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शनिवार, 01 मार्च, 2008 को 15:53 GMT तक के समाचार
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रूस में राष्ट्रपति पद के लिए मतदान जारी
मेदवेदेव और पुतिन
पुतिन पहले से ही मेदवेदेव को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर चुके हैं
रूस के लोग नया राष्ट्रपति चुनने के लिए रविवार को वोट डाल हे हैं.

अधिकारियों का कहना है कि अब तक 50 फ़ीसदी मतदान हुआ है. संवाददाताओं का कहना है कि प्रशासन ने अपनी ओर से पूरी कोशिश की है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग मत डालने आएँ ताकि राष्ट्रपति पुतिन के उत्तराधिकारी की वैधता पर सवाल न उठें.

इसमें लोगों को सस्ता खाना, मुफ़्त सिनेमा या खिलौने बाँटना शामिल है.

मौजूदा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस पद पर दो कार्यकाल पूरे करने के बाद अब राष्ट्रपति भवन को अलविदा कहने वाले हैं लेकिन पिछले साल दिसंबर में हुए संसदीय चुनावों की तरह राष्ट्रपति पद के चुनावों के नतीजे भी अनुमान से बाहर नहीं हैं.

व्लादिमीर पुतिन मौजूदा उप प्रधानमंत्री दिमित्री मेदवेदेव को अपना उत्तराधिकारी पहले ही नामज़द कर चुके हैं और उनकी आसान जीत का अंदाज़ा लगाया जा रहा है. विपक्ष तो पहले ही हाशिये पर चला गया है.

यह चुनाव प्रचार कुछ अजीब तरह का रहा है. टेलीविज़न पर जो चुनाव संबंधी बहसें हो रही हैं उनमें सिर्फ़ यह बात पता चलती है कि चुनाव नज़दीक आ रहे है.

सरकारी उम्मीदवार दिमित्री मेदवेदेव ने इन बहसों का बहिष्कार किया जिसके बाद चुनावी दौड़ में शामिल तीन अन्य उम्मीदवार ही टेलीविज़न के चुनाव संबंधी कार्यक्रमों में बहस करते नज़र आते हैं.

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पिछले साल दिसंबर में यह घोषणा कर दी थी कि वह दिमित्री मेदवेदेव को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते हैं और उसी क्षण से एक तरह से यह समझ लिया गया था कि चुनाव नतीजे तो पहले से ही तय हो चुके हैं.

रूस के एक राजनीतिक विश्लेषक निकोलाई पेटरोफ़ का कहना है कि तीन विपक्षी उम्मीदवार को सरकारी उम्मीदवार के मुक़ाबले में कहीं नज़र ही नहीं आते हैं.

उनका कहना है, "दरअसल, इस चुनाव में विपक्ष के कोई ठोस उम्मीदवार मैदान में हैं ही नहीं. बहुत सख़्त चुनाव क़ानून बनाकर सरकार ने ऐसे किसी उम्मीदवार का पंजीकरण ही नहीं होने दिया जिसमें कुछ दम नज़र आता हो."

"सिर्फ़ वे ही उम्मीदवार इस चुनाव में खड़े हैं जिनसे राष्ट्रपति पद की दौड़ में क्रेमलिन के उम्मीदवार दिमित्री मेदवेदेव के लिए कुछ ख़तरा नज़र नहीं आता हो."

चुनाव की वैधता

राष्ट्रपति पद की इस चुनावी दौड़ में शामिल होने से वंचित एक प्रमुख नेता मिख़ाइल कैसियानोफ़ ख़ासे नाराज़ नज़र आते हैं.

मिख़ाइल कैसियानोफ़ व्लादिमीर पुतिन सरकार में एक प्रधानमंत्री रह चुके हैं लेकिन अब पुतिन के मुखर आलोचक बन चुके हैं.

कितनी आज़ादी है...
 ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जो दो मार्च की इस घटना को चुनाव मानते ही नहीं हैं, यह एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मज़ाक उड़ाने जैसा है. चुनाव स्वतंत्र नहीं हैं क्योंकि लोगों को यह विकल्प ही हासिल नहीं है कि वह चाहें तो किसी ख़ास उम्मीदवार को बाहर करने के लिए वोट डाल सकें.
मिख़ाइल कैसियानोफ़

रूस के चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की उनकी अर्ज़ी को ही ख़ारिज कर दिया और दलील यह दी कि उनकी अर्ज़ी के समर्थन में जो दस्तख़त किए गए उनमें से कुछ दस्तख़त वैध नहीं थे लेकिन कैसियानोफ़ का मानना है कि उन्हें राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की दौड़ से पुतिन के आदेशों पर बाहर रखा गया है.

कैसियानोफ़ ख़फ़ा होते हुए कहते हैं, "ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जो दो मार्च की इस घटना को चुनाव मानते ही नहीं हैं, यह एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मज़ाक उड़ाने जैसा है. चुनाव स्वतंत्र नहीं हैं क्योंकि लोगों को यह विकल्प ही हासिल नहीं है कि वह चाहें तो किसी ख़ास उम्मीदवार को बाहर करने के लिए वोट डाल सकें."

"यह ऐसा चुनाव है जिसमें लोगों के पास राय ज़ाहिर करने का विकल्प ही नहीं है. चुनाव तो पहले ही हो चुका है, दो मार्च को होने के लिए दरअसल कुछ बचा नहीं है. वो तो पहले ही तय हो चुका है और सबकुछ पहले ही किया जा चुका है."

लेकिन रूस सरकार कैसियानोफ़ के इन आरोपों का खंडन करती है और उसका यही दावा है कि ये चुनाव पूरी तरह से एक लोकतांत्रिक मुक़ाबला हैं.

लेकिन जब नतीजों को पहले से ही निश्चित समझा जा रहा और चुनाव प्रचार भी इतना फीका है तो बहुत से लोग यह भी विचार कर रहे हैं कि क्या वाक़ई दो मार्च यानी कल होने वाले इन चुनावों में वोट डालने की कोई अहमियत होगी भी या नहीं.

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