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न्यूयॉर्क में सरकारी अरबी स्कूल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में अरबी सिखाने वाला ऐसा पहला स्कूल खोला गया है जो सरकारी ख़र्च से चलाया जाएगा लेकिन शुरू होते ही यह स्कूल अनेक तरह के विवादों में घिर गया है. इस स्कूल को नाम दिया गया है - ख़लील जिबरान अंतरराष्ट्रीय अकादमी जो ब्रुकलीन में स्थित है. इसका नाम 20वीं सदी के लेबनानी इसाई कवि के नाम पर रखा गया है और जिसमें अलग-अलग पृष्ठभूमि के 60 छात्रों ने दाख़िला लिया. कुछ छात्रों ने अपनी संस्कृति और जन्मभूमि से जुड़ने के लिए इस अरबी स्कूल में दाखिला लिया तो कुछ ऐसे भी हैं जिनका अरब या इस्लाम से कुछ भी लेना देना नहीं है और उनका मक़सद अरबी भाषा सीखकर अच्छा कौशल हासिल करना है. हालाँकि स्कूल को शहर के सरकारी महकमों का समर्थन मिल रहा है लेकिन पिछले कुछ महीनों से संदेह में आए पाठ्यक्रम और हेड टीचर की वजह से स्कूल विवादों में घिर गया है. गत मंगलवार को जैसे ही स्कूल का कामकाज हुआ, 'मदरसा रोको' (स्टॉप द मदरसा) ग्रुप के सदस्यों ने न्यूयॉर्क से सिटी हॉल के सामने स्कूल बंद करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया. हालाँकि स्कूल के समर्थकों का कहना है कि ये स्कूल न्यूयॉर्क में अन्य भाषाओं के स्कूलों से अलग नहीं नज़र आता. अरबी में मदरसा का मतलब भले ही स्कूल हो लेकिन अंग्रेज़ी में इस शब्द को कट्टरपंथी इस्लामी स्कूलों से जोड़ कर समझा जाता है. इस स्कूल के विरोधियों का मानना है कि यहां के पाठ्यक्रम के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई है और इस वजह से ही संदेह पैदा हुआ है. सही तरीका भूतपूर्व अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के प्रशासन में सहायक रक्षा मंत्री रह चुके फ्रैंक गैफनी का कहना था, "हम सभी अरबी और अरब संस्कृति सिखाने के पक्ष में हैं मगर सवाल सही तरीके से सिखाने का है और ये तरीका सही नहीं है. ये तरीका, ख़तरनाक है, न्यूयॉर्क ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए." फ्रैंक गैफनी वाशिंगटन स्थित सेंटर फॉर सिक्योरिटी एंड पॉलिसी के अध्यक्ष हैं.
इंटरनेट पर खोजने से साफ़ पता चलता है कि ये बहस और विवाद कितना फैल चुका है. एक वेबसाइट पर ये विचार तक व्यक्त किया गया कि स्कूल के फुटबॉल फील्ड को आतंकवादी ट्रेनिंग कैंप में तब्दील कर दिया जाएगा. एक अन्य टिप्पणी थी, "अब मुसलमान न्यूयॉर्क से बाहर जाए बिना ही आतंकवादी बनना सीख सकते हैं." लेकिन न्यूयॉर्क शहर के शिक्षा विभाग ने स्कूल का बचाव किया है और उनका कहना है कि स्कूल में सामान्य पाठ्यक्रम पढाया जाएगा. शिक्षा विभाग के एक अधिकारी गार्थ हैरीज़ ने पत्रकारों के बताया कि न्यूयार्क में चीनी, फ्रांसीसी और रूसी भाषा सिखाने वाले क़रीब 200 छोटे स्कूल हैं और अरबी सिखाने वाला ये स्कूल भी इसी श्रंखला में एक कड़ी है. गार्थ हैरीज़ का कहना था, "'इन बच्चों को अरबी भाषा भी सिखाई जाएगी जो कि इनके लिए बेहतरीन मौक़ा. धार्मिक पढ़ाई की यहां कोई जगह नहीं है. ये पब्लिक स्कूल है और यहां धर्म की शिक्षा नहीं दी जाएगी." समर्थन न्यूयार्क शहर के मेयर माइकल ब्लूमबर्क ने भी स्कूल का समर्थन किया है. न्यूयॉर्क इमीग्रेशन संगठन ने स्कूल के विरोध की निंदा करते हुए कहा है, "ऐसी नस्लवादी टिप्पणियां अरबी भाषा और संस्कृति को आतंकवाद से जोड़ती हैं और उन्हें बर्दाश्त नहीं किया जाएगा बल्कि ये स्कूल छात्रों को धैर्य और संस्कृति से वाकिफ़ कराएगा."
