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ग़रीबी उन्मूलन पर ध्यान देने की सलाह | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संयुक्त राष्ट्र की व्यापार और विकास संबंधी 2006 की रिपोर्ट में भारत जैसे विकासशील देशों से कहा गया है कि वे ऐसी नीतियाँ अपनाएँ जो ग़रीबों के हित में हों. रिपोर्ट का कहना है कि ऐसा करके ही ग़रीबों और अमीरों के बीच बढ़ रही खाई को पाटा जा सकेगा. इसमें कहा गया है कि विकासशील देशों को देश के अंदर व्यापार को मज़बूत करना चाहिए. साथ ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों और अंतरराष्ट्रीय दाता एजेंसियों के दबाव और शर्तों में आकर अपनी अर्थव्यवस्था के लिए जो अच्छा है वह न किया जाए, ऐसा नहीं होना चाहिए. उल्लेखनीय है कि अस्सी और 90 के दशक में इन संगठनों का नीतियों के पालन पर ज़ोर था, अब इससे ठीक उल्टा सुझाव दिया जा रहा है. इन दशकों में विकासशील देशों से जो लुभावने वादे किए गए थे, वे पूरे नहीं हुए. निजी निवेश तो बढ़ा नहीं, साथ ही अर्थव्यवस्थाएँ और पिछड़ने लगीं. भारत में अंकटाड की समन्वयक वीना झा का कहना है कि विकासशील देशों की आर्थिक प्रगति को आप तभी जारी रख सकते हैं जब सरकारें बड़े आर्थिक बदलाव लाएं और औद्योगिक क्षेत्र में अधिक निवेश करें. उनका कहना था कि ग़रीबी उन्मूलन और बेरोज़गारी दूर करने के लिए ऐसी योजनाओं की ज़रूरत है जो विकास को प्रोत्साहित करें. लेकिन भारत की पूर्वी देशों, अफ़्रीका और विकासशील देशों पर ध्यान केंद्रित करने की नीति के फ़ायदे आने वाले वर्षों में नज़र आने लगेंगे. साथ ही दुनिया ने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि विकासशील देशों की वजह से आर्थिक विकास की ऊंची दरें दिखाईं दे रही हैं. जबकि पहले माना जाता था कि अमरीका की वजह से विकास दर ऊंची है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'विकास के फ़ायदे ग़रीबों तक नहीं'07 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस विकास के लक्ष्य से पीछे हैं:मनमोहन27 जून, 2005 | भारत और पड़ोस बैठक बीच में छोड़ आए कमलनाथ02 जुलाई, 2006 | कारोबार 'डब्ल्यूटीओ में कोई समझौता नहीं होगा'01 जुलाई, 2006 | कारोबार व्यापार मुद्दे पर अमीर देशों की आलोचना15 दिसंबर, 2005 | कारोबार कांग्रेस ने सब्सिडी समाप्ति को मंज़ूरी दी02 फ़रवरी, 2006 | कारोबार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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