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परमाणु समझौते में नया पेंच | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के परमाणु परीक्षण करने पर असैनिक परमाणु समझौता रद्द करने की अमरीकी चेतावनी ने इस मामले पर अपने ही घर में विरोध का सामना कर रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मुश्किलें बढ़ा दी है. अमरीकी विदेश विभाग के प्रवक्ता सीन मैककॉरमैक का कहना है कि अमरीकी परमाणु ऊर्जा क़ानून (1954) के तहत राष्ट्रपति के पास परमाणु परीक्षण की स्थिति में समझौता रद्द करने का अधिकार है. उन्होंने ये भी कहा कि ऐसे हालात में अमरीका को यह अधिकार होगा कि वह भारत को दी गई परमाणु इंधन और सामग्री वापस ले ले. हाल ही में असैनिक परमाणु सहयोग को लागू करने वाले 123 समझौते पर भी सहमति भी हो गई थी. हालाँकि यह अमरीकी परमाणु ऊर्जा क़ानून का ही हिस्सा है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सीन मैककॉरमैक ने कहा "123 समझौते में ये प्रावधान है कि अगर भारत परमाणु परीक्षण करता है तो वो सभी सहयोग रद्द हो जाएंगे जो परमाणु ऊर्जा से संबंधित हैं." मैककॉरमैक के इस बयान से ठीक एक दिन पहले भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद मे बयान देते हुए कहा था कि इस समझौते का असर भारत के सैन्य कार्यक्रम या परमाणु परीक्षण करने के अधिकार पर नहीं पड़ेगा. प्रधानमंत्री ने कहा था, "इस बात का सवाल ही नहीं पैदा होता कि हमारी स्वतंत्र विदेश नीति से किसी तरह का कोई समझौता किया जाए. हम अपनी सामरिक संप्रभुता बनाए रखेंगे." घर में विरोध अमरीकी विदेश विभाग के बयान ने भारत में परमाणु समझौते का विरोध कर रहे वामपंथी और विपक्षी दलों को नया हथियार दे दिया है.
केंद्र में कांग्रेस पार्टी की अगुआई वाली यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दल इस समझौते को पहले ही ठुकरा चुके हैं. वामपंथी दलों के लगातार विरोध के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का लहज़ा भी थोड़ा तल्ख़ हुआ और पिछले दिनों उन्होंने एक अंग्रेज़ी दैनिक को दिए इंटरव्यू में ये कह दिया, "अब परमाणु समझौते पर दोबारा बातचीत की गुंजाइश नहीं है. अगर वामपंथी दल समर्थन वापस लेना चाहते हैं, तो ले लें." वामपंथी दलों और विपक्षी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का आरोप है कि समझौते से परमाणु परीक्षण का अधिकार छिन गया है और यह भारत की संप्रभुता को गिरवी रख कर किया गया है. ऐसे में अमरीकी से आए ताज़ा बयान पर संसद के मौजूदा सत्र में एक बार फिर परमाणु समझौते का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठ सकता है. जॉर्जिया विश्वविद्यालय में एशिया कार्यक्रम के निदेशक अनुपम श्रीवास्तव का कहना है कि मैककॉरमैक का बयान से कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए क्योंकि यह अमरीकियों को ध्यान में रख कर दिया गया बयान है. वो कहते हैं, "सितंबर-अक्तूबर में कॉंग्रेस की बैठक होगी जिसमें 123 समझौते को मंज़ूर किया जाना है. हमें ध्यान रखना होगा कि भारत की तरह अमरीका में भी राजनीतिक स्तर पर समझौते का विरोध हो रहा है." श्रीवास्तव का कहन है कि तकनीकी रूप से अमरीकी राष्ट्रपति को परमाणु परीक्षण के बाद समझौता रद्द करने का अधिकार तो होगा लेकिन ऐसी स्थिति के लिए भी उपाय किए गए हैं. उनका कहना है, "परमाणु परीक्षण की ज़रूरत क्यों पड़ी इस पर विचार के लिए समझौते के तहत बनने वाली साझा समिति विचार करेगी और तब कोई फ़ैसला किया जाएगा." |
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