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गुरुवार, 29 जून, 2006 को 08:21 GMT तक के समाचार
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भारतीय राजघरानों पर न्यूयॉर्क में प्रदर्शनी

न्यूयॉर्क का ग्लास म्युज़ियम
प्रदर्शनी में रखे बेशकीमती सामान भारतीय राजघरानों में इस्तेमाल होते थे.
भारतीय राजघरानों के इतिहास के कुछ अनमोल नमूनों को आजकल अमरीका में एक अनोखी प्रदर्शनी में दिखाया जा रहा है.

न्यूयॉर्क के ग्लास म्यूज़ियम में शीशे के बने हुए उन नायाब फ़र्नीचर और अन्य सजावट की चीज़ों को प्रदर्शन के लिए रखा गया है जो कभी भारत में राजा-महाराजाओं के महलों की शोभा बढ़ाती थीं.

'कार्निंग म्यूज़ियम ऑफ़ ग्लास' नाम के इस शीशे के संग्रहालय में 19वीं और 20वीं शताब्दी में भारत के राजघरानों के लिए पश्चिमी देशों में ख़ास तौर पर बनाए गए कुछ नायाब फ़र्नीचर और सजावट के सामानों को प्रदर्शित किया जा रहा है.

इनमें विभिन्न प्रकार की कुर्सियाँ, मेज़ें, झाड़फ़ानूस, गिलास, जग और अलमारी वगैरह शामिल हैं.

इनमें से कई पटियाला, ग्वालियर, बीकानेर और हैदराबाद के रजवाड़ों और निज़ामों के महल से एकत्र किए गए हैं.

इस प्रदर्शनी की निदेशक जेन स्पिलमैन ख़ुद भी कई बार भारत आ चुकी हैं और अब उन्होंने इसी तरह के भारतीय शाही फ़र्नीचर और सजावट के अन्य सामानों पर एक किताब भी लिखी है.

इस प्रदर्शनी के बारे में वह कहती हैं, "हम लोग बहुत उत्साहित हैं कि पहली बार अमरीका में लोगों को भारत के इन शाही फ़र्नीचर और शीशे के विभिन्न सामानों को देखने का मौका मिल रहा है. लोगों में बहुत रूचि है और वे भारी संख्या में यह देखने आ रहे हैं कि 19वीं सदी के शीशे के ये फ़र्नीचर कैसे दिखते हैं."

अद्भुत नमूने

कुछ फ़र्नीचरों और सजावट के सामानों के अद्भुत आकार और नमूने मन मोह लेने वाले हैं.

 हम लोग बहुत उत्साहित हैं कि पहली बार अमरीका में लोगों को भारत के इन शाही फ़र्नीचर और शीशे के विभिन्न सामानों को देखने का मौका मिल रहा है. लोगों में बहुत रूचि है और वे भारी संख्या में यह देखने आ रहे हैं कि 19वीं सदी के शीशे के ये फ़र्नीचर कैसे दिखते हैं
जेन स्पिलमैन, प्रदर्शनी की निदेशक

सबसे चर्चित एक ऐसी मेज़ है जिसको एक नाव की शक्ल में बनाया गया है. चार टन वजनी ख़ास तरह के शीशे को काट कर इस मेज़ को बनाया गया था. इसके चारों पाए भी शीशे के ही बने हुए हैं.

वर्ष 1889 में फ़्रांस की बकारात कंपनी के चार्ल्स कोर्नू ने सिर्फ़ तीन ऐसी मेज़ें बनाई थीं और बीकानेर के राजा गंगा सिंह जी बहादुर ने वर्ष 1930 में इनमें से दो मेज़ों को खरीद लिया था. बीकानेर के लालगढ़ महल में आज भी इनमे से एक मेज़ रखी हुई है.

इस प्रदर्शनी में इसके अलावा एक 11 फ़ुट लंबी शीशे की अलमारी भी है जिसमें शीशे के ही दरवाज़े लगे हैं. चार-चार टन के झाड़फ़ानूस, मोमबत्ती लगाने के स्टैंड, साइड टेबल और कुर्सियाँ भी इस प्रदर्शनी की शोभा बढ़ा रही हैं.

इसके अलावा कुछ नायाब डिज़ाइनों के दस्तावेज़ और किताबें और कुछ पुराने महलों में रखे फर्नीचरों के चित्र भी प्रदर्शनी का हिस्सा हैं.

अमरीकी लोगों को सबसे ज़्यादा जो बात हैरत में डाल रही है वह यह है कि भारत में 19वीं सदी में भी इस तरह के नाज़ुक और कीमती शीशे के बने फ़र्नीचर को राजा-महाराजा इस्तेमाल करते थे.

नाज़ुक ज़िम्मेदारी

19वीं सदी के शुरू से ही यूरोप में बनने वाले इस तरह के कट ग्लास या ख़ास तरह के शीशे से बनाए जाने वाले फ़र्नीचर और सजावटी सामान का भारत में बड़ा बाज़ार होता था. शाही घराने इनके मुख्य ख़रीदार होते थे.

शीशे का सामान
लोग यह देखकर हैरान हैं कि भारत में इस तरह का सामान इस्तेमाल होता था.

प्रदर्शनी की निदेशक जेन स्पिलमैन बताती हैं कि इन सामानों को भारत से अमरीका लाने का ज़िम्मा एक ख़ास कंपनी को सौंपा गया था जो इस काम में माहिर हैं कि ऐसे नाज़ुक सामान एक मुल्क से दूसरे मुल्क लाते ले जाते हैं.

आख़िर सारा सामान सही सलामत अमरीका तो पहुँच गया लेकिन इस प्रदर्शनी में रखी गई शीशे की इन धरोहरों को वापस भारत भी सही-सलामत पहुँचाना आयोजकों की ही ज़िम्मेदारी है.

भारतीय कानून के मुताबिक इस तरह की भारतीय इतिहास से जुड़ी हुई चीज़ों को प्रदर्शनी में रखने की तो अनुमति होती है लेकिन एक शर्त पर कि इन्हें उसी हालत में सही-सलामत वापस भी पहुँचाया जाए.

इनमें से बहुत से नायाब फ़र्नीचर आज भी राजस्थान, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश औऱ पंजाब के उन महलों में ही रखे हैं जहाँ उन्हें लाया गया था.

यह और बात है कि अब कुछ महलों को होटलों में तब्दील कर दिया गया है इसलिए इस शाही शानोशौकत का मज़ा वह लोग भी उठा सकते हैं जो इन होटलो में रहने के लिए आते हैं.

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