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परंपराएँ संरक्षित हैं मेहरानगढ़ क़िले में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इसे सन सिटी कहें या फिर ब्लू सिटी, जोधपुर शहर अपने कई नामों, परंपराओं, रवाजों और राठौड़ राजघराने के स्थापत्य के इतिहास के लिए जाना जाता है. इसी शहर के बीचोंबीच एक पहाड़ी पर खड़ा है मेहरानगढ़ क़िला. पंद्रहवीं शताब्दी में राठौड़ राजपरिवार के राजा जोधाजी महाराज ने इस अभेद्य माने जाने वाले क़िले का निर्माण कराया था. समय बदला और साथ ही राजमहलों और क़िलों की तस्वीर भी. कभी मुगल बादशाह औरंगज़ेब की तोपों का सामना करने वाला यह क़िला आज एक संग्रहालय में तब्दील हो चुका है. आज एक ओर वर्तमान समय का लोकतंत्र है और दूसरी तरफ़ राजपरिवार से जुड़े होने का अतीत. इसी अहसास और व्यवहार में आज भी पीढ़ियों से इस क़िले में काम कर रहे लोग यहाँ मौजूद हैं, अपने में तमाम परंपराओं, पहचानों को समेटे हुए. जीवित परंपराएँ आज भी जीवित परंपराओं के कई चिन्ह इस क़िले में बाकी हैं. मसलन नौबतख़ाने पर गूँजते नगाड़ों और शहनाई की आवाज़ आज भी क़िले में आ रहे लोगों का स्वागत करती हैं. यह बात और है कि यह स्वागत संगीत आज राजा की पालकी की जगह वातानुकूलित बसों और कारों से उतर रहे पर्यटकों के स्वागत में बजता है. अपनी पीढ़ियों की ज़िम्मेदारी को अभी तक निभा रहे इन कलाकारों से हमने पूछा कि राजशाही और आज के दौर में क्या कुछ फ़र्क महसूस होता है. क़िले के मुख्य द्वार पर नगाड़ा बजाते मोहम्मद उमर बताते हैं, "उस दौर की बात दूसरी थी. तब हमारे पूर्वज राजाओं के क़रीबी होते थे और इसके चलते बिरादरी में उनका बड़ा सम्मान होता था. आज तो हम आम बैंड-बाजे वालों जैसे समझे जाते हैं."
क़िले में उपर जाने के लिए लिफ़्ट लगा दी गई है पर पुराने रास्ते से आगे बढ़ें तो बीच में भील समुदाय के दो कलाकार रावणहत्ता नाम का पारंपरिक वाद्य बजाते मिल जाते हैं. कभी राजा की सवारी से न्यौछार की मोहरें बटोरकर अपना ग़ुजारा करने वाले ये भील अब पर्यटकों की कृपा पर आश्रित हैं. ये कलाकार हिंदी नहीं जानते और न ही विदेशी भाषाएँ, पर संगीत की भाषा इन्हें गुजारे भर का ईनाम दिला ही देती है. राजसी अंदाज़ शाम ढली तो क़िले के परकोटे पर वर्तमान राजा महाराजा गज सिंह की ओर से आयोजित भोज में सम्मिलित होने का मौका मिला. बाडमेर ज़िले के लंगा और मांगड्या समुदाय के पारंपरिक कलाकारों ने अपने संगीत से समा बाँधा. पधारो म्हारे देश की तान के साथ कभी घूमर था तो कभी बाबा बुल्लेशाह का कलाम. इसी दौरान हमने महाराजा गज सिंह से पूछा कि वो ख़ुद किस तरह का बदलाव महसूस करते हैं.
गज सिंह बताते हैं, "मैं लोकतंत्र में आस्था रखता हूँ पर जब तुलना करता हूँ तो पाता हूँ कि आज जन प्रतिनिधि पाँच वर्षों के लिए चुनकर आते हैं और काम पसंद न आने पर दूसरे क्षेत्र में चले जाते हैं पर राजा तो ऐसा नहीं कर सकते थे. उनको तो जीवनभर अपनी प्रजा के बीच ही रहना होता था और उनका एक सम्मान भी था." राजा की मौजूदगी में रंक राजशाही के दौर में चले जाते हैं. वही चाल, वही ढाल. हालांकि यह कह पाना ज़रा कठिन है कि इसकी केवल एक वजह है और वह है राजा का सम्मान क्योंकि कभी-कभी यह पर्यटन की औपचारिकता का हिस्सा होता है. बहरहाल, भले ही माहौल और सूरत बदल गई हो पर मेहरानगढ़ क़िला तमाम परंपराओं को आज भी अपने में समेटे हुए है और देखने लायक है. | इससे जुड़ी ख़बरें दुनिया के सात नए अजूबे कौन से?02 जनवरी, 2006 | मनोरंजन लाल क़िले को मिली सेना से मुक्ति22 दिसंबर, 2003 | भारत और पड़ोस विवादों में फँसा हाथ रिक्शा | भारत और पड़ोस जैसलमेर क़िला सील किया | भारत और पड़ोस आम लोगों तक 'शाही शराब' | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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