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मंगलवार, 12 दिसंबर, 2006 को 12:33 GMT तक के समाचार
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'हरे कृष्णा' अनुयाइयों में डर और रोष

क्षतिग्रस्त घर
कज़ाकस्तान में हरे कृष्णा अनुयाइयों के घर टूटने की ख़बर अख़बारों की सुर्खियाँ नहीं बनीं
कज़ाकस्तान के सबसे बड़े शहर अलमाटी से कुछ ही दूर ‘हरे कृष्णा’ बस्ती के 13 घर तोड़े जाने से इस सम्प्रदाय के अनुयाइयों में डर और रोष है.

हालाँकि कारासाई ज़िले के स्थानीय प्रशासन का कहना है कि मकान तोड़ने के फ़ैसले का मज़हब से कुछ लेना-देना नहीं है और ये कार्रवाई ज़मीन पर अवैध निर्माण को लेकर की गई है.

लेकिन प्रशासन की इस दलील पर गाँव के लोग विश्वास करने को तैयार नहीं है.

एक दशक पुरानी इस बस्ती में लगभग 60 परिवार रहते हैं और ये मध्य एशिया की इकलौती हिंदू बस्ती है.

पिछले कई वर्षों से यहाँ उत्सवों का आयोजन किया जाता रहा है और इस क्षेत्र में रहने वाले हिंदुओं के बीच ये उत्सव बहुत लोकप्रिय हैं.

आर्थिक तेज़ी

‘हरे कृष्णा’ अनुयाइयों का कहना है कि कज़ाकस्तान में आर्थिक तेज़ी के बाद जब से ज़मीन की कीमतें बढ़ी हैं, स्थानीय प्रशासन ने ज़मीन खाली कराने के लिए उन पर दबाव डालना शुरू कर दिया है.

अधिकारियों का कहना है कि अनुयाइयों के पास भूमि पंजीकरण संबंधी दस्तावेज़ नहीं हैं.

 हमने भूमि पंजीकरण के लिए आवेदन किया, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया. बाद में अधिकारी यहाँ आए और हमारे घर तोड़ दिए
मैक्सिम वारफोलामीव, प्रवक्ता हरे कृष्णा

अनुयाइयों का तर्क है कि उन्होंने कई बार पंजीकरण कराने की कोशिश की, लेकिन हर बार उन्हें निराशा हाथ लगी.

कज़ाकस्तान में हरे कृष्णा चेतना की अंतरराष्ट्रीय सोसायटी के प्रवक्ता मैक्सिम वारफोलामीव ने कहा, “हमने भूमि पंजीकरण के लिए आवेदन किया, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया. बाद में अधिकारी यहाँ आए और हमारे घर तोड़ दिए.”

हरे कृष्णा अनुयाइयों के घरों में तोड़फोड़ की कार्रवाई चाहे मज़हब को लेकर हो या फिर भूमि के लिए, लेकिन ये छवि उस छवि से मेल नहीं खाती जो कज़ाकस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाने की कोशिश कर रहा है.

धार्मिक सहिष्णुता

नज़रबाएव
राष्ट्रपति नज़रबाएव का जोर धार्मिक संहिष्णुता पर है

राष्ट्रपति नूरसुल्तान नज़रबाएव देश में धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देने की बात उठाते रहे हैं.

उन्होंने राजधानी अस्ताना में विशाल शांति पिरामिड का निर्माण करवाया है . साथ ही यहाँ अंतरधार्मिक सम्मलेन का आयोजन भी किया गया था.

नज़रबाएव ने हाल ही में बीबीसी से एक साक्षात्कार में कहा था, “सम्मेलन में ईरान के मुल्ला और इसराइल के रब्बी (यहूदी धर्मगुरू) एक साथ बैठे. हमारे देश में 140 संप्रदाय शांतिपूर्वक रह रहे हैं और ये दिखाता है कि हमारा देश क्या है.”

हालाँकि हेलसिंकी कम्यूनिटी फॉर दी ह्यूमेन राइट्स की अलमाटी शाखा की प्रमुख निनेल फोकिना का कहना है, “धार्मिक संहिष्णुता को लेकर कही जा रहे बातें झाँसा मात्र हैं. सरकार इस कार्ड का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख बढ़ाने के लिए कर रही है, लेकिन हकीक़त में ऐसा नहीं है.”

शायद यही वजह है कि कज़ाकस्तान के हिंदू कई साल बाद भी प्रशासन से एक मंदिर बनाने की मँजूरी तक नहीं ले सके हैं.

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