हालाँकि न्यूयॉर्क में रहने वाली मुस्लिम और अरब मामलों की जानकार मोना अल ताहावी मानती हैं कि स्कूल को अपने बारे में ज़्यादा जानकारी मुहैया करानी चाहिए कि उसके पाठ्यक्रम में क्या-क्या शामिल होगा. हालांकि ये सारा विवाद तब बढ़ा जब स्कूल की संस्थापक प्रिंसिपल, डेबी अलमुंतसेर ने टी-शर्ट पर इंतीफ़ादा शब्द लिखे होने का बचाव किया था. इस अरबी शब्द का मतलब अक्सर इसराइल के ख़िलाफ़ फलस्तीनी विद्रोह माना जाता है लेकिन डेबी अलमुंतसेर का कहना था कि इसका मतलब सिर्फ़ झटकना होता है. दो स्थानीय पत्रिकाओं के मुताबिक डेबी अलमुंतसेर का ताल्लुक कुछ इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों से है लेकिन उनके दोस्तों और समर्थकों का कहना है कि वो संयत मुसलमान हैं जो विभिन्न धर्मों के बीच मेल-मिलाप का समर्थन करती है. हालाँकि इन विवादों के बाद उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया और अब एक यहूदी प्रिंसिपल ने उनकी जगह ली है जो अरबी नहीं जानते. अभिभावकों की चिंता इस हंगामे से वो अभिभावक दुखी हैं जिन्होंने अपने बच्चों का दाखिला इस स्कूल में करवाया था.
जब ये विवाद गहराने लगा तो एक ऐसी ही अभिभावक कारमेन कोलोन ने अपने 11 साल के बेटे को इस स्कूल से निकाल लिया. उनका कहना था, "अगर कोई अमरीकी व्यक्ति अरबी भाषा सीखता है तो वो अनुवाद और कस्टम सेवा के ज़रिए काफ़ी धन कमा सकता. जो लोग इस स्कूल के ख़िलाफ़ हैं वो ही समाज में इस तरह का आतंक फैला कर आतंकवादी जैसा बर्ताव कर रहे हैं, और हमें महसूस करवा रहे हैं कि हमारे बच्चे वहां सुरक्षित नहीं है." इस बीच फ्लोरिडा में हीब्रू भाषा पढ़ाने वाला बेन गामला चार्टर स्कूल भी अब कोशेर भोजन और यहूदी संस्कृति की शिक्षा देने की वजह से चर्चा में है. इस पूरी बहस के पीछे मुख्य मुद्दा ये है, क्या धार्मिक शिक्षा दिए बिना अरबी और हीब्रू सिखाई जा सकती है हालांकि बेन गामला स्कूल को बंद करने के लिए विरोध तो नहीं हुए लेकिन स्कूल को हीब्रू क्लासें बंद करनी पड़नी और स्थानीय स्कूल बोर्ड ये तय करेंगे कि क्या उस स्कूल में अध्यापक यहूदी धर्म की वकालत तो नहीं कर रहे थे. न्यूयार्क में सिटी हॉल में विरोध के दौरान सेंटर फॉर सिक्योरिटी पॉलिसी के फ्रैंक गैफनी की राय है कि करदाताओं का पैसा बेन गामला स्कूल में भी नहीं लगना चाहिए. |
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