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विश्व व्यापार संगठन में निर्णायक बातचीत | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के दोहा दौर की बातचीत के लिए सोमवार का दिन महत्वपूर्ण हैं. सारी बातचीत के केंद्र में है विकासशील और विकसित देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के प्रयास जो सात साल से जारी हैं लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुँच रहे हैं. जेनेवा में डब्ल्यूटीओ के लगभग 30 देशों के मंत्रियों की सोमवार से बातचीत शुरू हो रही है. दरअसल, सात साल पहले कतर की राजधानी दोहा में विश्व व्यापार की एक अहम प्रक्रिया की शुरुआत हुई थी. जेनेवा से बीबीसी संवाददाता इमोजेन फ़ूक्स कहती हैं कि डब्ल्यूटीओ की दोहा दौर की बातचीत का उद्देश्य था, विकासशील देशों को व्यापार के ज़रिए ग़रीबी से ऊपर उठने का मौक़ा देना. लेकिन अब तक चाहे कानकुन हो या हाँगकाँग बातचीत में विशेष सफलता नहीं मिली है. बात इस पर आकर अटक गई है कि विकसित और विकासशील देशों के हित अलग अलग हैं और वो कौनसा स्थान है जहाँ दोनों कुछ समझौते कर सहमत हो सकते हैं. समस्या अमीर देश चाहते हैं कि भारत जैसे देश अपने बाज़ार खोलें – पश्चिम की कंपनियों को बैंकिग, कारों, और पर्यटन जैसे कई क्षेत्रों में आने दें. भारत, चीन, ब्राज़ील सहित लगभग 100 विकासशील देश चाहते हैं कि अमरीका और यूरोपीय संघ कृषि उत्पादों से सब्सिडी हटाए ताकि विकासशील देशों के कृषि उत्पाद इन देशों में खरीदे जाएँ. लेकिन फ़्राँस और अमरीका जैसे देश सब्सिडी कम करने के सख़्त ख़िलाफ़ लग रहे हैं. ऑक्सफै़म जैसे ग़ैर-सरकारी संगठन कह रहे हैं कि अब तक दोहा दौर की बातचीत से जो समझौता तय करने की कोशिश की जा रही है, उससे दुनिया के सबसे ग़रीब देशों को कुछ नहीं मिलेगा. भारत ने इस दौर की बातचीत से पहले 33 प्रमुख विकासशील देशों के संगठन जी-33 से बात की है. भारत के वाणिज्य मंत्री कमलनाथ का कहना है कि अगर मूल मुद्दों पर सहमति नहीं बनी तो भारत दोहा दौर की बातचीत छोड़ भी सकता है. उनका कहना है,'' कृषि गंभीर चिंता का विषय है और इसीलिए वर्तमान व्यवस्था में बड़े बदलाव करने की ज़रूरत है. हमें आशा है कि विकसित देश ये समझेंगे कि खाद्यान्न की कमी कितना गंभीर मामला है और कहेंगे कि कृषि में हमें ज़्यादा निवेश करने की ज़रूरत है और ये सब तभी हो सकता है जब सब्सिडी कम की जाए या ख़त्म की जाए.'' बदलती तस्वीर ब्राज़ील के विदेश मंत्री सेल्सू अमोरिम का कहना है,'' अभी तक हमने जो बयान सुने हैं उनमें कहा जा रहा है कि सबकुछ चीन, भारत और ब्राज़ील पर निर्भर है, अगर वाकई वो ऐसा सोच रहे हैं तो मुझे उससे आशा कुछ कम हो जाती है.'' जेनेवा से बीबीसी के अंतरराष्ट्रीय विकास मामलों के संवाददाता डेविड लॉयन का कहना है कि सात साल पहले जब दोहा दौर की बातचीत शुरू हुई थी तबसे अब तक दुनिया में विश्व व्यापार की तस्वीर बहुत बदल गई है – चीन, भारत और ब्राज़ील बहुत ताकतवर बनकर उभरे हैं. माना जा रहा है कि आने वाला एक हफ़्ता दोहा दौर की बातचीत के लिए निर्णायक साबित हो सकता है. और अगर समझौता नहीं हुआ तो उसके बुरे असर कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर पड़ेंगे फिर वो चाहे खाद्य सुरक्षा हो, जलवायु परिवर्तन और देशों की ऊर्जा नीति. |
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