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रंगून में सैनिकों की भारी तैनाती, तनाव | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बर्मा के सबसे बड़े शहर रंगून में तनाव है और सैकड़ों हथियार बंद सैनिक और पुलिस के जवान सड़कों पर गश्त कर रहे हैं. एक पखवाड़े में ये पहला मौक़ा है कि रंगून की सड़कों पर सरकार के विरोध में कोई बड़ा प्रदर्शन नहीं हुआ. इसकी पीछे एकमात्र कारण है सेना की भारी तैनाती. रंगून के आसपास के इलाक़ों की नाकाबंदी कर दी गई है, वहाँ सैकड़ों की संख्या में हथियार बंद सुरक्षाकर्मियों को तैनात रखा गया है. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि सुरक्षाकर्मी लोगों को रोकते हैं, उन्हें हाथ पीछे कर घुटनों के बल बैठने कहते हैं और फिर उनकी तलाशी ली जाती है. रविवार को रंगून की लगभग आधी दुकानें खुली हुई थीं, लेकिन ख़रीददारों से कहीं ज़्यादा संख्या में सुरक्षाकर्मी दिख रहे थे. रंगून के लोगों के चेहरे पर भय का भाव साफ़ दिखता है. शक्तिशाली सेना के सामने वे अपने को लाचार पाते हैं. लेकिन इसके बाद भी वे आगे भी विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने की बात करते हैं. पैगोडा के आसपास बौद्ध भिक्षु नज़र नहीं आते हैं. उनके मठों पर सुरक्षा बलों ने छापे मारे और क़रीब तीन हज़ार भिक्षुओं को शहर से बाहर ले जाकर हिरासत में रखा गया है. ऐसी भी ख़बरें हैं कि हिरासत में लिए गए भिक्षु अनशन कर रहे हैं. वे सैनिकों का दिया खाना खाने से मना कर रहे हैं. चीन के पास चाभी पूरी दुनिया की आँखें इस समय बर्मा गए संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत इब्राहिम गम्बारी के ऊपर लगी हुई हैं. उन्होंने रविवार को नज़रबंद लोकतंत्रवादी नेता आंग सान सू ची से मुलाक़ात की. संयुक्त राष्ट्र के एक बयान में कहा गया है कि गम्बारी ने सू ची के साथ क़रीब आधा घंटा बातचीत की. इसके बाद गम्बारी बर्मी सैनिक शासकों से और बातचीत करने के लिए दोबारा राजधानी पहुँच गए हैं. अभी तक उनकी सैनिक सरकार के प्रमुख जनरल थान श्वे से मुलाक़ात नहीं हो पाई है. संयुक्त राष्ट्र में अमरीका के पूर्व दूत जॉन बोल्टन का मानना है कि बर्मा संकट के समाधान की चाबी चीन के पास है. उनका कहना है,'' असल मुद्दा ये है कि चीन क्या क़दम उठाएगा. ये सरकार चीनी आर्थिक सहायता और तेल-गैस भंडारों में रुचि के कारण ही टिकी हुई है. मैं समझता हूँ कि चीन बर्मी सैनिक शासकों पर दबाव डालने की स्थिति में है. वैसे अभी तक तो इस बात के संकेत नहीं दिखे हैं कि चीन ने दबाव डाला है.'' जॉन बोल्टन कहते हैं,'' मैं समझता हूँ अमरीका और ब्रिटेन को चीन से दोटूक शब्दों में कहना चाहिए कि वह बर्मी सरकार पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे, वरना उसके साथ संबंधों पर असर पड़ सकता है.'' इस बीच जापान का एक दूत भी बर्मा पहुँच रहा है. पिछले हफ़्ते प्रदर्शनकारियों पर सेना की गोलीबारी में एक जापानी फ़ोटोग्राफ़र की भी मौत हुई थी. जापानी दूत बर्मा सरकार से ये आश्वासन लेना चाहेगा कि इस हत्या की पूरी जाँच कराई जाएगी. | इससे जुड़ी ख़बरें गम्बारी ने सू ची से मुलाक़ात की30 सितंबर, 2007 | पहला पन्ना चीन ने बर्मा पर दबाव बनाया30 सितंबर, 2007 | पहला पन्ना बर्मा में बौद्ध मठ 'सील' किए गए28 सितंबर, 2007 | पहला पन्ना संयुक्त राष्ट्र की बर्मा से संयम रखने की अपील 26 सितंबर, 2007 | पहला पन्ना अब बर्मा में विपक्षियों की धरपकड़26 सितंबर, 2007 | पहला पन्ना बर्मा पर भारत की दुविधा और चुप्पी26 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस बर्मा में अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन23 सितंबर, 2007 | पहला पन्ना सुरक्षा परिषद में पहली बार बर्मा पर चर्चा29 सितंबर, 2006 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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