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शनिवार, 17 नवंबर, 2007 को 11:48 GMT तक के समाचार
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ग़ज़ल ग़ालिब की होती थी मगर...

मेहंदी हसन ने अपनी आवाज़ से ग़ज़ल को ऊँचाइयों पर पहुँचाया है
मेहंदी हसन ने अपनी आवाज़ से ग़ज़ल को ऊँचाइयों पर पहुँचाया है
जोधपुर राजस्थान के रवींद्र कुमार रायपुरिया जानना चाहते हैं कि ग़ज़ल का जन्म कहाँ हुआ.

ग़ज़ल, कविता का एक प्रकार है जिसकी शुरुआत दसवीं शताब्दी में फ़ारसी कविता में हुई थी और बारहवीं शताब्दी में यह इस्लामी सल्तनतों और सूफ़ी संतों के साथ दक्षिण एशिया में आई. उर्दू ग़ज़लें भारत और पाकिस्तान में बहुत प्रचलित और लोकप्रिय हैं. ग़ज़ल के कुछ नियम हैं जैसे मतला, मक़्ता, रदीफ़, काफ़िया, बहर और वज़न. ग़ज़ल की हर पंक्ति को मिस्रा कहा जाता है और दो मिस्रों से मिलकर बनता है शेर. पहले शेर को मतला कहा जाता है और आख़िरी शेर को मक़्ता जिसमें शायर का नाम छिपा होता है. हर मिस्रे के अंतिम शब्द एक जैसे सुनाई देते हैं जैसे मीर की ग़ज़ल का ये शेर देखिए....

देख तो दिल के जां से उठता है
ये धुंआ सा कहां से उठता है.
इसमें उठता है हर शेर के अंत में आएगा जिसे रदीफ़ कहते हैं और उससे पहले मिलते-जुलते शब्द आएँगे जैसे जां से उठता है, मकां से उठता है, जहां से उठता है....इसे काफ़िया कहते हैं. पहले शेर में ये दोनों मिलते जुलते होने चाहिए जबकि बाक़ी के शेरों की पहली पंक्ति में कुछ भी हो सकता है जबकि दूसरी पंक्ति में वह मिलता जुलता होना चाहिए. ग़ज़ल एक लयबद्ध कविता है. हर शेर तबले की थाप पर पढ़ा जा सकता है इसलिए ज़रूरी है कि दोनों मिस्रे बराबर हों. इसे वज़न कहा जाता है. और बहर हिंदी कविता के छंद के समान हुई जो बड़ी या छोटी कैसी भी हो सकती है. ग़ज़ल की एक विशेषता यह भी है कि हर शेर में बात पूरी हो जानी चाहिए.

उर्दू के बहुत से शायरों ने ग़ज़ल को बहुत समृद्ध किया है लेकिन ग़ालिब का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. दुष्यंत ने ग़ज़ल को हिंदी में कहने की कोशिश की और यह प्रयोग काफ़ी सफल रहा. दुष्यंत ने हिंदी ग़ज़ल के ज़रिए जीवन की वास्तविकताओं को उकेरा है. ग़ज़ल का इस्तेमाल हिंदी फ़िल्मों में भी बढ़चढ़कर हुआ है. नूरजहाँ, मलिका पुखराज, बेगम अख़्तर, मुन्नी बेगम, ग़ुलाम अली, मेहंदी हसन, जगजीत सिंह आदि गायकों ने ख़ूब ग़ज़लें गाई हैं.

सूर्य मणि ने, गोलपहाड़ी जमशेदपुर से जंग बहादुर सिंह और उमा सिंह ने और कुवैत से हक़ीमुद्दीन अलूदा ने डेरा सच्चा सौदा संप्रदाय और उसके मुख्य उद्देश्यों के बारे में पूछा है.

डेरा सच्चा सौदा एक आध्यात्मिक संगठन है, कोई अलग धर्म नहीं. इसकी स्थापना 1948 में बलूचिस्तान के शाह मस्ताना ने की थी. उनके बाद गुरू बने शाह सतनाम और इस समय गुरमीत राम रहीम सिंह इस संगठन के गुरू हैं. नाम सच्चा सौदा, गुरू नानक के जीवन की एक घटना से जुड़ा है.

