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काँचिपुरम के बंधुआ बाल मज़दूर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से 70 किलोमीटर दूर स्थित काँचिपुरम अपने प्राचीन मंदिरों और रेशमी साड़ियों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है. यहाँ शंकराचार्य का मठ भी है. लेकिन कम ही लोग यह जानते हैं कि यहाँ के रेशम उद्योग में करीब दस हज़ार बाल मज़दूर भी काम करते हैं. और इनमें से अधिकतर बाल मज़दूर बंधुआ हैं. छोटी द्विया पड़ोसी ज़िले थिरूनमलई के एक गाँव में रहती है. उसे अपनी उम्र का पता नहीं, लेकिन वो पिछले तीन साल से सुबह आठ बजे से शाम साढ़े छह बजे तक सप्ताह के सातों दिन एक करघे पर काम करती है. द्विया ने बताया, ''मुझे पहले 150 रुपए प्रति माह मिलता था. अब एक साल से 200 रुपए मिल रहे हैं. मैं स्कूल जाना चाहती हूँ, लेकिन मेरे माँ-बाप ने पाँच हज़ार रुपए का कर्ज़ लिया है.'' अत्यंत गरीबी के कारण काँचिपुरम और थिरूनमलई ज़िले के हज़ारों परिवार अपने बच्चों को करघे पर काम करने भेजते हैं. गैर सरकारी संगठन सोशल एक्शन नेटवर्क के टी रॉय पिछले सात साल से इन बच्चों को स्कूल भेजने के कार्यक्रम में लगे हैं. उनका कहना है,'' यह गलत धारणा है कि बच्चे बेहतर बुनकर होते हैं. यहाँ उनका शोषण चल रहा है. बाल मज़दूरी के साथ बंधुआ मज़दूरी भी ग़ैरक़ानूनी है.'' बंधुआ मज़दूर कई माँ बाप करघा मालिक से कर्ज़ लेकर अपने बच्चों को काम पर भेजते हैं. वो चाहते हैं कि उनके बच्चे की आमदनी से कर्ज़ का पैसा कम होता रहे. लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है. एक बार बच्चा बड़े बुनकर के साथ काम करने लगता है तो वो सालों तक बंधुआ मज़दूर बना रहता है. उसके माँ बाप द्वारा लिए कर्ज़ और उस पर ब्याज़ की राशि बढ़ती जाती है. 36 वर्षीय कडियमाल के घर पर एक करघा है. उसने अपने दोनों बच्चों को काम पर लगा दिया था. 10 वर्षीय युवराज को यह काम बिल्कुल पसंद नहीं था. कडियमाल ने कहा,'' मैं क्या करती. कौन अपने छोटे बच्चों को ऐसी नौकरी करने भेजेगा? लेकिन उसके द्वारा कमाए 120 रुपए से हमें मदद मिल रही थी.'' पंद्रह दिन पहले स्वयंसेवी संगठन ने करघा मालिक और युवराज के माँ बाप से बातचीत कर युवराज को रिहा करवाया था. अब युवराज स्कूल जाने लगा है और वैसी नौकरी फिर नहीं करना चाहता. कांचिपुरम में क़रीब एक लाख 20 हज़ार करघे हैं. ये करघे अधिकतर घरों में लगाए जाते हैं और पति पत्नी इनपर 20-25 दिन में एक कांचिपुरम साड़ी बुनते हैं. एक साड़ी बुनने के लिए उन्हें 600 रुपए मिलते हैं जबकि एक अच्छी साड़ी बाज़ार में कई हज़ार रुपए के लिए बिकती है. सरकार और स्वयंसेवी संगठनों ने बाल मज़दूरी के ख़िलाफ़ काफ़ी जागरूकता फैलाई है. लेकिन गरीबी और बैंकों से वित्तीय सहायता न मिलने के कारण इन परिवारों के सामने कोई और रास्ता नहीं. |
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