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अमेज़न के वर्षावन की बुरी स्थिति | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मनाउस शहर की ऊँची इमारतें प्रकृति की खिल्ली उड़ाती नज़र आती हैं. दुनिया के सबसे बड़े वर्षावन अमेज़न के ठीक बीच में आबाद 20 लाख लोगों का ये शहर कुछ वैसा ही लगता है जैसे सभ्य लोगों की महफ़िल में कोई आदमी कपड़े उतार कर चला आया हो और उसे देख ज़्यादातर शरीफ़ लोग ख़ुद ही महफ़िल छोड़ कर उठ गए हों. यहाँ के प्राचीन जंगलों को धकेल कर कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए गए है. लेकिन शहर के बीच में पेड़ों के समूह अब भी कुछ घबराए हुए से खड़े दिखते हैं, जैसे अजनबी हमलावरों के बीच घिर गए हों. शहर में चारों ओर कंक्रीट की बहुमंज़िला इमारतें खड़ी हैं. ट्रैफ़िक का शोर लगातार होटल की खिड़की से अंदर आता रहता है और ऐसे ही होटलों के कमरों में बड़ी बड़ी कंपनियों के मालिक और अफ़सर मुनाफ़े के लिए अमेज़न के और ज़्यादा दोहन की योजनाएँ बनाते रहते हैं. ये शहर पुर्तगाली औपनिवेशिक शासकों ने 19वीं शताब्दी के अंत में बसाया था क्योंकि यहाँ बेशुमार पैदा होने वाले रबर की माँग यूरोप में बहुत थी. बदलाव शुरुआत में ये एक छोटा सा गाँव था लेकिन कुछ ही वर्षों में अमेज़न के घने वर्षावनों के बीच मनाउस एक बड़े शहर में बदल गया. आज यहाँ हवाई अड्डा है, शॉपिंग मॉल्स हैं, विश्वविद्यालय है, बड़ी बड़ी दुकानें हैं और अमेज़न का दोहन करने के सभी औज़ार मौजूद हैं. कैसे हैं अमेज़न के वर्षावन? और हमें क्यों उनके दोहन के प्रति चिंतित होना चाहिए?
जंगल कटें तो ब्राज़ील के लोगों को परेशान होना चाहिए क्योंकि जंगल बचेंगे तो उनका ही फ़ायदा होगा. ये बात सच होती अगर हम एक ही धरती माँ के अलग अलग हिस्सों में न पल रहे होते. अमेज़न के जंगलों के विनाश से बलिया, बहराइच या बाँसवाड़ा में रहने वाले लोगों पर उतना ही असर पड़ेगा जितना कि इंडोनेशिया, जापान, चिली और पेरू के निवासियों पर. जंगल साफ़ होने का सिलसिला आँकड़े उबाऊ होते हैं, लेकिन अगर पूरी तस्वीर समझनी है तो ये उबाऊ काम करना ही होगा. कुछ ही साल हुए यानी वर्ष 2001 में अमेज़न के जंगल पूरे पचास लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए थे यानी पूरे भारत के क्षेत्रफल से डेढ़ गुना बड़े हैं ये जंगल. आज वर्ष 2008 में इसका 13 प्रतिशत जंगल इंसान निगल चुका है. जितने क्षेत्रफल में फ़्रांस और जर्मनी फैले हैं, उतने जंगल पिछले सात साल में साफ़ कर दिए गए हैं. पिछले दो वर्षों में ब्राज़ील की सरकार ने दावा किया था कि वनों के कटने की रफ़्तार कम हुई है. लेकिन वर्ष 2007 के शुरुआती पाँच महीनों में ही पाँच हज़ार वर्ग किलोमीटर जंगलों का और सफ़ाया कर दिया गया है. किसके पेट में जा रही है प्रकृति की ये नेमत, और क्यों? गहन अध्ययन वैज्ञानिक और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वालों ने इसका गहरा अध्ययन किया है. दुनिया भर में माँस खाने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. बाज़ार में अगर रोज़ाना टनों माँस सप्लाई न हो तो हाहाकार मच जाए. उनकी माँग को पूरा करने के लिए माँस कहाँ से आएगा?
शहरों में जानवर नहीं पाले जा सकते. इसलिए बरसों से खड़े निरीह वर्षावनों को काटा जाता है ताकि ख़ाली जमीन पर पशुफ़ार्म बनाकर जानवरों को छोड़ा जाए और फिर उनके मोटे ताज़े होने पर उन्हें काटकर चीन, जापान और यूरोप के देशों को निर्यात किया जाए. दूसरा कारण सोयाबीन की खेती का चलन है. अमरीका अपने किसानों को अब ज़्यादा से ज़्यादा मक्का उगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है और सब्सिडी दे रहा है. अमरीका में सोयाबीन का उत्पादन कम हुआ है लेकिन बाज़ार में माँग बढ़ती जा रही है. बाज़ार की बहती गंगा में हाथ धोकर मोटा मुनाफ़ा कमाने वाले सोया-राजा अमेज़न के जंगलों पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं और सोया उगाने के लिए खेत बना रहे हैं. हज़ारों हज़ार हेक्टेअर जंगल लगातार कट रहे हैं. इस वक़्त भी जब आप इस रिपोर्ट को पढ़ रहे हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भी अमेज़न के ख़ज़ाने का स्वाद चख लिया है. उनकी आरा मशीनें जंगलों में घुसकर टीबी के कीटाणुओं की तरह बहुत तेज़ी से धरती के इन फेफड़ों को कुतर रही हैं. कई जगहों पर बेतहाशा खनन चल रहा है ताकि बड़े बड़े शहरों और क़स्बों में रहने वालों की ज़रूरतें पूरी की जा सकें. मनाउस शहर इन सभी गतिविधियों के केंद्र में है. ऐसा नहीं है कि दक्षिण अमरीका के दूसरे देशों में पड़ने वाले अमेज़न के हिस्से में ये गतिविधियाँ नहीं हो रहीं. लेकिन चूँकि अमेज़न का 65 प्रतिशत हिस्सा ब्राज़ील में आता है इसलिए यहाँ की सरकार पर इन जंगलों को बचाने के लिए उतना ही दबाव बढ़ गया है. और ठीक उतना ही दबाव यहाँ के बाशिंदों पर भी है. अगले एक हफ़्ते में हम अमेज़न नदी में नाव के ज़रिए इन जंगलों के सफ़र पर निकलेंगे और यहाँ के जीवन को जानने की कोशिश करेंगे. |
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