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सोमवार, 25 सितंबर, 2006 को 09:01 GMT तक के समाचार
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बुढ़ापे में वृद्धाश्रम का सहारा
बुढापा
बुढापे में वृद्धाश्रम का आसरा भावनात्मक ज़रूरतों को पूरा नहीं करता
मेरी दो बेटियाँ और एक बेटा है. मन में चाहत थी कि अपनी बहू को बेपनाह प्यार देकर उसे अपनी बेटी बना लूँगी. लेकिन उसे मेरा प्यार नहीं चाहिए था और न ही मुझे वो सम्मान मिला, तो मुझ विधवा को घर छोड़ना पड़ा.

सरला कपूर नजफगढ़ में चल रहे वृद्धाश्रम में 1998 में आई थीं और तभी से यहीं रह रही हैं.

अन्नपूर्णा कहती हैं,‘‘मेरे पति के देहांत के बाद मैं अपने बेटे के पास रहने लगी. बेटा मुझसे बुरा बर्ताव करता था जो मुझसे बर्दाशत नहीं हुआ. मैं भगवान से प्रार्थना करती थी कि मुझे कोई आसरा दे दे. उसने मुझे यहाँ जगह दी. अब मैं अपने बेटे के पास कभी नहीं जाउँगी.’’

पैसे का खेल

एक बुज़ुर्ग ने नाम बताए बगैर कहा, “अगर माँ-बाप के पास कुछ संपत्ति है तो बच्चें आदर करते हैं. अगर नहीं है तो कोई नहीं पूछता. जब मुझे रिटायर होने के बाद पैसा मिला तो मैं घर में भी कुछ पैसे देता था, सौदा भी लेकर आता था तो बच्चों को हम अच्छे लगते थे, न दें तो उन्हें हम अच्छे नहीं लगते. इसलिए मैं और मेरी बीवी अब इस आश्रम में आ गए.”

 मेरे पति के देहांत के बाद मैं अपने बेटे के पास रहने लगी. बेटा मुझसे बुरा बर्ताव करता था जो मुझसे बर्दाशत नहीं हुआ. मैं भगवान से प्रार्थना करती थी कि मुझे कोई आसरा दे दे. उसने मुझे यहाँ जगह दी. अब मैं अपने बेटे के पास कभी नहीं जाउँगी
अन्नपूर्णा

इस ढलती उम्र में इनके झुके हुए शरीर और काँपते हुए हाथों को थामने की बजाय एक ऐसा रास्ता दिखाया गया जिसकी इन बुज़ुर्गों ने कल्पना भी नहीं की थी. इन बुर्जगों को कभी इनके बच्चों ने बोझ बताया तो कभी आर्थिक मजबूरी बताकर घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया.

एक ग़ैर सरकारी संस्था ‘अनुग्रह’ ने सात राज्यों के गाँवों और शहरों में बुज़ुर्गों के स्वास्थ्य, आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियों को समझने के लिए सर्वेक्षण किया.

इसमें पाया गया कि गाँव में 60 प्रतिशत बुज़ुर्गों का बेटा शादी के बाद घर में उन्हें रखना पसंद नहीं करता और कई घरों में अगर बेटे बाहर काम करते हैं तो बहू खाना नहीं देती.

प्रताड़ना

सर्वेक्षण के मुताबिक 30 प्रतिशत को दवा-दारू समय पर नहीं मिलती तो छह प्रतिशत ने खुद को आर्थिक रूप से मोहताज बताया.

अनुग्रह संस्था से जुड़ी और समाजशास्त्री आभा चौधरी का कहना है कि कम आय वर्गों में ज़्यादा अशिक्षा है जहाँ माँ-बाप के साथ गाली गलौज और हाथ उठना, उन्हें मारना-पीटना और कभी-कभी घर से बाहर जाने की धमकी देना जैसे मामले अध्ययन में सामने आए.

 कम आय वर्गों में ज़्यादा अशिक्षा है जहाँ माँ-बाप के साथ गाली गलौज और हाथ उठना, उन्हें मारना-पीटना और कभी-कभी घर से बाहर जाने की धमकी देना जैसे मामले अध्ययन में सामने आए
आभा चौधरी

मध्यम और उच्च आय वर्ग परिवार में गाली गलौज और मारपीट के मामले खुलकर सामने नहीं आए लेकिन इन घरों में भी बुज़ुर्गों की उपेक्षा होती है. जैसे, उनसे बातचीत न करना और घर के फ़ैसलों में उनसे राय न लेना.

ये भी आश्चर्य की बात है कि 92 फ़ीसदी न ही इस शोषण के ख़िलाफ़ कुछ बोलते है और न ही इसकी रिपोर्ट पुलिस में करते हैं.

भारत में लगभग आठ करोड़ की जनसंख्या 60 साल से ऊपर की है और इसमें से 80 फ़ीसदी गाँव में रहने वाले हैं. गाँव में यह समस्या अलग तरह की है. शहरों में ये समस्या और जटिल हो जाती है.

कसक

शहर में बुज़ुर्गों का एक बड़ा तबका ऐसा है जो अकेले जीवन गुजारता है जबकि उनके बच्चे देश-विदेश में कहीं कमा रहे होते हैं. इस तरह अकेले छूट जाने का दर्द कम नहीं होता लेकिन मुश्किल तब बढ़ जाती है जब इनकी सुरक्षा ख़तरे में होती है.

समाजशास्त्री आभा चौधरी कहती हैं कि शहरों में ज़्यादातर ऐसे मामले सामने आए हैं जो आर्थिक शोषण से संबंधित हैं. जहाँ ज़्यादा पैसा है वहाँ माँ-बाप को संपत्ति हस्तांतरित करने के लिए प्रताड़ित किया जाता है. जहाँ पैसा कम है वहाँ कहा जाता है कि हमारे बच्चे हैं, हम खुद हैं, अपना गुज़ारा चलाएँ या तुम्हें खाना खाने को दें.

दिल्ली सरकार में समाज कल्याण विभाग की सह निदेशक किरण सिंह इस समस्या को समाज का विकृत रूप मानती हैं और संयुक्त परिवारों की जगह ले रहे छोटे परिवारों को इस समस्या की जड़ बताती है.

उनका कहना है कि सरकार बुज़ुर्गों के लिए एक राष्ट्रीय नीति लाने पर विचार कर रही है. साथ ही इस क़ानून का प्रारूप भी तैयार किया जा रहा है.

हालाँकि जानकारों का सुझाव है कि समस्या घर से शुरू होती है और इसका निदान भी घर में ही खोजा जाना चाहिए. बुज़ुर्गों के लिए नया क़ानून कुछ मदद तो कर सकता है लेकिन घर में मिलने वाली भावनात्मक दूरी की टीस को पूरी तरह ख़त्म नहीं कर सकता.

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