऐसा करेंगे.

लेकिन जो लोग पाकिस्तान के ज़मीनी हालात जानते हैं वो इस बात को समझते हैं कि ओबामा का बयान किसी बुरी मंशा से नहीं दिया गया क्योंकि पाकिस्तान में अल क़ायदा से लड़ने के लिए काबिलियत कुछ ज़्यादा नहीं है.

मिसाल के तौर पर मान लीजिए कि ओसामा बिन लादेन बाजौड़ में हैं और पाकिस्तान सही तरीके से वहाँ लड़ नहीं सका है. ऐसे में अब तक तो पाकिस्तानी हुक़ूमत और फ़ौज की तरफ़ से नीति यही रही है कि अमरीका को हमले की इजाज़त दे दी जाए पर आम लोगों को न बताया जाए यानी नीति अस्पष्ट रखी जाए.क्योंकि पाकिस्तान की जनता में ज़्यादातर लोग नहीं चाहते कि अमरीका दख़ल दे.

दरअसल अब पाकिस्तान ख़ुद बहुत ख़तरे में है और उसे ज़रूरत है कि कोई उसकी फ़ौज की मदद करे. फ़ौज को चलाने के लिए पाकिस्तान के पास पैसे नहीं है जबकि ओसामा बिन लादेन के लड़ाकों की स्थिति मज़बूत है. आर्थिक मदद के लिए वो अमरीका जैसे देशों पर निर्भर है.

पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई पर भी अमरीका दवाब डालने की कोशिश करेगा और कुछ तबदीलियाँ आई भी हैं.

जनता का अमरीका विरोध

इस सबसे परे पाकिस्तानी जनता और मीडिया की राय कुछ अलग ही है. वे मानते हैं कि अल क़ायदा अपनी जंग जीत चुका है.

लोग और मीडिया तो इस कद्र अमरीका विरोधी हो गए हैं कि वो चाहते ही नहीं कि अमरीका के लिए ये ये जंग लड़ी जाए. उनके नज़रिए से ये पाकिस्तान की नहीं बल्कि अमरीका की लड़ाई है.

यानी अमरीका के संदर्भ में पाकिस्तान सरकार जो कर रही है और जनता जो चाहती है उसमें बहुत अंतर है.इस कारण कई तरह की मुश्किलें खड़ी हो गई हैं.

पाकिस्तानी सेना चाहती है कि वो अल क़ायदा का मुकाबला करे लेकिन उन्हें जनता की हिमायत हासिल नहीं है और न ही संसद में विपक्ष इस तरफ़ आता दिख रहा है कि दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ कोई राष्ट्रीय एकमत बनाया जाए.

हालांकि पाकिस्तान सरकार का नज़रिया यही है कि भले ही अमरीका में सत्ता में कोई भी आए उसकी रणनीति यही रहेगी वो नई अमरीका सरकार के साथ मिलकर काम करे.

भारत-पाक संबंध

ज़रदारी ने हाल ही में मनमोहन सिंह से मुलाक़ात की थी

जहाँ तक रही भारत-पाकिस्तान रिश्तों की बात तो आने वाले दिनों में अमरीका की नीति इस ओर बढ़ेगी कि दोनों देशों के बीच तनाव कम हो ताकि ध्यान अफ़ग़ानिस्तान पर लगाया जा सके.

दरअसल अफ़ग़ानिस्तान में हमेशा ही पाकिस्तान का असर काफ़ी रहा है और पाकिस्तान हमेशा चाहता रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान हुक़ूमत उसे बुरी नज़र से न देखे.

लेकिन आज की तारीख़ में अफ़ग़ानिस्तान में भारत एक अहम देश उभरकर सामने आया है. ऐसे में या तो पाकिस्तान भारत से लड़े या फिर भारत से दोस्ती करके इस मामले को सुलझाए.

इन सब पहलूओं को देखते हुए अमरीका प्रयास यही करेगा कि भारत-पाकिस्तान के बीच मनमुटावों को कम किया जा सके.

(ये लेख बीबीसी संवाददाता वंदना के साथ बातचीत पर आधारित है. )

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