| दुनिया में घटता तेल और बढ़ता तनाव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तेल से न सिर्फ़ दुनिया की नब्बे प्रतिशत से अधिक गाड़ियाँ और अधिकतर फैक्ट्रियाँ चलती हैं बल्कि ज़्यादातर देश अपने भविष्य के विकास की रूपरेखा तेल की धार को देखकर तय करते हैं, ऐसे में तेल के लिए टकराव स्वाभाविक है. 1950 तक कोयला ऊर्जा का प्रमुख स्रोत था. लेकिन 1930 के दशक से ही तेल की राजनीति की कहानी शुरू हो गई थी, यानी वो समय जब मध्य पूर्व एशिया में तेल मिलना शुरू हुआ. सबसे पहले ब्रिटेन और फिर अमरीका ने तेल को लेकर योजनाएँ बनाईं जिनमें तेल की कूटनीति की कई योजनाएँ शामिल हैं. इक्कीस साल से तेल पर शोध कर रहे जाने माने विश्लेषक अहमद रशीद कहते हैं, “पिछले कई दशकों से अमरीकी दबदबे का एक बड़ा कारण ऊर्जा के स्रोतों का नियंत्रण भी है." "दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से ही अमरीका की ये कोशिश रही है कि तेल के भंडारों से उनको लगातार, बिना किसी परेशानी के तेल मिलता रहे और तेल के उत्पादन और उसकी बिक्री बिना किस रुकावट के चलती रहे.” ईरान अमरीका ने 1950 के दशक से ही कई देशों की अंदरूनी राजनीति में तेल के कारण दख़ल देना शुरू कर दिया था.
1953 में ब्रिटेन और अमरीका ने मिलकर ईरान के चुने हुए प्रधानमंत्री मोहम्मद मुसद्दिक़ का तख़्तापलट करवाकर शाह रज़ा पहलवी को गद्दी पर बिठाया. जहाँ मोहम्मद मुसद्दिक़ ने ब्रिटेन के एंग्लो ईरानियन तेल कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया था वहीं रज़ा शाह ने पश्चिमी देशों को ईरान के तेल क्षेत्र में घुसने की छूट दे दी. रज़ा शाह पहलवी का शासन 1979 में इस्लामी विद्रोह के बाद ख़त्म हुआ. इराक़ बीबीसी ऑनलाइन के विश्व मामलों के संवाददाता पॉल रेनल्ड्स कहते हैं कि 1991 में अमरीका ने सैनिक कार्रवाई कर कुवैत से सद्दाम हुसैन को पीछे हटाया ताकि सद्दाम वहाँ के तेल पर कब्ज़ा न कर लें.
और हालांकि इराक़ के ख़िलाफ़ युद्ध के कई कारण थे लेकिन अमरीकी उपराष्ट्रपति डिक चेनी ने ख़ुद अगस्त, 2002 में कहा था कि सद्दाम की महत्वाकांक्षा को बढ़ने से रोकने का एक कारण तेल भी था. डिक चेनी का कहना था – “सद्दाम अगर आगे बढ़े तो वे मध्य पूर्व के तेल पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर दुनिया में ऊर्जा के सबसे बड़े स्रोत पर नियंत्रण क़ायम कर लेंगे.” तेल की राजनीति में अब एक नया और ख़तरनाक मोड़ आ गया है. अल क़ायदा तेल विशेषज्ञ अहमद रशीद कहते हैं– “हाल ही में जिस तरह के हमले किए गए हैं उससे साफ़ है कि अल क़ायदा की रणनीति पश्चिमी देशों के आर्थिक हितों पर हमला करना है – अगर और हमले होते हैं तो वो काफ़ी ख़तरनाक हो सकता है.” रशीद कहते हैं कि अगर मध्य पूर्व में तेल ठिकानों पर हमले तेज़ हुए तो तेल की क़ीमतें आसमान छू सकती हैं. “तालेबान” और “मध्य एशिया में कट्टरवाद और तेल” नाम की दो क़िताबें लिख चुके अहमद रशीद कहते हैं कि अगर लगातार हमलों के कारण इराक़ से सेना हटती है तो उसके भी गंभीर परिणाम हो सकते हैं – तेल की क़ीमतें काफ़ी बढ़ सकती हैं. तेल को लेकर पिछले कुछ वर्षों में राजनीति अचानक तेज़ हो जाने के कुछ महत्वपूर्ण कारण हैं. समस्या जानकारों के मुताबिक़, कई देश इस बात को समझ रहे हैं कि दुनिया में तेल 40 साल में ख़त्म हो सकता है लेकिन ये अवधि कुछ दशक ज़्यादा भी हो सकती है क्योंकि कई जगहों पर अब भी तेल निकालने का काम शुरू भी नहीं हुआ है.