सच्चा सौदा संप्रदाय के संत राम-रहीम
सच्चा सौदा संप्रदाय के संत राम-रहीम
कहते हैं कि जब गुरू नानक 12 वर्ष के थे तो उनके पिता ने उन्हे व्यापार के लिए 20 रुपए दिए लेकिन नानक ने उससे ग़रीबों और संतों के लिए भोजन ख़रीद लिया और पिता से कहा कि उन्होंने सच्चा सौदा किया. आत्मा का परमात्मा से मिलन सबसे बड़ा लक्ष्य है और यह माना जाता है कि ईश्वर के शब्दों का मनन करने या ‘नाम’ से मोक्ष की प्राप्ति होती है. डेरा सच्चा सौदा में हर धर्म को समान सम्मान मिलता है, सब धर्मों के लोगों का स्वागत होता है, मानवता को सर्वश्रेष्ठ धर्म माना जाता है, ग़रीब-अमीर, ऊँच-नीच का भेद नहीं किया जाता, किसी तरह का दान स्वीकार नहीं किया जाता, अंधविश्वास नहीं माने जाते, सच्चे रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी जाती है, मेहनत पर बल दिया जाता है, दहेज का विरोध किया जाता है, अंडा या गोश्त खाने और मदिरा पीने की मनाही है, बेईमानी, चोरी, डकैती, रिश्वत, धांधली और भ्रष्टाचार का विरोध किया जाता है और हर पुरुष को, परस्त्री का मां या बहन की तरह आदर करने और हर महिला को, परपुरुष का पिता या भाई जैसा सम्मान करने के लिए कहा जाता है.

ऑडियो कैसेट का आविष्कार किसने और कब किया. आज़मगढ़ उत्तर प्रदेश से मोहम्मद शाहिद आज़मी ने ये सवाल पूछा है.

नीदरलैंड्स की फ़िलिप्स कंपनी ने 1963 में ऑडियो कैसेट का आविष्कार किया था जिसपर ध्वनि रिकॉर्ड की जा सकती थी और उसे मशीन में बजाकर सुना जा सकता था. शुरू के कैसेट और कैसेट रिकॉर्ड करने वाले उपकरण अच्छे नहीं थे लेकिन इनमें सुधार हुआ और सत्तर के दशक में ये बहुत लोकप्रिय हो गए. जब सोनी कंपनी ने कैसेट चलाने वाला छोटा सा वॉकमैन उपकरण बनाया तो ऑडियो कैसेटों की मांग बहुत बढ़ गई.

संयुक्त अरब अमीरात के दुबई शहर से रामहारी परसाई पूछते हैं कि सीएनएन का पूरा नाम क्या है.

इसका पूरा नाम है केबल न्यूज़ नैटवर्क. इस टेलीविज़न चैनल की स्थापना 1980 में टैड टर्नर ने की थी और इसी के साथ 24 घंटे के समाचार चैनल की शुरुआत हुई. सीएनएन की पहुँच बहुत व्यापक हो चुकी है और अब इसके दो रेडियो नैटवर्क और वैबसाइट भी हैं.

जूरी ट्रायल क्या होता है. पूछती हैं चंडीगढ़ से परवीन.

यह ऐसा मुक़दमा होता है जिसकी सुनवाई जूरी के सामने होती है. जूरी के सदस्यों को वयस्क आबादी में से, बेतरतीब ढंग से चुना जाता है और उन्हें, अदालत में प्रस्तुत किए गए तथ्यों के आधार पर, देश के क़ानून के अधीन, तर्कसंगत और निष्पक्ष फ़ैसला सुनाने की शपथ दिलाई जाती है. ब्रिटन और अमरीका में जूरी ट्रायल मूलभूत नागरिक अधिकार है लेकिन सब देशों में नहीं. जिन देशों में जूरी मुक़दमे होते हैं वहाँ यह माना जाता है कि जूरी, सत्ता के विरुद्ध संतुलन का काम करती है लेकिन इसका विरोध करने वालों का तर्क है कि इसमें व्यक्तिगत पूर्वाग्रह आड़े आते हैं और जूरी के सभी सदस्यों में प्रमाणों का विश्लेषण करने की क्षमता नहीं होती. भारत सरकार ने 1960 में इस आधार पर जूरी मुक़दमे बंद कर दिए थे कि उनपर प्रसार माध्यमों और जनता का प्रभाव पड़ता है.


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