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बुधवार, 25 जुलाई, 2007 को 07:28 GMT तक के समाचार
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अमरीका 'डिजिटल डेमोक्रेसी' की राह पर

यू ट्यूब
अब इंटरनेट के ज़रिए ही जनता अपने नेताओं से सवाल पूछ रही है
आजकल ज़माना डिजिटल का है. तस्वीरें पीली पड़ रही हों, गाने बेसुरे हो रहे हों, सालों से बक्से में बंद पुरानी चिट्ठियों की रोशनाई फीकी पड़ रही हो- कोई टेंशन नहीं, सब कुछ डिजिटल कर दीजिए, इंटरनेट पर डालिए...जहाँ चाहिए वहाँ पहुँचा दीजिए.

अब देखिए अमरीकी लोकतंत्र कितना पुराना हो चुका है. दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र है....और वो भी अब डिजिटल होने की राह पर है. यानि डिजिटल डेमोक्रेसी.

और 2008 के राष्ट्रपति चुनावों में लोकतंत्र का ये डिजिटल तेवर पूरे ज़ोरशोर से नज़र आ रहा है. चुनावी बहस हो, वोटरों के सवाल हों, प्रचार हो, आरोप लगाने हों या चुनाव के लिए पैसा इकट्ठा करना हो...काफ़ी कुछ इन दिनों इंटरनेट पर ही हो रहा है. और इस लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंच बना हुआ है वीडियो वेबसाइट यू ट्यूब.

कानपुर और कराची की चुनावी रंगीनी देखकर आए हम जैसे लोगों को अब तक अमरीकी चुनाव बड़े नीरस लगते थे. इस बार के चुनावों ने सारी शिकायत ही दूर कर दी है.

चुनाव हुआ रंगीन

पिछले दिनों की ही बात ले लीजिए. एक मोहतरमा हैं.. समंदर में डुबकी लगाने गईं दो कपड़ों में...कपड़े क्या ...रूमाल कह लें....और पानी ठंडा था या गरम ये नहीं मालूम लेकिन डुबकी लगा कर निकलीं तो डेमोक्रेट्स की ओर से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए जुटे बराक ओबामा के लिए आहें भर रही थीं.

यू ट्यूब पर राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवारों के वीडियो क्लिप्स भी हैं

यू ट्यूब पर कहर बरपा रहे उनके इस वीडियो में ओबामा भी नज़र आते हैं...जी हां उनके साथ ही डुबकी लगाते हुए....और वेबसाइट पर इसे देखनेवालों की बाढ़ सी आई हुई है.

और कहीं ये बाढ़ वोटों में न बदल जाएं तो रिपब्लिकन उम्मीदवार जुलियानी को चाहनेवालों ने भी एक वीडियो डाल दिया यू ट्यूब पर.

और इसमें एक नहीं, दो नहीं तीन-तीन सुंदरियां दिखती हैं ऐसे कपड़ों में जिन्हें देखकर आप सोच में पड़ जाएं कि ये सिले सिलाए थे या फिर पहनने के बाद सिले गए हैं.

डेमोक्रेट्स की उम्मीदवारी में सबसे आगे चल रहीं हिलेरी क्लिंटन ने तो यू ट्यूब पर एक कॉंटेस्ट ही करवा डाला और जनता ने चुना उनके कैंपेन के लिए सेलिन डियोन का गाना.

लेकिन लोकतंत्र में गाना बजाना ही नहीं होता, जनता से भी पाला पड़ता है. तो इस बार जनता अपने सवाल वीडियो पर रेकॉर्ड करके यू ट्यूब पर डाल रही है, और यहां का एक टीवी चैनल उन सवालों को उम्मीदवारों के सामने रखकर लाइव बहस करवा रहा है.

इराक़ हो या अफ़गानिस्तान, ग़रीबी हो या भगवान हर मसले पर सवाल पूछे जा रहे हैं. बिल्कुल सीधे, बिल्कुल बेबाक.

सवाल-जवाब भी ऑनलाइन

इक्कीस साल के जेम्स कोटेकी यू ट्यूब पर कई राजनीतिक वीडियो भेज चुके हैं. उनका कहना है कि यू ट्यूब नेता और जनता के बीच बातचीत का सबसे सीधा रास्ता है.

ये बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों पर दबाव बनाएगा कि वो अपनी ख़बरों को सटीक रखें, सही रखें, पारदर्शी रखें
प्रोफ़ेसर प्रवीण चौधरी

वो कहते हैं, “आप देश के किसी कोने में हो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आप एक तरह से आमने सामने बात कर रहे होते हैं.’’

तो क्या ये नया तरीका, ये नया चलन लोकतंत्र की सेहत के लिए अच्छा है. प्रोफ़ेसर प्रवीण चौधरी न्यूयॉर्क की स्टेट यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र पढ़ाते हैं. उनका कहना है कि इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी.

लेकिन साथ ही कहते हैं, “ ये बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों पर दबाव बनाएगा कि वो अपनी ख़बरों को सटीक रखें, सही रखें, पारदर्शी रखें.’’

वहीं इंटरनेट कम्यूनिकेशन कंसल्टेंट मोरा एरंस कहती हैं कि ये नया रास्ता इसलिए सबसे बेहतर है क्योंकि इसपर कोई बंदिशें नहीं हैं, रूकावट नहीं है.

बहुत बेहतर. लेकिन लोकतंत्र में जिस तरह की गंभीर बहस अख़बारों में हो सकती है या फिर कुछ हद तक टेलिविज़न पर हो सकती है क्या वो यू ट्यूब पर हो सकती है. प्रोफ़ेसर चौधरी कहते हैं कि गंभीर बहस तो नहीं लेकिन अभी ये दूसरों को कमर कसने पर तो मजबूर कर ही सकता है.

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