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शुक्रवार, 16 मई, 2008 को 12:50 GMT तक के समाचार
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जंगल बचाने के लिए सरकारी क़ानून

अमेज़न
इन इलाक़ों में बसे परिवारों को सरकार की ओर से जंगल न काटने के लिए पैसा दिया जाता है
नाव का इंजन तेज़ आवाज़ करते हुए भकभका कर ख़ामोश हो गया. इंजन की आवाज़ सुनते हुए सोने की आदत पड़ चुकी है इसलिए उसके शोर से नहीं बल्कि इंजन बंद होने पर अचानक पसरी ख़ामोशी से नींद खुल गई.

हमें अमेज़न के आरक्षित इलाक़ों में जाना है जहाँ सरकार लोगों को जंगलों का बचाव करने के लिए प्रोत्साहित करती है. इन इलाक़ों में बसे परिवारों को सरकार की ओर से जंगल न काटने के लिए कुछ पैसा दिया जाता है.

अपनी बड़ी मोटरबोट और विशाल अमेज़न नदी छोड़नी पड़ेगी. हर जगह पानी का विस्तार है. ये पानी से बनी छोटी छोटी धाराएँ हैं. छोटी छोटी गलियों की तरह जिनमें छोटी नावों पर बैठकर ही जाया जा सकता है.

इस जगह का नाम उवा टुमा है. ये ब्राज़ीली का नहीं बल्कि इंडियन भाषा का शब्द है. सरकार ने वर्ष 2004 से इस इलाक़े में वनारक्षण परियोजना शुरू की. इस परियोजना में काम करने वाले रुडनी संताना हमारी नाव में आ चुके हैं ताकि सरकार की योजना के बारे में कुछ जानकारी दे सकें.

वो बताते हैं कि इस इलाक़े में बीस अलग अलग समुदायों के 280 परिवार आबाद किए गए हैं. लेकिन ये एक जगह नहीं बल्कि अमेज़न नदी के दोनों किनारों पर काफ़ी विस्तृत इलाक़े में बसे हुए हैं.

लाइफ जैकेट बाँधकर सभी लोग दो छोटी छोटी नावों पर सवार होते हैं और ये नावें नदी की मुख्यधारा छोड़कर छोटी धाराओं की ओर मुड़ती हैं. हमारे दोनों तरफ़ कुछ झाड़ियाँ सी हैं. पूछने पर पता चलता है कि ये झाड़ियाँ नहीं बल्कि पानी में डूबे हुए ऊँचे पेड़ हैं. हमारे दोनों ओर उनकी फुनगियाँ दिख रही हैं. पानी की गहराई जानकर रूह काँप उठती है हालाँकि लाइफ़ जैकेट देखकर कुछ राहत मिलती है.

बियाबान में घर

अमेज़न के जंगलों में घर
अमेज़न के जंगलों में रहने वाले क़ानून का पालन करते हैं

पंद्रह बीस मिनट के बाद नदी किनारे जंगल के बीच सिर्फ़ एक घर नज़र आता है. बियाबान में ठहरा हुआ सा अकेला घर. आसपास किसी बस्ती का दूर दूर तक कोई नामो निशान नहीं.

हमें यहीं जाना है इसलिए नाव किनारे लगाकर लकड़ी और छप्पर के बने इस घर तक पहुँचने के लिए हम ऊपर चढ़ते हैं. घर में पति पत्नी और उनके चार बच्चे रहते हैं.

शहरों में रहने के आदी पत्रकारों के लिए अजूबा है कि आख़िर कोई इस बियाबान में अपनी इच्छा से क्यों रहना चाहेगा. वो पूछते हैं – डर नहीं लगता? बच्चे जंगल में खो तो नहीं जाते? नीचे नदी है, बच्चों के डूबने का डर नहीं होता? इतनी गर्मी और उमस में यहाँ मच्छर नहीं काटते? क्या आपने कभी शहर में बसने के बारे में सोचा ही नहीं? जंगली जानवरों से डर नहीं लगता?

इन सभी सवालों को घर के मालिक ओज़ीमार ब्रूनो वियेरा शांति से सुनते हैं और फिर जवाब देते हैं.

जंगल में नहीं शहरों में रहने वाले आदमियों से डर लगता है. वो ज़्यादा ख़तरनाक होते हैं. बच्चों को मालूम है कि जंगल में कहाँ तक जाना सुरक्षित है. सभी बच्चों को अच्छी तरह तैरना आता है इसलिए नदी से भी कोई डर नहीं. सरकार ने जंगल उपज का इस्तेमाल करने की अनुमति दी है और हम जहाँ तक चाहें वहाँ तक जंगल में जा सकते हैं.

क़ानून का पालन

पर्यावरण की चिंता ब्रूनो के लिए कुछ ख़ास मायने नहीं रखती. वो कहते हैं कि मैं एक लकड़हारे के परिवार में पैदा हुआ और बचपन से मैंने लकड़ी काटना ही सीखा है. पर अब सरकार कहती है कि जंगल मत काटो. क़ानून बना दिए गए हैं.

उन्हें इस बात का बहुत पता नहीं है कि ऐसे क़ानून क्यों बनाए गए हैं. लेकिन अब वो इन क़ानूनों का पालन करते हैं क्योंकि उन्हें और उनके परिवार को इसी जगह पर रहना पसंद है.

जंगल बचाने के लिए किया जा रहा ये प्रयोग क्या सफल होगा? जहाँ बड़े बड़े जंगल माफ़िया और भारी आरा मशीनें जंगल के अंदर तबाही मचाते हों, जहाँ जंगल के अंदर पेड़ काटकर उनके तख़्ते चीरकर गोदाम भरे जाते हों, जहाँ सरकारी छापा पड़ने पर असली लकड़ी व्यापारी कभी हाथ न आता हो बल्कि छोटा मज़दूर सब काम करता हुआ पकड़ा जाए, वहाँ ऐसे प्रयोग कितने कारगर हो सकते हैं?

ये सवाल बहुत सारे लोग उठाते हैं. इस प्रयोग को निरर्थक बताने वाले भी कई हैं.

यहाँ तक कि अमेज़ोनिया प्रांत की ग्रीन पार्टी की ओर से चुने गए विधायक एंजलूस फ़िकेइरा कहते हैं कि ऐसे प्रयोगों से जंगल बचने वाले नहीं हैं. हालाँकि वो वनों को आरक्षित करने और वहाँ रहने वालों को कुछ लाभ देने के ख़िलाफ़ नहीं हैं, लेकिन उनका कहना है कि सरकार पैसे तो थोड़े बहुत देती है लेकिन ये नहीं समझाती कि जंगल क्यों और कैस बचाए जाएँ.

दोपहर ढलने से पहले हमें एक और ऐसी ही बस्ती में पहुँचना है. अभी तो आसमान साफ़ है, धूप है और उमस है लेकिन पता नहीं अमेज़न के मौसम का मिज़ाज कब बदल जाए. हमारी नावें एक बार फिर से महानद की ओर लौट रही हैं.

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