BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शुक्रवार, 26 अक्तूबर, 2007 को 14:50 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
भारत की बदलती विदेश नीति

मनमोहन सिंह, लूला और एमबेकी
पिछले कुछ वर्षों में भारत की विदेश नीति में काफ़ी बदलाव आए हैं
इस हफ़्ते बर्मा के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत इब्राहिम गम्बारी जब भारत के दौरे पर आए तो वे भारत सरकार के लिए एक विशेष संदेश लाए थे.

वे भारत सरकार को प्रोत्साहित करना चाहते थे कि बर्मा की सैनिक सरकार पर दबाव बनाया जाए ताकि सैन्य शासक वहाँ लोकतंत्र समर्थको का दमन न करें.

चीन सहित भारत एक देश है जो बर्मा में भारी मात्रा में निवेश कर रहा है.

बर्मा के साथ व्यापार करने वाले देशों में भी भारत और चीन प्रमुख हैं. बर्मा का लगभग 90 प्रतिशत व्यापार उसके एशियाई पड़ोसी देशों के साथ है.

पिछले दिनों में पश्चिमी देशों ने इस मामले पर भारत पर दबाव बनाया है. वे भारत को महात्मा गाँधी के सिद्धांतों और गुट निरपेक्ष आंदोलन में उसके योगदान की दुहाई देते हुए बर्मा की सरकार पर प्रतिबंध लगाने को कह रहे हैं.

व्यवहारिक बनती विदेश नीति

दिलचस्प बात यह है की शीत युद्ध के ख़त्म होने के बाद से ही भारतीय विदेश नीति ख़ास भारत के हितों को ही ध्यान में रखते हुए और व्यवहारिक बनती जा रही है.

 हम इस अवस्था में नहीं हैं कि मन अनुसार प्रवचन करें. भारत अपने हितों की रक्षा के लिए और उनके अनुसार निर्णय लेता है और यह सही है.
पार्थसारथी, बर्मा में पूर्व राजदूत

इस साल जनवरी में जब विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी बर्मा के दौरे पर थे तब उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में इस बदलाव को कुछ इस तरह से रखा था, "भारत एक लोकतंत्रिक देश है और वह चाहता है की लोकतंत्र विश्व भर में पनपे. मगर हम अपनी सोच किसी पर थोपना नहीं चाहते. यह हर देश का अपना निर्णय है."

अपने हितों को ध्यान में रखते हुए भारत ने कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर टिप्पणी करने से इनकार किया या फिर अपनी प्रतिक्रिया देर से दी.

वर्ष 2006 में इसराइल का लेबनान पर हमला, सन् 2007 में ग़ज़ा पट्टी में इसराइल ने जब फ़लस्तीन का प्रवेश रोका, अफ़्रीकी देश सूडान में चल रहा आंतरिक युद्ध, ईरान द्वारा परमाणु मसले पर संयुक्त राष्ट्र के साथ झड़प और हाल में हुए बर्मा में लोकतंत्र के लिए आंदोलन - इन सभी मुद्दों पर भारत सरकार का रुख़ देखने लायक रहा है.

सूडान में निवेश

प्रणव मुखर्जी और चीन के विदेश मंत्री
भारत और चीन बर्मा में ख़ासा निवेश कर रहे हैं

सूडान में इस समय 100 भारतीय कंपनियों के क़रीब 250 करोड़ रुपए लगे हैं. सूडान में सबसे पहले निवेश करने वालों में सार्वजनिक क्षेत्र की ओएनजीसी है.

तेल और प्राकृतिक गैस आयोग राजधानी ख़ारतूम से 74 किलोमीटर का पाइप लाईन बिछा रहा है. और 2005 में ग्रेटर नील योजना में 25 प्रतिशत निवेश किया है.

ग़ौरतलब है कि तेल और प्राकृतिक गैस आयोग का इस ओर ध्यान केंद्रित किया जा चुका है कि सूडान में निवेश करने का अर्थ है वहाँ के सैनिक शासन को बल देना है. आयोग ने इस चेतावनी को नज़रअंदाज कर दिया है.

आज बिजली ट्रेक्टर, निर्माण क्षेत्र की कंपनियाँ सूडान में निवेश कर रही हैं. अब टाटा मोटर्स और मारूति सुज़ूकी ने भी वहाँ निवेश करने में रुचि दिखाई है.

अमरीकी दबाव के बावजूद भारतीय तेल कंपनी ने इरान के यादावरन तेल क्षेत्र में निवेश किया है. यह निवेश सन् 2005 में तय एक गैस योजना से जुड़ा है.

