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बुधवार, 07 जनवरी, 2004 को 11:11 GMT तक के समाचार
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प्रवासी भारतीयों को जोड़ने की कोशिश
प्रवासी भारतीय दिवस
दिल्ली में आयोजित हो रहा है दूसरा प्रवासी भारतीय दिवस

भारतीय मूल के लोग पूरी दुनिया में फैले हुए हैं और उनका विस्तार ऐसा है कि उनके लिए कहीं न कहीं सूर्य आसमान में रहता ही है यानी उनका सूर्य कभी नहीं डूबता.

एक अनुमान के अनुसार भारतीय मूल के लोगों की जनसंख्या लगभग दो करोड़ है.

इन लोगों ने परिश्रम, आर्थिक सूझ-बूझ, उच्च शैक्षिक स्तर और पेशेवर क्षमताओं के चलते सारी दुनिया में अपना लोहा मनवाया है.

वे अलग-अलग देश में रहते हैं, अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं और अलग-अलग तरह के काम करते हैं मगर फिर भी जो सूत्र उन्हें जोड़ता है वो है उनका भारतीय मूल, भारतीय सभ्यता के प्रति उनका प्यार और भारत से उनका गहरा लगाव.

भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब 1977 में विदेश मंत्री थे तब उन्होंने कहा था, “भारतीय मूल के लोगों का विषय ऐसा है जो हमें बेहद प्यारा है.”

उनका कहना था, “भारतीय मूल का हर व्यक्ति भारत का प्रतिनिधित्व करता है और भारतीय सभ्यता-संस्कृति के विभिन्न पहलुओं के साथ चलता है. भारत उन्हें ख़ुद से कभी अलग नहीं करेगा.”

इसके बाद जब वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो सितंबर 2000 में इस बारे में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया और डॉक्टर एलएम सिंघवी की अध्यक्षता वाली इस समिति की अनुशंसा के बाद प्रवासी भारतीयों के लिए दोहरी नागरिकता को मंज़ूरी दे दी गई है.

कैसे बने प्रवासी

भारतीय मूल के लोग मुख्यतः तीन तरह से देश से बाहर निकले. अधिकतर मसलों में ये आर्थिक मसले थे जिनकी वजह से उन्हें देश छोड़ना पड़ा.

वाजपेयी

 भारतीय मूल का हर व्यक्ति भारत का प्रतिनिधित्व करता है और भारतीय सभ्यता-संस्कृति के विभिन्न पहलुओं के साथ चलता है. भारत उन्हें ख़ुद से कभी अलग नहीं करेगा

प्रधानमंत्री वाजपेयी

इसके बाद दूसरे दौर में लोग श्रमिक के रूप में खाड़ी और अन्य देशों की ओर निकले.

फिर तीसरा दौर ऐसे शिक्षित और समृद्ध लोगों का है जो आर्थिक स्थिति और सुधारने के लिए विकसित देशों की ओर निकले हैं.

भारत ने जैसे-जैसे एक आधुनिक समाज का स्वरूप लिया है और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है वैसे-वैसे भारतीय मूल के लोगों की छवि भी बदली है.

प्रवासियों और भारतीय मूल के लोगों के लिए अंग्रेज़ी में इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द ‘डायस्पोरा’ मूलतः ग्रीक भाषा का है.

इसका असली अर्थ तो था ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी से छठी शताब्दी तक इसराइल से यहूदियों का बाहर निकलना.


अब इसका इस्तेमाल आम तौर पर उन लोगों के लिए किया जाता है जो अपना देश छोड़कर दूसरे देशों में स्थाई रूप से बस गए हैं मगर अपनी पहचान के बारे में जानते हैं और उस देश के साथ विभिन्न स्तरों पर संबंध भी रखते हैं.

भारत को जब से आज़ादी मिली है तब से भारतीय अपनी जड़ें खोजने के लिए लौटने लगे हैं. इसके अलावा जब से भारतीय अर्थव्यवस्था खुली है तब से तो ये प्रक्रिया और तेज़ हुई है.

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