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जलवायु परिवर्तन को लेकर योजना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री जॉन हॉवर्ड ने घोषणा की है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए देश में कार्बन ट्रेडिंग की एक योजना 2012 तक शुरू की जाएगी. हालांकि जॉन हॉवर्ड की इस बात के लिए आलोचना भी की गई है कि इस साल के अंत में होने वाले चुनावों को देखते हुए उन्होंने कार्बन गैसों में कटौती के लक्ष्य निर्धारण की ज़रूरत ही नहीं समझी. ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री का कहना है कि ग्रीन हाउस गैसों में कटौती के लक्ष्य को अगले साल तक के इसलिए टाला जा रहा है, क्योंकि ये एक बहुत बड़ा आर्थिक फैसला है, जिसके देश की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ेंगे. उनका कहना है कि ग्रीन हाउस गैसों में कटौती के दीर्घअवधि के लक्ष्य की ओर शुरआती कदम अगले दशक में उठाने शुरू किये जाएंगे. जॉर्ड हॉवर्ड के मुताबिक अगर एक कदम भी ग़लत पड़ा तो अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. अपनी पार्टी की एक बैठक में बोलते हुए जॉन हॉवर्ड ने कहा कि ग्रीन हाउस गैसों में कटौती की योजना देश के उद्योग और प्रयावरण दोनों को ध्यान में रखकर बनाई गई है. उनका कहना था, "एक देश के रूप में हम कार्बन गैसों के उत्सर्जन में कटौती की एक दीर्घ अवधि की योजना बना रहे हैं अगले साल ये लक्ष्य निर्धारित कर दिया जाएगा. ये योजना व्यापक और व्यवहारिक होगी.इसमे विश्व भर में हो रहे विकास को ध्यान में रखते हुए देश के औद्योगिक क्षेत्र को ऐसे ढर्रे में ढालने की कोशिश की जाएगी जिससे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लक्ष्य में कटौती के साथ साथ विकास पर बुरा असर न पड़े." जलवायु परिवर्तन बीबीसी संवाददाता फिल मर्सर का कहना है कि आलोचक प्रधानमंत्री हॉवर्ड पर शुरू से ही कई तरह के आरोप लगाते रहे हैं- एक तो ये कि जलवायु परिवर्तन को लेकर को लेकर उनमें दूर दृष्टि का अभाव है. साथ ही ये आरोप भी लगाया गया है कि पर्यावरण के क्षेत्र में प्रधानमंत्री की साख उतनी असरदार नहीं और तीसरा ये कि अगले साल होने वाले चुनावों के देखते हुए जॉन हॉवर्ड पर्यावरण के क्षेत्र में कोई गंभीर फैसला लेना नहीं चाहते. लेकिन ऑस्ट्रेलिया की विपक्षी पार्टी का ये कहना था कि मतदाता को चुनावों से पहले ये जानने का हक़ है कि ग्रीन हाउस गैसों में कटौती का ऑस्ट्रेलिया का लक्ष्य क्या है. संवाददाता का कहन है कि जलवायु परिवर्तन का मुद्दा ऑस्ट्रेलिया में राजनीतिक रंग ले चुका है हॉवर्ड सरकार ने क्योटो संधि पर ये कहते हुए हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया था कि इससे देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचेगा जो कि मुख्यत कोयले पर निर्भर है. उधर चीन भी जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निबटने के लिए सोमवार को एक योजना पेश करने वाला है. चीन में लगभग 70 फ़ीसदी बिजली का उत्पादन कोयले से होता है जो कि पर्यावरण पर नकारात्मक असर डालता है. यही मुख्य वजह है कि चीन इस साल प्रदूषण के क्षेत्र में अमरीका से भी आगे निकल सकता है. चीन हालांकि ये स्वीकार करता है कि देश में तेज़ी से हो रहे औद्योगिक विकास ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है. किन साथ ही वो ये भी कहता रहा है कि सबसे ज़्यादा प्रदूषण के लिए अमीर देश ज़िम्मेदार हैं. बेजिं में बीबीसी संवाददाता क्वैंटिन समरविल का कहना है कि ऐसी उम्मीद की जा रही है कि इस योजना में ऊर्जा के संरक्षण के अलावा स्वच्छ ऊर्जा के लिए नई तकनीक के विकास पर चीन का ज़ोर रहेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें बुश उत्सर्जन पर नए लक्ष्य के पक्ष में31 मई, 2007 | पहला पन्ना उत्सर्जन कम करने का मसौदा ख़ारिज26 मई, 2007 | पहला पन्ना ब्रिटेन में कार्बन प्रदूषण में कमी की पहल13 मार्च, 2007 | पहला पन्ना बाध्यकारी प्रावधान स्वीकार नहीं:अमरीका03 फ़रवरी, 2007 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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