 पहले भी भारत उन देशों के साथ रिश्ते रखता था जहाँ लोकतंत्र नहीं था, लेकिन शीत युद्द समाप्ति के बाद इस प्रकिया में तेज़ी आई है. शीत युद्ध और दक्षिण अफ़्रीका में रंग भेद नीति के ख़त्म होने पर भारत ने यह तय किया कि उसे अपनी नीति निर्धारण को देश हित के अनुसार चलाना होगा
पूर्व विदेश सचिव शशांक

सीरिया एक और देश है जिसे अमरीका चरमपंथ समर्थक कहता रहा है. वहाँ गैस आयोग ने मध्य पूर्व सीरिया में 3800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र मे तेल की खोज के लिए निवेश किया है.

यह सब उदाहरण इस बात पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि पिछले सालों में भारतीय विदेश नीति में एक लचीलापन आया है.

'प्रक्रिया में तेज़ी आई'

पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है, "पहले भी भारत उन देशों के साथ रिश्ते रखता था जहाँ लोकतंत्र नहीं था, लेकिन शीत युद्द समाप्ति के बाद इस प्रकिया में तेज़ी आई है. शीत युद्ध और दक्षिण अफ़्रीका में रंग भेद नीति के ख़त्म होने पर भारत ने यह तय किया कि उसे अपनी नीति निर्धारण को देश हित के अनुसार चलाना होगा."

उनका ये भी कहना है कि दुनिया भर में चीन के बढ़ते प्रभाव के चलते भारत को राजनीतिक हितों के साथ आर्थिक हितों का भी ध्यान रखना होगा.

 भारत एक लोकतंत्रिक देश है और वह चाहता है की लोकतंत्र विश्व भर में पनपे. मगर हम अपनी सोच किसी पर थोपना नहीं चाहते. यह हर देश का अपना निर्णय है
प्रणव मुखर्जी, भारत के विदेश मंत्री

आज दुनिया यह मान कर चल रही है कि चीन के अलावा भारत ही एक ऐसा देश है जो कि बर्मा के सैनिक नेताओं की नीतियों को प्रभावित कर सकता है.

भारत की बर्मा नीति

सन् 1993 की ही बात है जब भारत सरकार ने ऑंग सान सू ची को नेहरू शांति पुरस्कार से सम्मानित किया था. दिल्ली में हुई इस घोषणा के तुरंत बाद बर्मा की सरकार ने उत्तर-पूर्व राज्यों में सक्रिय चरमपंथी गुटों के लड़ाकों के रिहा कर दिया था.

नरसिंह राव की सरकार ने नीति बदलने का निर्णय लिया क्योंकि यह महसूस किया गया कि उत्तर-पूर्व राज्यों में सालों से चल रही चरमपंथी गतिविधियों को रोकने के लिए बर्मा का सहयोग महत्वपूर्ण है.

पिछले दस सालों में भारतीय सीमा सड़क संगठन ने बर्मा में सैकड़ों किलोमीटर लंबी सड़कों का निर्माण किया है.

गैस की खोज में वहाँ गैस फ़ील्ड में भी निवेश किया है और इस साल बंगाल की खाड़ी पर स्थित एक बंदरगाह का निर्माण पूरा कर रहा है जिससे मीज़ोरम राज्य को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ा जाएगा और आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी.

जी पार्थसारथी उस समय बर्मा के राजदूत थे जब सू ची को पुरस्कृत किया गया था. वे कहते हैं कि भारत सरकार के उस निर्णय का उस समय उन्होंने विरोध किया था.

पार्थसारथी कहते हैं कि पश्चिमी देशों को भारत को लोकतंत्र पर सीख नहीं देनी चाहिए क्योंकि इतिहास इस बात का गवाह है कि वो अपने हितों के अनुसार उन देशों के साथ जुड़े रहे.

वे कहते हैं, "हम इस अवस्था में नहीं हैं कि मन अनुसार प्रवचन दें. भारत अपने हितों की रक्षा के लिए और उसके अनुसार ही निर्णय लेता है और यह सही है."

इससे जुड़ी ख़बरें
नेहरू की विदेश नीति और पंचशील
28 जून, 2004 | भारत और पड़ोस
क्या है भारत की नेपाल नीति?
29 मई, 2005 | भारत और पड़ोस
'सरकार विदेश नीति पर विफल रही'
12 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>