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अमरीका की नज़र खाड़ी के तेल पर थी
ब्रिटेन के कुछ पुराने सरकारी दस्तावेज़ों से पता चला है कि अमरीका ने 1973 में ही मध्य पूर्व देशों के तेल भंडारों पर क़ब्ज़ा करने की योजना बनाई थी. अरब देशों ने 1973 में इसराइल के हमले के बाद तेल बेचने पर रोक लगा दी थी. अक्तूबर युद्ध के नाम से जाने जाने वाली इस लड़ाई में मिस्र और सीरिया के मुक़ाबले इसराइल ताक़तवर बनकर उभरा था. ब्रिटेन सरकार ने उस दौरान के कुछ सरकारी दस्तावेज़ हाल ही में सार्वजनिक किए हैं. इन दस्तावेज़ों से पता चलता है कि ब्रिटेन सरकार ने उस संकट को इतनी गंभीरता से लिया कि इस बारे में बाक़ायदा एक आपातकालीन योजना बनाई गई कि अमरीका क्या-क्या कर सकता है. यहाँ तक अनुमान लगा लिया गया था कि अमरीका सऊदी अरब और कुवैत में हवाई सैनिकों के ज़रिए तेल के संस्थानों पर क़ब्ज़ा कर सकता है और ब्रिटेन से भी अबूधाबी में ऐसा ही करने को कह सकता है. इन दस्तावेज़ों से यह अंदाज़ा होता है कि तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करना किस हद तक ब्रितानी और अमरीकी सरकारों की मुख्य चिंता रही है. अमरीकी चेतावनी ब्रिटेन ने यह अंदाज़ा तत्कालीन अमरीकी रक्षा मंत्री जेम्स शेल्सिंगर की अमरीका में ब्रितानी राजदूत लॉर्ड क्रोमर को दी गई चेतावनी के बाद लगाया था.
ब्रितानी राजदूत ने जेम्स शेल्सिंगर के हवाले से कहा था कि तेल के लिए अमरीका बलप्रयोग करने से भी नहीं झिझकेगा. अरब देशों ने इसराइल पर पश्चिमी देशों का दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से यह क़दम उठाया था कि पश्चिमी देशों को तेल बेचने पर पाबंदी लगा दी थी. हालाँकि यह पाबंदी ख़ासतौर से अमरीका को तेल बेचने पर लगाई थी लेकिन उससे अन्य देश भी प्रभावित हुए थे. ब्रिटेन की संयुक्त जाँच समिति ने अनुमान लगाया था कि जब अमरीका ने बलप्रयोग की बात की थी तो अमरीकी रणनीति में मध्य पूर्व में तेल संस्थानों पर क़ब्ज़ा किए जाने की बहुत संभावना थी. "अमरीकी रणनीति से ऐसा ही आभास होता है, हम ऐसा मानते हैं." इससे साफ़ झलकता है कि ब्रितानी ख़ुफ़िया अधिकारियों को अमरीकी रणनीति की कुछ भनक लग गई थी. बलप्रयोग की रणनीति में अरब देशों के शासक बदले जाने या ताक़त के बल पर दबाव बनाने के विकल्पों को ख़ारिज कर दिया गया था.
संयुक्त जाँच समिति ने विश्वास व्यक्त किया था कि अमरीका बलप्रयोग की रणनीति में हवाई सैन्य अभियान चलाता और जिसके लिए संभवतः ग्रीस, तुर्की, साइप्रस, ईरान या इसराइल के हवाई अड्डों का इस्तेमाल करता. "हमारा अनुमान है कि ऐसे शुरुआती अभियान के लिए कम से कम दो ब्रिगेड की ज़रूरत होती, एक सऊदी अरब के लिए और एक कुवैत के लिए. तीसरी ब्रिगेड अबूधाबी के लिए भी लगाई जा सकती थी." समिति ने चेतावनी दी थी कि यह अमरीकी क़ब्ज़ा दस साल तक भी जारी रह सकता था. समिति का मानना था कि इससे अरब देशों में अलगाव की भावना बढ़ती और इससे सोवियत संघ के साथ भी अमरीकी टकराव बढ़ता लेकिन समिति इस बारे में कोई राय नहीं दे पाई कि सोवियत संघ इस क़दम के ख़िलाफ़ कोई बलप्रयोग करता या नहीं. ब्रितानी भूमिका ब्रिटेन के लिए भी इस अभियान में भूमिका निभाने की तैयारी थी. समिति की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि अमरीका शायद यह चाहता था कि ब्रिटेन अबूधाबी के तेल संस्थानों पर क़ब्ज़े के लिए कार्रवाई करे और कुछ ब्रितानी सैन्य अधिकारियों के नाम अबूधाबी डिफ़ेंस फ़ोर्स के लिए घोषित भी कर दिए गए थे. समिति ने इस अभियान में इराक़ की कार्रवाई के ख़तरे का भी अंदाज़ा लगाया था. उस समय इराक़ के उपराष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ही थे. रिपोर्ट कहती है, "खाड़ी में किसी बड़े टकराव का ख़तरा कुवैत में नज़र आया जहाँ सोवियत संघ के समर्थन से इराक़ दख़लअंदाज़ी करने का क़दम उठा सकता था. रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल संस्थानों पर क़ब्ज़ा करने और टकराव बढ़ने की आशंका तब ज़्याद थी कि अगर खाड़ी देश ज़्यादा लंबे समय तक तेल बेचने पर रोक लगाए रखते. ऐसा होने पर पश्चिमी देशों के हित दाँव पर लग जाते और ऐसी स्थिति को पश्चिमी देशों ख़ासकर अमरीका ने "काले हालात" का नाम दिया था. लेकिन ऐसे हालात ज़्यादा लंबे समय तक नहीं रहे और कुछ महीनों बाद ही मिस्र और इसराइल के बीच समझौता हो गया जिसके बाद खाड़ी देशों ने तेल पर से लगी पाबंदी हटा ली. |
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