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शुक्रवार, 20 अप्रैल, 2007 को 12:49 GMT तक के समाचार
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इराक़ में मौत की सज़ा की निंदा
इराक़
एमनेस्टी का कहना है कि कुछ लोगों को निष्पक्ष मुक़दमा चलाए बिना ही फाँसी दे दी गई
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि इराक़ दुनिया भर में ऐसा चौथा देश बन गया है जहाँ मृत्युदंड का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने लगा है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2004 के मध्य से अब तक इराक़ में कम से कम 270 लोगों को मौत की सज़ा सुनाई जा चुकी है और उनमें से काफ़ी मामलों में बिना समुचित मुक़दमा चलाए ही सज़ा सुना दी गई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि 100 से ज़्यादा लोगों को फाँसी दी भी जा चुकी है.

सिर्फ़ चीन, ईरान और पाकिस्तान में मौत की सज़ा का अक्सर सुनाई और दी जाती है.

इराक़ी अधिकारियों ने एमनेस्टी इंटरनेशनल की इस रिपोर्ट को यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया है कि इस्लामी दंड संहिता के तहत मृत्युदंड एक अभिन्न हिस्सा है.

इराक़ के एक वरिष्ठ जजजाफ़र अल मुसावी का कहना था कि मृत्यु दंड का प्रावधान देश के संविधान में किया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि इराक़ में क़ैदियों को जितने अधिकार प्राप्त हैं उतने कुछ पश्चिमी देशों में भी नहीं हैं.

इराक़ी सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा कि मृत्यु दंड के सभी मामलों में क़ानून का पूरी तरह से पालन किया गया है और मौत की सज़ा देने के मामलों में पूरी पारदर्शिता बरती गई.

इराक़ पर 2003 में अमरीका के नेतृत्व में विदेशी गठबंधन ने सद्दाम हुसैन को जब सत्ता से हटा दिया था तो मृत्यु दंड बंद कर दिया था लेकिन जब इराक़ में अंतरिम सरकार बनी तो मौत की सज़ा को फिर से शुरू कर दिया गया था.

इराक़ के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को भी दिसंबर 2006 में फाँसी दे दी गई थी.

एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि इराक़ में मृत्यु दंड फिर से शुरू किया जाना उस वैश्विक भावना के ख़िलाफ़ है जिसमें औसतन हर साल कम से कम तीन देश अपने यहाँ मृत्यु दंड के प्रावधान को समाप्त कर रहे हैं.

इराक़ की अंतरिम सरकार ने मृत्यु दंड 2004 में यह कहते हुए फिर से शुरू किया था कि यह देश में ख़राब सुरक्षा हालात में एक ठोस एहतियाती उपाय के तौर पर काम करेगा.

हालाँकि एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि मृत्यु दंड का प्रावधान शुरू करने से हिंसा में कमी आने के बजाय और बढ़ोत्तरी हुई है. संगठन का तर्क है कि हो सकता है कि मृत्य दंड की वजह से इराक़ी समाज में क्रूरता बढ़ी हो.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2006 में इराक़ में 65 लोगों को फाँसी दी गई जिनमें दो महिलाएँ भी थीं.

संगठन ने इराक़ में मौत की सज़ा के प्रावधान पर रोक लगाने का आहवान करते हुए कहा कि अमरीकी और ब्रितानी सेनाओं को ऐसे किसी भी क़ैदी को इराक़ी सुरक्षा बलों को नहीं सौंपना चाहिए जिन्हें मौत की सज़ा सुनाई जा चुकी हो.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की ब्रिटेन शाखा की निदेशक केट ऐलेन का कहना था, "इराक़ में समय को पीछे मोड़ दिया गया है और हम देख रहे हैं कि एक बड़ी संख्या में लोगों को बहुत जल्दबाज़ी में और निष्पक्ष तरीके से मुक़दमा चलाए बिना ही फाँसी पर लटका दिया गया है."

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में ऐसे अनेक मामलों का ज़िक्र किया गया है जिनमें गिरफ़्तार किए गए लोगों को सिर्फ़ एक या दो घंटा ही मुक़दमा चलाकर मौत की सज़ा सुना दी गई और इसमें उनके उन कथित इक़बालिया बयानों को आधार बनाया गया जो प्रताड़ना के ज़रिए लिए गए थे."

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