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जो लौट नहीं सके.... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बहुत साल पहले मैंने एक नाटक लिखा था- ‘जो लौट नहीं सके....’. जिसमें यहाँ बसे प्रवासी भारतीयों की मजबूरियों को समझने की कोशिश की थी. आज सोचती हूँ कि क्या वे वाक़ई लौटना चाहते थे? क्या लौटने के लिए ही अपना देश छोड़कर, बेहतर जीवन की तलाश में बाहर निकले थे? मैं बात कर रही हूँ उन प्रवासी भारतीयों की जो एक, दो, तीन या चार दशक पहले भारत छोड़कर पश्चिमी देशों में आ बसे थे. मैं चूँकि ब्रिटेन में रहती हूँ इसलिए अपनी बात अपने अनुभव और आँखों देखी के आधार पर ही कहूँगी. जेब में भारतीय पासपोर्ट और मन में विलायती सपने! दोनों के मेल से एक नए देश, नई ज़मीन, नए माहौल में बसने की प्रक्रिया अपने आप में लंबी और जटिल है. वतन छूटा, गलियाँ छूटीं, लोग छूटे, मौसम छूटे, पहचान छूटी. शुरू-शुरू के वर्षों में छोटी से छोटी हर छूटी हुई चीज़ का दर्द सालता रहा. यहाँ तक कि लोगों को मुहल्ले का पनवाड़ी याद आता है जो उनके नाम के साथ-साथ ये भी जानता है कि उन्हें कैसा पान पसंद है और कितने नंबर का तंबाकू! गली के किनारों पर उपेक्षित पड़े कूड़े को सम्मान देतीं गाय-भैंसें याद आती रहीं, बेघर कुत्ता याद आता रहा, जो रात देर से लौटने पर भौंकता हुआ पीछे दौड़ता और घर के दरवाज़े पर पहुँचाकर विदा लेता. माँ के हाथ की बनाई दाल-सब्ज़ी याद करके दिल रोता रहा. हाय! वो स्पेशल छौंक. हाय वो लज़ीज़ कबाब, जिन्हें कल्लू खाँ टपकते पसीने के बीच जब प्याज़ के लच्छे और तीखी चटनी के साथ देते तो लोग उँगलियाँ चाटते रह जाते..... यादों का एक हुजूम था जो अँधड़ की तरह आता रहा और विदेश में बसने को कभी मुश्किल तो कभी आसान बनाता रहा. मगर मेमोरीचिप की भी एक सीमा है. फिर नई आकाँक्षाओं को पूरा करने के लिए नए संघर्ष ज़रूरी हैं. व्यावहारिकता का तक़ाज़ा है कि अतीतजीवी बनकर यह संभव नहीं! घर ख़रीदना है, कार ख़रीदनी है, बच्चों को प्राइवेट स्कूल भेजना है. ‘बच्चे कुछ बड़े हो जाएँ तो देश वापस चले जाएँगे. यहाँ रहकर तो वो अपने संस्कार भूल जाएँगे. चार पैसे हों तो अपने मुल्क से अच्छी कोई जगह नहीं......’ मगर फिर लौटने की इच्छा मन के किसी कोने में अब भी दबी है. मगर इस अर्से में कहीं कुछ बदल भी गया है. ‘गर्मी और धूल में एलर्जी शुरू हो जाती है.’ ‘क्या पूछते हैं, पॉल्यूशन इतना है कि इंडिया पहुँचते ही साँस लेना मुश्किल हो जाता है. जगह-जगह गंदगी. जिधर देखो गाय-भैंसें कूड़ा चरती नज़र आती हैं.’ ‘पानी? बस सुबह-शाम एक-आध घंटा. पीने के पानी की तो कोई गारंटी नहीं. बिजली? जब चाहे लोडशेडिंग हो जाती है.’ ‘जी नहीं, बाज़ार का खाना तो सिस्टम को बिल्कुल सूट नहीं करता. कल्लू खाँ के कबाब? इतना फ़ैट और मिर्च मसाला होता है कि उन्हें देखना भी पाप है.’ भारत कितना ही बुरा क्यों न हो, अपने वतन, अपनी ज़मीन से नाता कैसे तोड़ लें. ‘सोचते हैं एक फ़्लैट या फिर ज़मीन का टुकड़ा ख़रीदकर डाल दें. बुढ़ापे में वहीं जाकर रहेंगे.’ .....कई फ़्लैटों में ताले पड़े हैं. कुछ के दरवाज़े-खिड़कियों को दीमक चाट रही है. डरते हैं, किसी को किराए पर दिया तो कहीं कब्ज़ा न कर ले! ज़मीनों के कई टुकड़े, ‘लौटें कि न लौटें’ की दुविधा और अनिश्चय में आबाद होने का इंतज़ार कर रहे हैं. एनआरआई अब भी प्रवास में हैं. आधा इधर-आधा उधर. और अगर प्रवासी होते हुए वह हिंदी का छोटा-मोटा लेखक भी है तो समझ लीजिए उसकी क़लम जब भी उठती है, अपने जीवन को अभिशाप ही कहती है. अपनी रचनात्मक ऊर्जा का स्खलन करते समय वह जिस डाल पर बैठता है- उसे सिर्फ़ गालियाँ देता है. वतन की याद में आँसू तोड़ कविताएँ रचता है, मगर लौटता नहीं. बड़ी मजबूरियाँ रही हैं, प्रवासी भारतीय की. जिस देश को छोड़कर आया है, वहाँ लौटने से डरता है. और जिस देश में आकर बसा है, उसे पूरी तरह अपना नहीं पाया. यहाँ वो अजनबी है, वहाँ वो अजनबी है. उसके दिल से पूछिए तो उसे वह भारत चाहिए जिसे वह छोड़कर आया था. और उस भारत में भी उसे वो सब चाहिए जो उसने प्रवासी जीवन व्यतीत करते हुए अर्जित किया है. वह एनआरआई है.... जी हाँ.. Non Returnable Indian. फिर सच यह है कि इस बीच बहुत कुछ बदल भी तो गया है. भारत के टेलीविज़न चैनल चौबीसों घंटे भारत के समाचारों का निर्यात करते हैं, टीवी सीरियल बदलते भारत का सामाजिक चेहरा पेश करते हैं, भारतीय फ़िल्मों के लिए अब बिल्कुल भी तरसना नहीं पड़ता. भारतीय चावल, दालें, मसाले, पापड़, बड़ियाँ, राजनीति, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, संस्कार आदि-आदि... सब यहाँ उपलब्ध है- Export Quality. कौन जाए ज़ौक़ अब विलायत की गलियाँ छोड़कर? और अगर जाए तो कुछ ऐसे की गर्मियाँ यहाँ बीतें और सर्दियाँ वहाँ. ‘पासपोर्ट!’ जी, वो तो इसलिए बदला कि लंबे वीकेंड पर यूरोप वग़ैरह घूमने में आसानी हो. हाँ...... अब दोहरी नागरिकता मिल जाए तो.......? | इससे जुड़ी ख़बरें प्रवासी भारतीयों को जोड़ने की कोशिश07 जनवरी, 2004 | कुछ और जानिए उम्मीद की किरण बना पहला प्रवासी दिवस07 जनवरी, 2004 | कुछ और जानिए समिति ने महत्त्वपूर्ण सिफ़ारिशें कीं07 जनवरी, 2004 | कुछ और जानिए 'खाड़ी गए श्रमिकों के हित में कई क़दम'07 जनवरी, 2004 | कुछ और जानिए 'आप भारत के लिए क्या कर सकते हैं?'07 जनवरी, 2004 | कुछ और जानिए इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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