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बुधवार, 31 अक्तूबर, 2007 को 01:25 GMT तक के समाचार
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बर्मा की सेना में 'बच्चों की भर्ती'
बर्मा में बच्चे
बर्मा में मानवाधिकार की स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय चिंता जताता रहा है
एक अमरीकी मानवाधिकार संस्था का कहना है कि सेना में वयस्कों की कमी झेल रही बर्मा की सेना अब ज़बरदस्ती बच्चों को भर्ती कर रही है.

ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि बच्चों की उम्र 10 साल तक की है और उन्हें सेना में भर्ती के लिए या तो मारा-पीटा जाता है या फिर गिरफ़्तार करने की धमकी दी जाती है.

इससे पहले बर्मा ने कहा था कि वह बच्चों को सेना में भर्ती किए जाने से रोकने की दिशा में काम कर रही है.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से अपील की है बर्मा की सेना में बच्चों की कथित भर्ती के लिए उसे और दंडित किया जाना चाहिए.

झूठे दस्तावेज़

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट 'सोल्ड टू बी सोल्जर्स' में कहा गया है कि बर्मा की सेना में हज़ारों बच्चे हैं.

रिपोर्ट कहती है कि बर्मा की सेना का कोई 20 प्रतिशत 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों का है.

इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सेना के भर्ती दस्ते और सेना की ओर से तैनात असैनिक दलाल बच्चों को सार्वजनिक स्थल पर पकड़ रहे हैं. इन लोगों को सेना की ओर इनाम का लालच दिया गया है.

बर्मा के सैनिक
बर्मा की सेना पर मानवाधिकार हनन के आरोप हैं

भर्ती के लिए बच्चों को मारा-पीटा जाता है या फिर उन्हें गिरफ़्तार करने का डर दिखाया जाता है.

कहा गया है कि दलाल बच्चों को सड़कों, रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंड जैसी जगहों से उठाकर सेना के भर्ती कार्यालय में ले जाकर बेच देते हैं.

वैसे सेना में भर्ती की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष है. रिपोर्ट का दावा है कि सेना के अधिकारी नियमित रुप से दस्तावेज़ों में ग़लत जानकारियाँ भरते हैं और उनकी उम्र बढ़ाकर 18 दिखा दी जाती है.

रिपोर्ट में एक बच्चे के हवाले से कहा गया है कि उसे जब दूसरी बार सेना में भर्ती करने के लिए लाया गया तो उसे अपनी उम्र ग़लत बताने को कहा गया.

उसने कहा, "जब मैं 16 साल का था तो मुझे थप्पड़ मारकर कहा गया, तुम 18 साल के हो समझे, अपनी उम्र 18 बताओ."

"मैं वापस घर जाना चाहता था और यह बात मैंने उनसे कही थी लेकिन उन्होंने मना कर दिया."

अनदेखी

मानवाधिकार संस्था की रिपोर्ट में कहा गया है कि औसतन 18 हफ़्तों की ट्रेनिंग के बाद बच्चों को बटालियनों में भेज दिया जाता है.

उन्हें अक्सर सीधे युद्ध क्षेत्र में भी भेज दिया जाता है.

या फिर उन्हें गाँव और घर जलाने जैसे काम करने के लिए मज़बूर किया जाता है जो मानवाधिकार उल्लंघन के मामले हैं.

 हाल ही में शांतिपूर्व प्रदर्शन कर रहे बौद्धभिक्षुओं के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई के बाद तो सरकार को सेना के लिए लोग मिलना और कठिन हो जाएगा
जो बेकर, ह्यूमन राइट्स वॉच की पैरवीकार

ह्यूमन राइट्स वॉच की पैरवीकार जो बेकर ने कहा, "सेना के पद भरने के लिए बर्मा सच में बच्चों की ख़रीदफ़रोख़्त कर रहा है."

उन्होंने कहा, "सरकार से वरिष्ठ जनरल बच्चों की इस ज़बरदस्ती भर्ती को बर्दाश्त करते रहते हैं और वे नियम तोड़ने वालों को सज़ा नहीं देते."

जो बेकर का कहना है कि सेना में काम करने की जो स्थिति है और जिस तरह कम तनख़्वाह मिलती है उसके चलते योग्य उम्मीदवार भी सेना में नहीं जाना चाहते.

उनका कहना है, "हाल ही में शांतिपूर्व प्रदर्शन कर रहे बौद्धभिक्षुओं के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई के बाद तो सरकार को सेना के लिए लोग मिलना और कठिन हो जाएगा."

सेना के अधिकारी मानते हैं कि लोग सेना छोड़कर जा रहे हैं.

उधर बर्मा सरकार का कहना है कि उसने सेना में बच्चों की भर्ती के मसले को देखने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है.

जो बेकर इस समिति को 'पाखंड' बताते हुए कहती हैं कि सरकार को इस मामले में सीधी कार्रवाई करनी चाहिए और सेना से बच्चों को हटाना चाहिए.

इस बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बर्मा में मानवाधिकार की स्थिति पर चिंता बढ़ती जा रही है.

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