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शुक्रवार, 11 जून, 2004 को 08:58 GMT तक के समाचार
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अमरीका में हिंदी को लेकर उत्साह

हिंदी सम्मेलन
हिंदी गीत संगीत को लेकर बच्चों में काफ़ी उत्साह दिखा
अमरीका में अब तक हिंदी के प्रचार-प्रसार का ज़रिया सिनेमा और टीवी ही रहे हैं लेकिन अब एक संगठित मुहिम शुरू हुई है हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए.

इसके लिए अब स्कूलों में हिंदी के पाठ्यक्रम शुरू किए जा रहे हैं, यहाँ तक कि कुछ हिंदी के स्कूल भी चलाए जा रहे हैं.

पिछले तीन वर्षों से अमरीका में वार्षिक हिंदी महोत्सव का भी आयोजन हो रहा है जिसमें बड़ी संख्या में भारतीय भाग लेते हैं.

इस महोत्सव का उद्देश्य भारत से बाहर रहने वाले नई पीढ़ी के बच्चों में अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव पैदा करना है, इसका आयोजन हिंदी के प्रचार-प्रसार में लगी कई संस्थाएँ मिल जुलकर करती हैं.

प्रयास

पिछले सप्ताहांत भी न्यूजर्सी में ऐसा ही आयोजन हुआ जिसके संयोजक देवेंद्र सिंह कहते हैं, "हम चाहते हैं कि हिंदी को उपयुक्त स्थान दिया जाए, यह विश्व में दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है लेकिन यहाँ अमरीका में इसका ज़्यादा चलन नहीं है."

वे कहते हैं, "इस तरह के महोत्सव से हम अमरीका में हिंदी के प्रति जागरूकता लाना चाहते हैं और अपने बच्चों को हिंदी की अहमियत समझा रहे हैं."

आयोजकों का कहना है कि आगे चलकर इस तरह के आयोजन पूरे अमरीका में कराए जाएँगे.

बच्चों का जोश कायम रहने की आशा
पुरस्कार जीतने वाले बच्चे

भारत के हिंदी के कुछ विद्वानों और कवियों ने इस समारोह में हिस्सा लिया, महोत्सव का अहम हिस्सा कवि सम्मेलन भी था जिसमें अशोक चक्रधर और सत्यनारायण मौर्य जैसे कवियों ने अपनी व्यंग्य कविताएँ सुनाईं जो बहुत सराही गईं.

लगभग एक हज़ार लोगों ने इस महोत्सव में हुए कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद उठाया, बच्चों ने हिंदी में अपनी कविताएँ सुनाईं और अपने शब्द ज्ञान का भी खूब परिचय दिया.

विभिन्न स्पर्धाओं में सफल रहने वाले बच्चों को भारतीय पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने पुरस्कार बाँटे, बेदी इन दिनों संयुक्त राष्ट्र में पुलिस मामलों की सलाहकार हैं.

अमरीका में ज्यादातर परिवारों के बच्चे अँगरेज़ी ही बोलते हैं, यहाँ तक कि घर में भी, ऐसी हालत में बच्चों के मुँह से हिंदी सुनना एक सुखद अनुभव था.

न्यूजर्सी की एसेंबली के सदस्य उपेंद्र चिवुकुला राज्य में सरकारी स्कूलों में हिंदी की पढ़ाई कराने के लिए एक विधेयक लाने की तैयारी कर रहे हैं.

मूल रूप से आंध्र प्रदेश के रहने वाले उपेंद्र चिवुकुला कहते हैं, "अगर भारतीय मूल के बच्चे अपनी मातृभाषा सीखना चाहते हैं तो उन्हें इसकी सुविधा मिलनी चाहिए, उसे बच्चों की स्कूल की पढ़ाई का हिस्सा मानते हुए उन्हें अंक दिए जाने चाहिए."

कई भारतीय मूल के लोगों ने मिलकर निजी हिंदी स्कूल शुरू करने की पेशकश की है, कई मंदिरों और हिंदू सेंटरों में तो हिंदी की कक्षाएँ चल भी रही हैं.

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