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हवा के शहर में आग का मंदिर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अज़रबैजान की राजधानी को हवा का शहर कहा जाता है क्योंकि यहाँ तेज़ हवा चलती रहती है जो जाड़ों में बहुत भयंकर हो जाती है. हवा के इसी शहर के पास सुराख़ानी नाम के एक गाँव में यह 'आतिशगाह' यानी अग्नि मंदिर है. मंदिर की गढ़ीनुमा इमारत में जब मैं दाखिल हुआ तो चारों तरफ़ सन्नाटा पसरा हुआ था. पत्थर के फ़र्श पर सूरज की तेज़ किरणें पड़ रही थी. दूर से देखें तो यह इमारत मध्यकालीन गढ़ जैसी लगती है. पत्थर की दीवार के ऊपर उसी तरह की फसील बनी है जैसे क़िले की दीवारों पर बनाई जाती थी जिसका इस्तेमाल ओट लेने के लिए किया जाता था. पत्थर की दीवारों से बनी पँचकोना चौहद्दी के बीचों बीच एक चौकोर मंदिर जैसी इमारत है जिसके मेहराबदार दर खुले हुए हैं और छत मंदिर की छतों जैसी है जिस पर त्रिशूल लगा है. मंदिर के अंदर एक कुंड जैसा बना है जिसके अंदर से लगातार ज्वाला निकलती रहती है. पंचकोना फसील के साथ छोटी-छोटी कोठरियाँ बनी हुई थी और लगभग हर कोठरी के चौकोर दरों के ऊपर पत्थर की तख़्तियाँ लगी थी. दूर से देखने पर ही पता चल गया कि इन तख्तियों पर जो कुछ लिखा है वह गुरुमुखी जैसी लिपि में है. इतिहास अग्नि मंदिर का इतिहास रोचक है लेकिन इतना तय हो गया है कि यह हिंदू मंदिर है जिसे 'सिल्क रूट' पर व्यापार करने वाले व्यापारियों ने स्थापित किया था. इन व्यापारियों का संबंध पंजाब क्षेत्र से था और कांगड़ा में माँ ज्वालाजी मंदिर के प्रति अपनी आस्था के कारण उन्होंने इस अग्नि मंदिर को बनाया था. मंदिर की इमारत के मुख़्य दरवाज़े पर ही काले पत्थर पर खुदी इबारत के अनुसार इस मंदिर का निर्माण बुद्धदेव ने राजा विक्रमादित्य के समय में कराया था. यहीं ये भी दर्ज है कि बुद्धदेव मादजा ग्राम के निवासी थे जो अब कुरूक्षेत्र में रहते हैं. पत्थर पर तारीख़ संवत 1783 पड़ी है जो 1816 ईसवीं सन मानी जाएगी. इस पत्थर के साथ ही दूसरा पत्थर भी लगा है जिसमें मंदिर के मुख्य द्वार में बनाने वालों के नाम उत्तमचंद और शोभराज लिखे हुए हैं. इस पत्थर पर पड़ी तारीख़ 1827 है. अज़रबैजान के पुरातत्वशास्त्री एसबी अशुरबेयली के अनुसार इस मंदिर के पुजारी तथा अन्य भारतीय उत्तर भारत से आया करते थे. वे यहाँ पूजापाठ तथा और तरह-तरह के अनुष्ठान करते थे. वर्ष 1860 में बी डार्न नाम के एक विद्वान यहाँ आए थे और उन्होंने भारतीय पुजारियों को यहाँ देखा था. यहाँ से अंतिम भारतीय पुजारी 1880 में चला गया था और उसके बाद कोई अन्य पुजारी नहीं आया था. कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि यह कभी अग्निपूजक ईरानियों का मंदिर रहा होगा. रोमन विद्वान प्रिस्क पीरनियन ने इस मंदिर का उल्लेख पाँचवी शताब्दी में किया था. यहाँ ईरान के अग्नि पूजक आया करते थे. लेकिन क्षेत्र में इस्लाम आने के बाद अग्नि पूजक इधर-उधर चले गए थे और इस मंदिर ने 15वीं शताब्दी में भारतीय व्यापारियों को अपनी ओर आकर्षित किया था जिनकी अग्नि के प्रति आस्था और श्रद्धा थी. यही कारण है कि 18वीं शताब्दी के बाद यह भारतीय व्यापारियों का मंदिर बन गया था. ज़ोला ने यह भी बताया कि यह परिसर व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र भी था. व्यापारी कोठरियों में ठहरते थे. अपना सामान रखते थे और व्यापार करते थे. आस्था हम लोग अहाते में दीवार के साथ बनी कोठरियाँ देख ही रहे थे कि अचानक दो अज़री औरतें मंदिर के परिसर में आ गईं. वे सीधे मंदिर के अंदर गईं और हाथ जोड़ कर खड़ी हो गईं. मुझे आश्चर्य हुआ. अज़रबैजान में लगभग सौ फ़ीसदी मुस्लिम आबादी है. इसके अलावा यह सोवियत संघ का हिस्सा रह चुका है जहाँ धर्म के लिए बहुत जगह नहीं थी.
ऐसी पृष्ठभूमि के बावज़ूद अगर आज भी साधारण लोगों में इस मंदिर के प्रति इतना विश्वास और श्रद्धा है तो यह सोचने की बात है. मैंने ज़ोला से पूछा तो उसने बताया कि इन औरतों ने ज़रूर कोई मन्नत मानी होगी जो पूरी हो गई होगी. या हो सकता है ये कोई मन्नत मानने आई हों. बताया जाता है कि कम्युनिस्ट शासन के दौरान भी लोग छिप छिप कर यहाँ पूजा करने आया करते थे. यह पूछने पर कि पूजा कैसे करते हैं वह कुछ नहीं बता सकी. अहाते के अंदर कुछ कोठरियों में संग्रहालय और म्यूज़ियम भी बनाया गया है. यहाँ मंदिर परिसर में आने वाले लोगों और उनके कार्य व्यापार की आकृतियाँ लगी हैं. एक जगह एक सेठनुमा आदमी बैठा अपने मुंशी को कुछ बता रहा है. वहीं एक साधु अपना एक हाथ ऊपर उठाए खड़ा है. कहीं चोर जंजीरों में बंधा खड़ा है. संग्रहालय देखकर हम बाहर आए. अज़री औरतें मन्नत मानकर जा चुकी थी. सूरज ढल रहा था. तेल के कुएँ पर लगे लोहे के बड़े बड़े तिकोने खंभे खामोश खड़े थे. मैं सोचने लगा भारत में कितने लोगों को यह पता होगा कि यहाँ अज़रबैजान के एक गाँव में हिंदू अग्नि मंदिर है. | इससे जुड़ी ख़बरें अर्ज़ी लगाते हैं लोग देवता के पास04 नवंबर, 2004 | भारत और पड़ोस इन रामनामियों को न मंदिर चाहिए न मूर्ति03 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस सौ साल से भी पुराना है अयोध्या का विवाद06 दिसंबर, 2004 | भारत और पड़ोस विदेशी फूल, देसी माली21 जून, 2004 | भारत और पड़ोस अमरीका में हिंदी को लेकर उत्साह11 जून, 2004 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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