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मंगलवार, 16 जनवरी, 2007 को 12:40 GMT तक के समाचार
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'पिछले साल 34 हज़ार इराक़ी मारे गए'
विस्फोट
इराक़ में पिछले कुछ समय से हिंसा में वृद्धि हुई है
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि इराक़ में पिछले वर्ष हिंसा में 34 हज़ार से ज़्यादा आम नागरिक मारे गए.

इराक़ में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के प्रमुख जियानी मैगाज़ेनी ने कहा कि इराक़ में वर्ष 2006 में हिंसा के कारण 34,452 लोगों की मौत हुई और 36 हज़ार से ज़्यादा घायल हुए.

यह आँकड़ा इराक़ के आंतरिक मंत्री की ओर से पहले किए गए आकलन से तिगुना ज़्यादा है.

हालाँकि इस संबंध में एकदम सही आँकड़ा बताना काफ़ी कठिन है और इससे पहले भी संयुक्त राष्ट्र के आँकड़े पर इराक़ की सरकार सवाल उठा चुकी है.

जियानी मैगाज़ेनी का कहना है कि उन्होंने यह आँकड़ा स्वास्थ्य मंत्रालय, अस्पतालों और दूसरी एजेंसियों से प्राप्त जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है.

बग़दाद में बीबीसी के संवाददाता एंड्रयू नॉर्थ का कहना है संघर्ष में कितने इराक़ी मारे जा रहे हैं इसकी सही जानकारी तो किसी के पास नहीं है लेकिन संयुक्त राष्ट्र का अनुमान संकेत देने के लिए पर्याप्त है.

इराक़ की ओर से इस आँकड़े पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है लेकिन अधिकारियों का कहना है कि अकेले अक्तूबर में 37 सौ लोगों के मारे जाने की बात कहना काफ़ी अधिक है.

शिया-सुन्नी संघर्ष

जानकारों का कहना है कि हिंसा में वृद्धि की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है और ज़मीनी स्तर पर इसके प्रमाण भी हैं.

हर सुबह पुलिस बग़दाद की गलियों से दर्जनों लाशें एकत्र करती है. इनमें से ज़्यादातर शिया और सुन्नियों के बीच जारी जातीय हिंसा के शिकार रहते हैं.

आशंका जताई जा रही है कि सद्दाम हुसैन और उनके सहयोगियों को फाँसी दिए जाने के बाद हिंसा और बढ़ेगी. ये सभी लोग सुन्नी समुदाय से थे.

सद्दाम हुसैन को फाँसी देने के समय की गई टिप्पणी और उसके बाद अब उनके सौतेले भाई बारज़ान अल-तिकरिति को फाँसी दिए जाने के तरीके की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा की जा रही है.

जियानी मैगाज़ेनी का कहना है कि इराक़ की सरकार को क़ानून व्यवस्था सुधारने के लिए और कोशिश करनी चाहिए.

उन्होंने कहा, " इराक़ में लोगों को प्रभावी तरीक़े से सुरक्षा मुहैया नहीं कराई जा रही है. चरमपंथी या तो आपस में लड़ते रहते हैं या फिर सुरक्षा बलों से. ''

जियानी मैगाज़ेनी चेतावनी देते हुए कहा कि जब तक क़ानून-व्यवस्था की स्थिति नहीं सुधरेगी जातीय हिंसा जारी रहेगी और एक दिन स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाएगी.

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