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बुढ़ापे में नया सफ़र | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ज़िंदगी की तेज रफ़्तार और दरकते रिश्तों के बीच उम्र का आख़िरी पड़ाव बुढ़ापा, जहाँ थक कर बोझिल हुई आंखें सुकून तलाशती हैं, और यह खोज अगर पराए मुल्क में हो तो बेहद मुश्किल लगती है. लेकिन लंदन में बसे कुछ बुज़ुर्गों की पहल ने इस कठिन डगर को बेहद आसान कर दिया है. लंदन के पूर्वी इलाक़े इलफर्ड में रहने वाले तीन बुज़ुर्गों ने जीवन के इस दौर के सूनेपन को ख़त्म करने के लिए बुज़ुर्गों का समूह बनाया है. सात साल पहले शुरू हुई इस पहल में एक-एक करके लोग जुड़ते गए और आज 150 से ज्यादा सदस्य हैं. इस समूह के वरिष्ठ सदस्य एच.पी शर्मा बताते हैं, ‘‘हमारे समूह का कोई नाम नहीं है, न ही कोई कर्ता-धर्ता है. उम्र के इस पड़ाव में हम हर तरह की राजनीति से बचना चाहते हैं, इसलिए समूह का न कोई अध्यक्ष है न ही कोषाध्यक्ष. बस हर गुरुवार को हम नियमित तौर पर मिलते हैं एक दूसरे के दुःख-सुख बाँटते हैं.’’ कहावत है कि परदेस में जवानी काम करते-करते बीत जाती है लेकिन बुढ़ापा काटने को दौड़ता है. नज़रों के सामने देश घूमता है... बस इसी कमी को पूरा करता है यह समूह. खड़ी बोली, गुजराती, पंजाबी भाषा का अनूठा मेल-मिलाप सुन जहाँ देश में होने का आभास होता है वहीं देसी खाने और गरम-गरम रोटियों की सोंधी ख़ुशबू दिमाग़ को तरोताज़ा कर देती है. समूह के एक अन्य सदस्य कुल भूषण जोशी बताते हैं, ‘‘पहले हम कहीं भी मिल लेते थे लेकिन धीरे-धीरे सदस्य बढ़ने लगे तो हमें एकत्र होने के लिए जगह की ज़रूरत हुई तो हिंदू सेंटर को ठिया बना लिया. लेकिन हम मंदिर से कुछ लेते नहीं हैं. न ही यह एक धार्मिक समूह हैं." "हमारे कई सदस्यों के साथ दूसरे धर्मों को मानने वाले दोस्त आते हैं. हम उनका स्वागत करते हैं और हमेशा करते रहेंगे.’’ सहभोज गुरूवार को ये सभी एक साथ खाना खाते हैं लेकिन उसका राशन खुद जुटाते हैं. इसके लिए समूह के सभी सदस्य धन इकट्ठा करते हैं. बुज़ुर्गों की इस पहल से खुश कुछ महिलाएं निःशुल्क इनका भोजन तैयार करती हैं. इन्हीं में से एक शीला धूपर बताती हैं, ‘‘गुरुवार के दिन हम घर का काम सुबह जल्दी ही पूरा कर लेते हैं क्योंकि इसके बाद हमें अपने बुज़ुर्गों के आशीर्वाद की दरकार रहती है.’’
इस काम में कुछ अन्य पुरुष बुजुर्ग भी इनका हाथ बँटाते हैं. समूह के सभी सदस्य रिटायर्ड हैं इनमें से कुछ शिक्षक रह चुके हैं तो कुछ व्यापारी हैं तो कुछ इंडियन हाई कमीशन के उच्च पद से रिटायर्ड लोग हैं. लेकिन समूह के बीच आकर ऐसा महसूस नहीं होता कि ये लोग रिटायर हो चुके हैं. साठा तो पाठा की कहावत को चरितार्थ करते ये लोग एक साथ हँसते-गाते हैं. कोई चुटकुले सुनता है तो कोई गाना सुना कर सबका मनोरंजन करता है. देश-दुनिया के बारे में बातचीत करते हैं. एक दूसरे का हालचाल पूछते हैं. इन्हीं में से एक खैराती लाल शर्मा ने बताया, "हफ़्ते में एक बार मिलने से मन का सारा गुबार निकल जाता है. हमारा समूह हमारे लिए परदेस में देश का काम करता है.’’ अभी इस समूह में महिलाओं की संख्या काफी कम है. गुरुवार के दिन अपने पति के साथ समूह में आने वाली इंद्र वर्मा का कहना है, ‘‘औरतों से परिवार छूटता कहाँ है. हमारे बच्चे बड़े हुए तो पोते-पोती के मोह में बंध गए.’’ समूह के पुरुष सदस्य महिलाओं को समूह में शामिल होने के लिए लगातार प्रोत्साहित कर रहे हैं. कभी-कभार कुछ महिलाएं अपने पति के साथ आ जाती हैं तो ये उनका भरपूर स्वागत करते हैं. समूह के वरिष्ठ सदस्य मोहनलाल गुप्ता कहते हैं, ‘‘हमारा समूह सबके लिए खुला है. जो भी चाहे हमारे समूह में शामिल हो सकता है. बस उसे अपने बुढ़ापे का सम्मान करना होगा जैसा हम करते हैं. हमारा कहना है बचपन देखा, जवानी देखी, अब बुढा़पे की रवानी भी हंसते-हंसते देखो.’’ | इससे जुड़ी ख़बरें बुज़ुर्ग '126 वर्ष' की उम्र में चल बसे12 अक्तूबर, 2006 | पहला पन्ना बुढ़ापे में वृद्धाश्रम का सहारा25 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस वकील साहब का एक सदी का सफ़र07 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस अब शेरों के लिए भी वृद्धाश्रम05 जून, 2006 | भारत और पड़ोस लंबी उम्र का दाव जीता03 जनवरी, 2005 | पहला पन्ना क्या आप 150 साल तक जीना चाहेंगे?23 अक्तूबर, 2004 | विज्ञान अपने तेरहवीं के लड्डू ख़ुद बाँटे दादी ने30 जून, 2004 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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