मगर तेल ख़त्म होने से ज़्यादा महत्वपूर्ण ये है कि तेल का उत्पादन कब से कम होने वाला है. इसी साल मई के महीने में पेरिस में तेल पर शोध कर रहे संस्थान असोसिएशन फ़ॉर स्टडी ऑफ़ पीक ऑयल एंड गैस (एस्पो) ने अपने शोध में कहा कि तेल का उत्पादन वर्ष 2010 तक “पीक” पर पहुँच जाएगा यानी तब तक अपने सबसे ऊँचे स्तर तक पहुँच जाएगा. एस्पो के अनुसार इसके बाद तेल का उत्पादन धीरे-धीरे कम होने लगेगा और इसके साथ ही तेल की क़ीमतें बढ़ने लगेंगी. कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि एस्पो की 2010 की समय सीमा बहुत कम है लेकिन साथ ही मानते हैं कि आने वाले कुछ दशकों में ये संभव है. जहाँ तेल की आपूर्ति में कमी की चिंता है वहीं चीन और भारत जैसे देशों में तेल की बढ़ती खपत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में माँग को बढ़ा रही है. तेल विश्लेषक अहमद रशीद कहते हैं कि जब तेल की आपूर्ति कम होने लगेगी तो दुनिया के ताकतवर देशों के बीच तेल को लेकर राजनीति तेज़ हो जाएगी, ख़ास तौर पर अमरीका, चीन और यूरोप के बीच. चीन चीन और कज़ाकस्तान के बीच मई 2004 में एक बड़ा तेल समझौता हुआ है जिसके अनुसार 1,240 किलोमीटर लंबी एक पाइपलाइन बनाई जाएगी. ये पाइपलाइन 3,000 किलोमीटर लंबी उस पाइपलाइन का सबसे बड़ा हिस्सा है जिसके ज़रिए कैस्पियन सागर से तेल चीन तक लाया जा सकेगा. एक ताज़ा अमरीकी शोध यूरोप और अमरीका के बीच तेल को लेकर होने वाले संभावित संघर्ष की ओर इशारा करता है. यूरोप अमरीकी सेना के विश्लेषक मेजर चार्ल्स जेफ़रीज़ पूछते हैं कि कठिन परिस्थितियों में -“ऐसा असंभव नहीं लगता कि अमरीका मध्य पूर्व एशिया के देशों से ऐसा कोई समझौता कर ले कि वो अपना तेल यूरोप सहित दूसरे औद्योगिक देशों को न देकर सिर्फ़ अमरीका को ही दें.”
लेकिन ये सब कयास हैं जो अलग-अलग परिस्थितियों के होने पर संभव हो सकते हैं या नहीं भी हो सकते – बहरहाल अरबों डॉलर की तेल की राजनीति में सभी प्रमुख खिलाड़ी हर संभावना को पहले से भाँपते हुए दशकों, यहाँ तक कि आधी सदी तक की संभावनाओं पर बात कर रहे हैं. इन्हीं में से एक संभावना ये भी है कि अगर तेल ख़त्म हो जाए तो क्या होगा? जानकार कहते हैं – तब परमाणु शक्ति बहुत महत्वपूर्ण हो जाएगी. उसके लिए ज़रूरत होगी यूरेनियम की और यूरेनियम के सबसे बड़े भंडार हैं इन दस देशों में – ऑस्ट्रेलिया, कज़ाकस्तान, कनाडा, दक्षिण अफ़्रीका, नामीबिया, ब्राज़ील, रूस, अमरीका, उज़्बेकिस्तान और चीन. |
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